Friday, December 21, 2012

कन्या राशि मे चन्द्र मंगल की युति बनाम मानसिक क्रूरता

चन्द्रमा मन का राजा है,"मन है तो जहान है मन नही है तो शमशान है",यह कहावत चन्द्रमा के लिये बहुत अच्छी तरह से जानी जाती है। पल पल की सोच चन्द्रमा के अनुसार ही बदलती है चन्द्रमा जब अच्छे भाव मे होता है तो वह अच्छी सोच को कायम करता है और बुरे भाव मे जाकर बुरे प्रभाव को प्रकट करता है। लेकिन जब चन्द्रमा कन्या वृश्चिक और मीन का होता है तो अपने अपने फ़ल के अनुसार किसी भी भाव मे जाकर राशि और भाव के अनुसार ही सोच को पैदा करता है। जैसे मेष लगन का चन्द्रमा अगर कर्क राशि मे है तो वह भावनात्मक सोच को ही कायम करेगा अगर वह लगन मे है तो अपनी काया के प्रति भावनात्मक सोच को पैदा करेगा और वृष राशि मे है तो अपने परिवार के लिये धन के लिये और भौतिक साधनो के लिये भावनात्मक सोच को पैदा करेगा वही चन्द्रमा अगर मिथुन राशि का होकर तीसरे भाव मे चला गया है तो वह केवल अपने पहिनावे लिखने पढने और इसी प्रकार की सोच को पैदा करेगा,अष्टम मे है तो वह अपनी भावनात्कम सोच को अपमान होने और गुप्त रूप से प्राप्त होने वाले धन अथवा सम्मान के प्रति अपनी सोच को रखने के साथ साथ वह मौत के बाद के जीवन के प्रति भी अपनी सोच अपनी भावना मे स्थापित कर लेगा। इसी प्रकार से कन्या राशि का चन्द्रमा अगर अच्छे भाव मे है तो वह अच्छी सोच को पैदा करने के लिये सेवा वाले कारणो को सोचेगा और बुरे भाव मे है तो वह केवल चोरी कर्जा करना और नही चुकाना दुश्मनी को पैदा कर लेना और हमेशा घात लगाकर काम करना आदि के लिये ही सोच को कायम रख पायेगा। यह कुंडली मीन लगन की है गुरु जोखिम के भाव मे विराजमान है साथ मे शुक्र जो जोखिम के भाव का मालिक भी है और हिम्मत को भी प्रदान करता है का कारक भी है शुक्र के प्रति कहा जाता है कि जब शुक्र वक्री होता है तो वह अपने भाव और राशि के अनुसार अपने फ़ल को दूसरो को बताने और अपने काम को दूसरो के द्वारा करवाने के लिये भी माना जा सकता है। शुक्र का गुरु के साथ होने का मतलब होता है कि व्यक्ति अपनी ही सोच के कारण अपने मन मे ही सीधी और उल्टी सोच को कायम रखता है,वह अच्छा सोचता भी है तो बुरी सोच उसे अपने आप परेशान करने लगती है। लेकिन मंगल का का चन्द्रमा के साथ कायम होने का अर्थ सीधी तरह से मन मे सेवा के प्रति क्रूरता को सामने करता है जैसे व्यक्ति अगर पुलिस मे काम करता है तो वह हमेशा अपने मन के अन्दर किसी भी स्थिति मे अपनी सोच को क्रूरता के साथ ही रख पायेगा कारण जब भी कोई अच्छा आदमी भी मिलेगा और उसे किसी प्रकार की गल्ती मिलेगी तो वह अपने मन के अन्दर भी उस अच्छे आदमी को भी बुरी निगाह से देखेगा और कई बार किसी अच्छे व्यक्ति को बुरे व्यक्ति की संगति से सजा मिलने का कारण बन सकता है।

Saturday, December 8, 2012

जीवन की उन्नति मे त्रिकोणो का महत्व


वक्री शनि के बारे मे मै पहले भी लिख चुका हूँ कि शनि मार्गी आदेश से काम करने वाला होता है लेकिन वक्री आदेश देकर काम करवाने वाला होता है। जिस भाव मे जिस राशि मे जिस ग्रह की युति वक्री शनि से मिलती है उसी ग्रह और उसी भाव राशि के अनुसार वह अपने बल से काम करवाने की हिम्मत रखता है। यह कुंडली हमारे माननीय प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह की है कुंडली मे शनि वक्री है और धन के भाव मे राज्य के कार्य वाली मकर राशि मे विराजमान है। शनि वक्री पर असर देने वाले ग्रह सूर्य बुध नवम पंचम योग से शुक्र चन्द्र मंगल अष्टम भाव से अपने अपने प्रभाव को प्रदान कर रहे है। कहा भी जाता है कि बुद्धिमान की बुद्धिमान से और पहलवान की पहलवान से ही पटती है वह चाहे मित्रता हो या दुश्मनी। कांग्रेस की अध्यक्ष माननीय सोनिया गांधी जी की कुंडली मे भी शनि देव वक्री है।
दोनो कुंडलियों में शनि की आमने सामने की स्थिति तथा दोनो कुंडलियों मे शनि का वक्री होना आपसी सहमति और मंत्रणा के लिये एक अतिउत्तम मान्यता को प्रकट करने के लिये अपना असर प्रदान करने के लिये माना जा सकता है। राज्य के कार्यों का कारक ग्रह मंगल श्रीमती सोनिया गांधी के लिये वरदान साबित हो रहा है वहीं माननीय प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह के लिये राज्य का कारक बुध राज्य भाव मे ही स्थापित होकर सूर्य का साथ लेकर श्रीमती सोनिया गांधी के छठे मंगल से अपने नवम पंचम के योग को बल दे रहा है। मंगल और सूर्य दोनो की युति जब अर्थ भाव मे बन जाती है और बुध शनि वक्री सहायक हो जाते है तो जीवन में किसी भी किये गये नैतिक अथवा अनैतिक कामो का खुलासा भी नही हो पाता है और जातक के जीवित रहने तक किसी भी बात को अन्यथा नही लिया जा सकता है। श्रीमती सोनिया गांधी के चौथे भाव मे तुला राशि का उच्च का गुरु शुक्र के साथ है,वास्तविकता से अगर परे नही जाया जाये तो यह गुरु अपनी मान्यता को दिशाओं के अनुसार भचक्र की उत्तर दिशा से अपने सम्बन्धो को स्थापित करने के बाद पश्चिम उत्तर दिशा के बल को गुप्त रूप मे प्राप्त करता है। लेकिन भचक्र की वास्तविक राशियों को देखा जाये तो वक्री शनि एक बुद्धिमानी का प्रमाण देकर उत्तर दिशा से अपनी पैठ को कर्क राशि से बनाता है तथा दक्षिण पश्चिम दिशा के सूर्य बुध और केतु की सहायता से अपने को आगे बढाता है। दुश्मनी का मालिक ग्रह गुरु है कारण यह छठे भाव का मालिक भी है और भाग्य का कारक भी है जब यह गुरु चौथे भाव मे बैठ जाता है तथा लाभ और चौथे भाव का शुक्र भी साथ होता है तो वह अपनी युति को हर कार्य मे छत्तिस का आंकडा ही बैठाता है लेकिन गुरु जो व्यापारिक भाव मे है और व्यापारिक राशि मे है शुक्र के स्वगृही होने से अपनी स्थिति को शुक्र के आधीन ही रखता है।
 जीवन के चार पुरुषार्थों के लिये कुंडली के चारों त्रिकोण पूर्ण करने के लिये शादी सम्बन्ध सहयोग मित्रता आदि के कारण आदिकाल से चले आ रहे है। शत्रुता भी इन्ही त्रिकोणो की बजह से होती है और आजीवन सम्बन्ध बनने की बात भी इन्ही त्रिकोणो पर निर्भर होती है। पुरुषार्थ चार होते है धर्म नामक पुरुषार्थ मेष सिंह और धनु से सम्बन्धित होता है,जिसके अन्दर पूर्वजो की मान्यता से लेकर खुद के शरीर और आगे आने वाली सन्तान के प्रति की जाने वाली व्याख्या होती है अर्थ के लिये वृष कन्या और मकर के लिये माना जाता है जिसके अन्दर पास मे उपस्थिति धन पूर्वजो के द्वारा दिया गया खुद के द्वारा कमाया गया और गुप्त रूप से जमा किया धन माना जाता है काम नामके पुरुषार्थ को मिथुन तुला और कुम्भ राशि से गिना जाता है जिसके अन्दर पत्नी बच्चे मित्रता सामयिक हास परिहास आदि के कारको को गिना जाता है आखिरी और जीवन के प्रति इच्छा रखने वाले कारक त्रिकोण में कर्क राशि वृश्चिक और मीन राशियां आती है। इन राशियों के द्वारा जातक के द्वारा पैदा होने के स्थान जोखिम लेकर की जाने वाली इच्छा पूर्ति और अन्त समय तक का जो भी उद्देश्य जातक के सामने होता है वह गिना जाता है,यह त्रिकोण जीवन में मानसिक रूप से कर्म के रूप से और सहायता के रूप से देखा जाता है जब इन सभी कारणो मे इच्छा पूर्ति होती है तो जातक का जीवन सफ़ल माना जाता है।प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी एक धार्मिक व्यक्ति है इस बात के लिये उनके गुरु केतु को जो सिंह राशि मे होने से माना जा सकता है,गुरु जो जीव का कारक है और केतु जो जीव को मान अपमान देने का कारक है केतु जब गुरु की नजर मे आजाता है तो मान देने लगता है और जब शनि के घेरे मे आजाता है तो अपमान देने लगता है।केतु को सिख समुदाय से भी जोड कर देखा जाता है और सिख समुदाय के साथ जब गुरु की भाग्य और मोक्ष के प्रति धारणा होती है तो वह पंच प्यारों के रूप मे अपनी स्थिति को बना लेता है। कुंडली नम्बर दो में केवल मंगल धनु राशि मे है जो श्रीमती सोनिया गांधी को कानून समाज उनके पैत्रिक स्थान आदि से मंगल की शक्ति से आधिपत्य जमाने की पूरी शक्ति देता है और जब मंगल गोचर से राहु के घेरे मे आता है तो यह मंगल की शक्ति आवेशात्मक प्रभाव मे आजाती है और बलपूर्वक कानून धर्म मर्यादा आदि का पालन करवाने के लिये अपनी शक्ति को देने लगता है लेकिन कुंडली नम्बर एक में श्री मनमोहन सिंह की गुरु केतु वाली नीति इस मंगल को न्याय धर्म और शांति के लिये बल देना शुरु कर देता है तो उनके द्वारा कोई गलत काम नही हो पाता है और एक निरंकुश शासक के रूप मे अपना काम नही कर पाती है। इसी प्रकार से कुंडली नम्बर दो के संतान भाव का स्वामी सूर्य संतान की तरक्की का मालिक बुध अपने शमशानी भाव के केतु के साथ होने से श्री मनमोहन सिंह के गुरु केतु के चौथे भाव मे होने से उनकी रक्षा और जीवन की उन्नति के लिये सहायक हो जाता है। लालकिताब के अनुसार कहा जाता है कि कुंडली के छठे और आठवे घर के ग्रह जो भी करते है वह एक प्रकार से गुप्त चाल को चला करते है उनकी गति को पहिचानना बहुत ही कठिन होता है। कन्या राशि का सूर्य और बुध श्री मनमोहन सिंह जी की कुंडली में गुप्त राजकीय भेदो बैंकिंग और फ़ायनेन्स वाली नीतियों के प्रति हमेशा सजगता से काम करने वाले माने जा सकते है तो श्रीमती सोनिया गांधी की कुंडली से सूर्य बुध और केतु हमेशा अपने द्वारा किसी भी प्रकार के राजनीति उद्देश्य व्यापारिक उद्देश्य संगठन आदि के लिये केतु की सहायता से दूसरो के द्वारा खुद के जीवन को चलाये जाने के लिये भी माना जा सकता है। इसका मुख्य कारण श्रीमती सोनिया गांधी के लिये वृश्चिक राशि का सूर्य उनकी संतान के लिये या तो विलय की तरफ़ इशारा करता है या गुप्त रूप से प्रवास के लिये अपना इशारा करता है उसी प्रकार से बुध जो पुत्री का कारक है तथा केतु जो दामाद का कारक है को भी उत्तर दिशा की तरफ़ पहाडी क्षेत्रो में सुखमय निवास के लिये सूचित करता है,इस काम के लिये आपका वक्री शनि बहुत ही सहायक है। वक्री शनि के लिये एक बात और भी मानी जा सकती है कि जैसे जैसे व्यक्ति बुजुर्ग होता जाता है वक्री शनि की बुद्धि बहुत ही सक्षम होती जाती है और वह अपने अनुसार लोगो से काम करवाने के लिये अपनी बुद्धि को बुजुर्ग समय मे काफ़ी महत्व देने के लिये अपनी शक्ति को प्रकट करता है।
पिछले समय मे जो दोनो लोगो के लिये गलत अफ़वाये फ़ैलायी गयी उनका कारण श्री मनमोहन सिंह जी की कुंडली का कुम्भ राशि का राहु जिम्मेदार है,तथा श्रीमती सोनिया गांधी की कुंडली में वृष राशि का राहु जिम्मेदार माना जा सकता है। हकीकत क्या है यह किसी को पता नही है,श्री मनमोहन सिंह के लाभ का प्रकार उनके मित्रो और शुभचिन्तको के लिये है जबकि उनके लिये केवल सरकारी रूप से जो भी सहायता मिलती है उसी पर उनका गुजारा चल रहा है,श्रीमती सोनिया गांधी के धन भाव मे जो राहु है वह केवल उनके लिये एक प्रकार से झूठी कल्पना करने के और लोगो के द्वारा बाते बनाये जाने के लिये ही मानी जाती है जबकि उनके खुद के जीवन के प्रति वृश्चिक राशि के सूर्य बुध केतु एक दुखदायी स्थिति को लेकर सामने खडे रहते है और उन्हे केवल दवाइयों पर अपने जीवन को चलाना पड रहा है। इस प्रकार से जो भी बाते भारत के इन लोगो के लिये कही जा सकती है वे मुख्य रूप से दक्षिण की राजनीति से ग्रसित मानी जा सकती है और दोनो ही लोगो को दक्षिण की राजनीति अपने कार्यों की सिद्धि के लिये प्रयोग मे ला रही है। यह बात कुंडली नम्बर दो के वृश्चिक राशि के सूर्य बुध और केतु अपने आप प्रकट कर देते है। किसी प्रकार से कुंडली नम्बर एक पत्नी और पत्नी परिवार के लोगो से सुरक्षित है,जो कर्क राशि के शुक्र मंगल और चन्द्र के द्वारा जानी जा सकती है जबकि कुंडली नम्बर दो का सुरक्षित रहना कानून के प्रति ही माना जा सकता है। (दोनो कुंडलियों का प्रारूप विकिपीडिया से लिया गया है)

Friday, December 7, 2012

एक कुंडली दैविज्ञ की !

दैविज्ञ का अर्थ होता है देव भाषा को जानने का और उस भाषा का प्रभाव जन सामान्य तक पहुँचाने का। लालकिताब के अनुसार दैविज्ञ की कुंडली का फ़लादेश करना बहुत ही विचित्र रूप से सामने आता है और उस विचित्रता का प्रभाव तब और समझ मे आने लगता है जब लाल किताब के सभी गणित बराबर खरे उतरते जाये। लालकिताब के अनुसार सूर्य तख्त पर विराजमान है,लेकिन उसके सामने कोई भी ग्रह नही है,केवल द्रिष्टि मे शनि चन्द्र है,जो सूर्य को समझने परखने रास्ता चलने के लिये आंख जैसी रोशनी दे रहे है। तख्त पर विराजमान ग्रह सप्तम की मंत्रणा को लेकर चलता है और अष्टम उसकी नजर कहा गया है लेकिन तख्त पर आसीन ग्रह तभी अपना प्रभाव प्रकट करता है जब ग्यारहवे भाव मे कोई ग्रह हो।
"तख्त हजारी तभी पनपता,जब सप्तम देता राय है,
अपनी मंजिल तभी पकडता घर ग्यारह दे पैर तो"
अर्थात लगन मे बैठा ग्रह तभी अपनी मंजिल को पकडता है जब सप्तम की राय साथ मे हो और ग्यारह के पैर उसके पास हों। लेकिन इस कुंडली मे सप्तम और ग्यारह दोनो खाली है इसलिये लग्न के ग्रह का सो जाना सही मायने मे उचित है और वह अपने अनुसार केवल द्रश्य तो होता रहेगा पर अपने अनुसार फ़ल नही दे पायेगा।
लालकिताब के अनुसार दूसरा घर छठे घर को देखता है छठा घर आठवे को देखता है आठवा घर बारहवे को देखता है और बारहवां घर दूसरे घर को देखता है अगर इन घरो मे ग्रह विराजमान है चाहे वे शत्रु हो या मित्र वे अपनी चाल को आजीवन कायम रखते है।
"घर खायेगा बैठ दूसरा छठे का पकड सहारा वो,
अष्टम नैया पर सवार हो द्वार बारहवे जायेगा"
दूसरे घर मे बुध विराजमान है यानी जातक अपनी वाणी अपने कमन्यूकेशन और अपनी प्रकाशित बातो के बल पर वह दैनिक कार्यो और जीवन के प्रति ली जाने वाली भौतिक सहायताओ को प्राप्त करता रहेगा,लेकिन रोजाना के कामो के लिये उसे छठे भाव मे बैठे केतु का सहारा लेना पडेगा,कारण छठा घर नौकरी का भी है तो रोजाना के किये जाने वाले कामो का भी है,इस घर के द्वारा जीवन के प्रति काम तो करना पडेगा केतु नौकरी करवायेगा लेकिन नौकरी भी अपनी नही हो पायेगी नौकरी दूसरो के लिये ही करनी पडेगी यथा-
"केतु छठा हुकुम का कुत्ता दुम बारह से हिलती है,
घर दूजे से पेट भरेगा खतरा आठ का साथ रहे"
छठे घर के केतु के बारे मे कहा गया है कि वह हमेशा दूसरो के लिये ही काम करता रहेगा वह जब तक दूसरो के हुकुम पर काम करता रहेगा उसका पेट दूसरे घर का ग्रह भरता रहेगा लेकिन उसकी मनचाही खुशी तभी मिलेगी जब बारहवे घर के ग्रह उसे देख रहे हों,वह किसी भी प्रकार की रिस्क लेने के लिये आठवे घर के ग्रहों के प्रति हमेशा सतर्क रहेगा।
उपरोक्त कुंडली मे बुध जातक को भोजन देता है लेकिन उसे गुलामी छठे केतु की करनी होगी उसे बारहवे भाव के शुक्र मंगल और राहु अपने अनुसार फ़ल देते रहेंगे और जितना उसे बारहवा भाव दे देगा वह उसी के अनुसार अपनी शक्ति को आठवे घर के चन्द्रमा और शनि के लिये अपनी सतर्कता को परख कर अपने अनुसार कार्य करता रहेगा।
गुरु जो हवा है गुरु जो जीवन का कारक है गुरु के अनुसार ही धन सम्पत्तिको प्राप्त किया जा सकता है लेकिन वैदिक ज्योतिष के अनुसार कोई भी ग्रह गुरु को उल्टी नजर यानी वक्री द्रिष्टि से देखना शुरु कर दे तो गुरु के अन्दर वही गुण आने लगते है जो ग्रह उसे अपनी वक्र द्रिष्टि से देखता हो। कहने के लिये तो गुरु दसवे भाव मे अपने प्रभाव को नीच की हैसियत से प्रदान करेगा लेकिन जब अष्टम मे विराजमान शनि अपनी वक्र द्रिष्टि से देख रहा है तो गुरु अपनी हैसियत को शनि के अनुसार प्रकट करने लगेगा,यानी दसवे घर मे गुरु नीच की हरकतो को त्याग कर उच्च की प्रभावशाली क्रिया को शुरु कर देगा,जैसे एक पंडित के घर मे कसाई आकर निवास करने लगे तो कुछ समय बाद कसाई के अन्दर भी पंडित के गुण अपने आप ही प्रकट होने लगते है उसी प्रकार से वक्री शनि की द्रिष्टि गुरु के अन्दर नीचता को बदल कर उच्चता मे शुरु कर देगा।
"वक्र उच्चता देदेता है जब नीच में जाकर बैठे वो,
वही नीचता देदेता है जब उच्च मे आकर बैठे वो"
यानी कोई भी ग्रह अपनी उच्च राशि मे आकर वक्री हो जाये तो वह नीच का फ़ल प्रदान करने लगेगा और जब वह नीच घर मे जाकर बैठ जाये तो वह उच्चता प्रदान करने लगेगा।
जातक की कुंडली मे शनि वक्री होकर अष्टम मे वैदिक ज्योतिष से अपनी ही राशि मे वक्री हो गया है,इस वक्री शनि के अन्दर तकनीकी मंगल के साथ तकनीकी कमन्यूकेशन की राशि कुम्भ का असर मिल गया है शनि मार्गी मेहनत का मालिक है तो शनि वक्री दिमागी काम करने का मालिक है। चन्द्रमा जो जातक के लिये लगनेश का फ़ल प्रदान करने के लिये अपनी शक्ति दे रहा है तो शनि के साथ मिलकर वह दिमागी रूप से काम करने का मालिक बन जाता है। यह चन्द्रमा अगर सही रूप मे देखा जाये तो लालकिताब के अनुसार कुये का पानी माना जाता है चौथे घर का चन्द्रमा दरिया का पानी होता है तो बारहवे घर का चन्द्रमा आसमानी यानी बारिस का पानी कहा गया है। शनि वक्री दिमागी रूप से काम करने का मालिक है तो कुये का पानी जातक दिमागी रूप से बाहर लाने के लिये अपनी बुद्धि वाली मेहनत से प्रयोग मे लायेगा ही। बुद्धि मे भी मंगल की तकनीक होगी और राशि का कमन्यूकेशन होगा यानी जातक अपने अनुसार कमन्यूकेशन तकनीक मे मास्टर बन जायेगा और गूढ बातो को खोज खोज कर सामने लायेगा।
"आठ मे बैठा शनि चन्द्र कुये से भाप निकलती है,
बर्फ़ पिघलती धीरे धीरे उमर आखिरी फ़ल देता है"
आठवे भाव मे अगर शनि चन्द्र बैठ जाते है तो लम्बी उम्र को भी देते है और दिमागी रूप से सोचने और हर काम मे गहरी सोच सोचने के कारण उसकी सोच उमर के आखिर मे फ़ल देने लगती है। शनि को अगर बर्फ़ मान लिया जाये तो आठवा घर मंगल सुलगते हुये मंगल की धरती के अन्दर की जमीन कहा जा सकता है शनि धीरे धीरे अपने प्रभाव को पानी के रूप मे बदलता है और उम्र के आखिर मे अपने पानी से दूसरे भाव को तर भी करता है साथ ही उसके साथ वाले ग्रह भी वास्तविक रूप मे आजाते है जैसे इस जातक की कुंडली मे चन्द्रमा वक्री शनि के साथ उम्र के आधे भाग तक केवल पानी की भाप के रूप मे ही नजर आता है लेकिन पचासवी साल के बाद वह अपने वास्तविक रूप मे आने के बाद चन्द्र यानी जनता को अपने प्रभाव से तृप्त करने के लिये फ़ल प्रदान करने लगता है।
दक्षिण भारत की ज्योतिष के अनुसार कुंडली के लिये चार भाग बनाये गये है जिनके द्वारा लगन पंचम और नवम भाव को धर्म से जोडा गया है दूसरे छठे और दसवे भाव को अर्थ से जोडा गया है तीसरे सातवे और ग्यारहवे भाव को काम से जोडा गया है और चौथे आठवे और बारहवे भाव को मोक्ष से जोडा गया है इस प्रकार से कुंडली का रूप धर्म अर्थ काम और मोक्ष रूपी चारो पुरुषार्थो के द्वारा सुसज्जित किया गया है। जातक की कुंडली के अनुसार सूर्य शरीर विद्या से पूर्ण है पंचम भी सूर्य की सीमा मे है और नवम भी सूर्य की सीमा मे है,लगन को अन्य किसी भी ग्रह ने अपनी द्रिष्टि से नही नवाजा है। सूर्य अकेला है,यानी जातक की स्थिति अपने परिवार मे अकेली है,वह किसी भी कारण से अपने पिछले परिवार से जुडा नही है,उसके लिये जो सामने आने वाले ग्रह है वह केवल बुध है बुध बहिन और बेटी से सम्बन्धित है,जातक के छ: बहिने है जिसमें पांच की उपस्थिति है लेकिन एक का सीमांकन केतु के द्वारा खाली किया गया है,यह भौतिक परिवार से ही संबन्ध रखता है,जिसे दूसरे भाव से छठे भाव से और दसवे भाव से जोड कर देखा गया है,यानी माया से जुडा परिवार जब तक माया रूपी जगत व्यवहार चलता रहेगा जातक के सामने बुध अपनी स्थिति को प्रदर्शित करता रहेगा जैसे ही माया का परिवार सामने से दूर होगा बुध अपनी स्थिति को दूर कर लेगा। इसके अलावा गुरु जो इस माया के परिवार से जुडा है केवल जातक के द्वारा शादी विवाह लेन देन तक ही सीमित है उसके अलावा अगर जातक को कोई कष्ट आता है तो उस समय बाहरी लोग ही उसकी सहायता मे आयेंगे घर के सदस्य उसके पास केवल अन्तिम संस्कार के समय ही उपस्थिति हो सकते है। बुध केवल मौत के घर को ही देख रहा है।
आधुनिक ज्योतिष से अगर जातक की कुंडली को देखा जाये तो गुरु के साथ बुध यूरेनस प्लूटो नेपच्यून और केतु जुडे है जो अर्थ क्षेत्र की मीमांशा करते है। गुरु पर असर वक्री शनि का है केतु का भी है,लेकिन गुरु अपनी शक्ति बारहवे भाव मे बैठे शुक्र मंगल और राहु को प्रदान कर रहा है। चार आठ और बारह के ग्रह हमेशा अपनी औकात के अनुसार एक प्रकार की चाहत रखते है जो जातक के अन्दर पैदा होती रहती है और उस चाहत के लिये वह आजीवन अपनी जद्दोजहद को कायम रखता है,जब तक उसे चार आठ और बारह की चाहत नही प्राप्त हो जाती है जातक अपनी क्रियाओं को जारी रखता है।
यूरेनस को कमन्यूकेशन का ग्रह माना जाता है और आज के जमाने मे कमन्यूकेशन के मामले मे कम्पयूटर मोबाइल और नये नये कमन्यूकेशन के तरीके भी माने गये है। प्लूटो को बिजली से चलने वाली मशीन के रूप मे माना जाता है,नेपच्यून को भाव के अनुसार आत्मीय सम्बन्ध से जोडा जाता है। बुध यूरेनस का प्रभाव अगर सही रूप से देखा जाये तो वह ज्योतिष शिक्षा कानून आदि के लिये माना जा सकता है जातक के पास लोगो के लिये बताने और ज्योतिष आदि के सोफ़्टवेयर आदि के प्रोग्राम करने उसे सम्भालने समझने लोगो को प्राथमिक रूप से शिक्षा के रूप मे बताने के लिये भी समझा जा सकता है उसी जगह पर प्लूटो के साथ आजाने से जातक ज्योतिष आदि को समझाने के लिये मशीनी प्रयोग जैसे कम्पयूटर आदि को सामने लाने और उसे चलाने तथा संधारण करने आदि के गुणो से प्राथमिक रूप से योग्य माना जा सकता है। कुंडली का पंचम प्राथमिक सप्तम इन्टरमीडियेट और नवम उच्च शिक्षा के लिये माना जाता है जिसे कालेज शिक्षा भी कहते है लेकिन दूसरा भाव हमेशा अलावा प्राप्त उपाधियों के लिये भी माना गया है,जैसे डिग्री डिप्लोमा आदि।
पंचम का मालिक मंगल है मंगल का स्थान बारहवे भाव मे है,शुक्र और राहु साथ मे है,जातक की प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र ननिहाल से जुडा है,इन्टरमीडियेट शिक्षा के लिये सप्तम को देखने पर उसका मालिक शनि है शनि का स्थान अष्टम में चन्द्रमा शनि वक्री के साथ है यानी जातक की इन्टरमीडियेट की शिक्षा का स्थान बदला है,वह एक से अधिक स्थानो पर अपनी शिक्षा के लिये गया है। नवम का मालिक गुरु है गुरु का स्थान दसवे भाव मे जातक की उच्च शिक्षा कार्य करने के समय मे प्राप्त की जानी मानी जाती है जो किसी कालेज या शिक्षा स्थान मे जाने से नही हुयी है,वह कार्य करने के दौरान ही मानी जाती है। कार्य और शिक्षा का रूप प्रदान करने के लिये गुरु का साथ आजाने से है गुरु पर शनि वक्री अपना असर प्रदान कर रहा है यानी जातक की शादी के बाद ही जातक अपने आगे के शिक्षा वाले प्रभाव को प्राप्त कर पाया है। लेकिन उच्च शिक्षा के प्रभाव को जातक पूरा नही कर पाया है शिक्षा का आधा रहना गुरु पर शनि वक्री की नजर ने अपना असर प्रदान किया है और रहने के साथ साथ बार बार स्थान बदलने का प्रभाव भी जातक पर रहा है।
"शनि चन्द्र की युति मिल जाती,मन भटकता रहता है,
रहना करना रहे बदलता स्थाई शनि के बाद में"
जातक की कुंडली मे शनि की चन्द्रमा से युति मिल गयी है उसका मन बार बार बदलता रहता है एक काम को करने और एक स्थान पर रहने की गुंजायश जातक के अन्दर नही है वह बार बार अपने रहने वाले स्थान को भी बदलता है और कार्य करने के स्थान को भी बदलने मे अपनी रुचि को रखता है। गुरु से शनि की युति रखने के कारण धर्म और विज्ञान के साथ सम्बन्धो को भी साथ लेकर चलता है,एक आचार्य जैसे काम भी करने का मानस रहता है और करता भी है,गुरु की नजर शुक्र पर रहने के कारण प्रदर्शन करने और तकनीकी कारण को भी प्राप्त करता है और इन्जीनियरिंग के प्रति रुझान भी रहता है। इंजीनियर की डिग्री भी प्राप्त करता है,लेकिन मास्टर डिग्री नही मिल पाती है। गुरु मे शनि का असर मिलने के बाद राहु से युति होने के बाद जातक के पास कम्पयूटर से सम्बन्धित जानकारी और इसी प्रकार से ज्योतिष विषय मे कई प्रकार की विधाओं वाली विद्याये जातक को प्राप्त होती रहती है। आई टी के क्षेत्र मे भी जातक का नाम होता है। लेकिन रुझान के लिये जातक का दिमाग पराविज्ञान और ज्योतिष आदि की तरफ़ अधिक जाता है उसका कारण केवल शुक्र राहु और मंगल की तकनीकी प्रभाव ही माना जाता है। यह प्रभाव जातक को विभिन क्षेत्रो मे प्रदर्शित भी करता है और समाचार पत्रो पत्रिकाओं इन्टरनेट आदि पर जातक की छवि भी प्रदर्शित होती रहती है।
"गुरु की गद्दी घर दसवे से पचपन साला होती है,
पैंतीस पर शनि चुप हो जाता दौर दूसरा चलता है"
गुरु अगर दसवे भाव मे है तो जातक को गुरु की गद्दी पचपन साल के बाद ही मिलती है,इसके पहले शनि जो मकान दुकान कार्य आदि का मालिक है चुप हो जाता है इस चुप रहने के समय में-
"शनि के साथ नही देने पर राहु केतु देते साथ,
राहु भ्रम से केतु खाली दर दर की ठोकर देता है"
जब शनि साथ नही देता है तो राहु केतु जो शनि के चेले है उन्हे साथ मे कर देता है और राहु केवल भ्रम के जीवन मे जीने के लिये तथा केतु से जो भी कमाया जाता है वह केवल खालीपन ही पैदा करता है .
"नौ कमावे तेरह भूखा,बुध का बरतन खाली है,
सुबह शाम की चिन्ता रोके काम जो बनने वाला हो"
शनि के साथ नही देने पर बुध भी चुप जाता है और बुध जो बर्तन के रूप मे है खाली रहने लगता है,कितना ही कमाया जाये शनि की अनुपस्थिति से स्थिर ठिकाना नही मिल पाता है और नौ कमाने के बाद तेरह की भूख बनी रहती है,कोई काम अगर सोच कर करने की क्रिया को भी शुरु किया जाये तो राहु अपनी चिन्ता को देकर काम को भी पूरा नही होने देता है।

Thursday, December 6, 2012

कुम्भ लगन में बुध का प्रभाव

बुध को कमन्यूकेशन से जाना जाता है ग्रहों का युवराज है जब लगन मे आकर बैठ जाये तो व्यक्ति को अपने कार्य कौशल से जीवन मे उन्नति देता है,जातक मे बोलने की क्षमता का विकास कर देता है जातक जहां भी जाता है वह अपने कमन्यूकेशन और व्यक्तियों की सहायता से अपनी धाक जमाने भर के लोगो के साथ देने मे सहायता करता है। अकेला बुध सब कुछ करने मे समर्थ है जबकि अन्य ग्रहो के साथ बुध हमेशा उन्ही की गुलामी करता रहता है सूर्य के साथ अपनी बुद्धि और विवेक को प्रकट नही कर पाता है जैसे ही अकेला होता अपनी प्रभावशाली गरिमा से जातक को उन्नति का रास्ता तभी दिखा पाता है जब कोई ग्रह बुध के प्रति अपनी शत्रुता वाली नीति प्रकट नही कर रहा हो,इसके अलावा भी जातक को तब और प्रसिद्धि देता है जब जातक के जन्म के बाद से ही उसे कष्टो का सामना करना पडा हो। बुध की बिसात एक फ़ूल से की जा सकती है जो फ़ूल अधिक सुन्दर होता है वह कांटो मे ही अपनी गरिमा को कायम रख पाता है बिना कांटे के पेड मे बुध अपनी स्थिति को कायम नही रख पाता है कारण कोई भी बुध रूपी फ़ूल को कपट कर उसका आस्तित्व समाप्त कर सकता है।
लालकिताब से बुध बहिन बुआ बेटी के रूप मे जाना जाता है और बुध जब लगन मे स्थापित होता है कुम्भ लगन का जातक अपने संतान भाव के प्रभाव से केवल अपनी बुआ बहिन और अपने जीवन मे बेटी के कारण ही प्रसिद्धिइ ले सकता है। उपरोक्त कुंडली मे बुध लगन मे है लगन के बुध के लिये पहली लडकी कहा जा सकता है कुम्भ राशि के बुध के लिये बडी बहिन का रूप दिया जा सकता है,नवे भाव के शनि की युति से जायदाद और सम्पत्ति से युक्त बडी बुआ के रूप मे भी देखा जा सकता है। पारिवारिक स्थिति मे जब बुध को कोई सम्भालने वाला ग्रह होता है तो वह अपनी विशेष बुद्धि का असर जीवन मे प्रकट करने लगता है। जैसे कार्येश और तृतीयेश मंगल जब बुध को अपनी चौथी नजर बख्स रहे हो तो बुध को सम्भालने के लिये मंगल जिम्मेदार मान लिया जाता है,मंगल जिस ग्रह को अपनी द्रिष्टि से देखे तो समझ लेना चाहिये कि बुध कितना भी शैतान क्यों नही हो लेकिन दायरे से अधिक अपनी औकात को प्रकट नही कर सकता है।
उपरोक्त कुंडली मे भाग्येश और लगनेश का परिवर्तन योग है। भाग्येश बारहवे भाव मे है और लगनेश नवे भाव मे है,लगनेश की युति बुध से भी है और लगनेश का प्रभाव लाभ भाव से जुडकर तीसरे भाव के चन्द्रमा से भी है चन्द्रमा कर्जा दुश्मनी बीमारी का मालिक है और जब शनि चन्द्रमा से अपनी नजर लगा बैठता है तो व्यक्ति अपने को स्थिर नही रख पाता है,वह बात बात मे अपने मन को बदलने लगता है अभी कहता है कि यह काम करना है और तुरत ही अपने विचार को बदलने के बाद कहने लगता है कि यह काम नही करना है इस प्रकार से स्थिरता के कम होने से व्यक्ति अपने को उसी प्रकार से रख पाता है जैसे पानी मे पडा हुआ एक पत्ता पानी की लहरों से अपने को लहरो के द्वारा अस्थिर ही रखता है जब तक पानी की लहरे आती रहती है तब तक वह पत्ता ऊपर नीचे ही होता रहता है। अक्सर देखा होगा कि जो व्यक्ति अपने को प्रदर्शित करने में साफ़ दिखाई देते है या अपने को बात बात मे द्रवित करते रहते है वह अक्सर अन्दर से बडे कठोर होते है,वह अपनी किसी भी बात की मजबूरी को प्रकट करते समय द्रवित होकर सामने वाले को अपने प्रभाव मे ले तो लेते है लेकिन जैसे ही उनका वक्त बदला वे अपने को या तो बेरुखी से प्रदर्शित करने लगते है या दूरिया बनाकर किसी न किसी कारण का बहाना बनाकर सामने लाने से ही कतराने लगते है। इस प्रकार के व्यक्तिओ को प्रकृति बुध के रूप मे एक लडकी संतान को प्रदान करती है और वह लडकी अपने स्वभाव से इतनी बेरुखी इस प्रकार के व्यक्ति के सामने प्रकट करती है कि व्यक्ति लडकी के बिना रह भी नही सकता है और लडकी के सामने रहने पर झल्लाहट भी आती रहती है,लडकी का स्वभाव परिवार मर्यादा व्यवहार सभी मे देखने के लिये तो बहुत ही मधुर रहता है वह अपने को उच्चता मे प्रदर्शित करने के लिये अपनी योग्यता को अधिक से अधिक प्रकट करने का कारण तो पैदा करती है लेकिन दिमाग मे विदेशी नीति आजाने से वह अपने को पूरा विदेशी ही बना लेती है और या तो जातक से इतनी दूरिया बना लेती है कि जातक उसके लिये तडप पाल कर ही रह सकता है,संतान का कारक बुध होने और जल्दी से धन कमाने के लिये प्रभाव देने वाला बुध कला के क्षेत्र मे इतना अधिक प्रसिद्धि ले लेता है कि वह अपने जन्म स्थान से बाहर जाकर अपनी कला को प्रकट करता है और जातक को केवल मानसिक संतुष्टि से अपने जीवन को गुजारना पडता है।
जातक के लिये पुरुष संतान के रूप मे सूर्य जब त्रिक भाव मे होता है तो केतु अपना प्रभाव देने लगता है और संतान मे पुरुष संतान के रूप मे प्रकट होता है तथा भाव अनुसार जीवन मे अपना फ़ल प्रदान करता रहता है। केतु जो सहायक के रूप मे है केतु जो शाखा के रूप मे अपने प्रभाव को रखता है लेकिन केतु जब त्रिक भाव मे यानी छठे भाव मे होता है तो एक बीमार पुत्र के रूप मे देखा जा सकता है। जब वृश्चिक राशि के मंगल से अपनी युति को प्राप्त करता है तो केतु जो परिवार की शाखा को बढाने के लिये सामने होता है वह एक सूखी हुयी शाखा जो बीमारियों की तपन से तपने के बाद हरा भरा नही होने के कारण रूखा और बेरुखी से भरा हुआ माना जाता है इस प्रकार से लगन का बुध कभी भी जातक की नर संतान को आगे नही बढा सकता है यही कारण जातक की पुत्री के सामने प्रकट होता है,जातक की पुत्री भले ही अपनी कला के द्वारा संसार को अपने आधीन कर ले लेकिन कभी भी अपने वैवाहिक जीवन को या संतान आदि के द्वारा संतुष्ट नही कर सकती है।
इस प्रकार से जातक की बुध की स्थिति जो प्रभाव पैदा करती है वह इस प्रकार से है:-
जातक की बहिन बुआ बेटी संसार मे कला के क्षेत्र मे अपना नाम करते है उनके लिये कला के रूप मे मनोरंजन का क्षेत्र देश विदेश मे अपना प्रभाव देता है। शुक्र सूर्य और राहु की युति से बुध तरह तरह के कला के प्रदर्शन के तथा हाव भाव प्रकट करने के लिये अपनी शक्ति को प्रदान करते है। बहिन बुआ बेटी को शुक्र सुन्दरता देता है सूर्य राजसी चमक देता है और राहु असीमित क्षेत्र मे काम करने का कारण पैदा करता है। जातक केतु के रूप मे अपनी बहिन बुआ बेटी के लिये सहायक का काम करने के लिये ही अपनी जिन्दगी को निकालता है और यही कारण जातक की पुत्र संतान के लिये माना जाता है। जातक के जीवन मे बहिन के रूप मे चन्द्रमा एक बडी हैसियत को बनाता है,और अपनी हैसियत को तब और अधिक बना देता है जब वह पैत्रिक क्षेत्र के कारणो को एक सीमा से अधिक बढाने के लिये अपने प्रभाव को प्रकट करता है इस प्रकार से एक जीवन जो मनोरंजन या कला के क्षेत्र मे समर्पित होता है वह सरकार और जनता के द्वारा पुरस्कार देने के तथा एक से अधिक एक कारण बनाकर सामने करता है। जातक के लिये एक प्रकार की आफ़त पुत्र संतान के प्रति ही मानी जा सकती है जो अपनी अस्पताली जिन्दगी के कारण हमेशा एक ऐसे रोग से ग्रसित रहता है जो रोग अच्छे अच्छे चिकित्सको को समझ मे भी नही आता है और उसका निदान भी नही हो सकता है। निदान तभी हो सकता है जब मंगल केतु की युति को पैशाचिक क्रिया कलाप से दूर किया जाये।
वर्तमान मे राहु जातक के लिये एक डरावनी फ़िल्म की तरह से कहानी बना रहा है,एक शमशानी शक्ति जमीन के नीचे से पैदा होती है और वह धार्मिक रूप से चार लोगो को अपने प्रभाव मे लेती है वह अपने रूप को कभी तो राजकीय रूप मे प्रदर्शित करती है कभी अपने को सुन्दरता के रूप मे ले जाकर अपने लिये रूप को बनाती है कभी हरे भरे मैदानी क्षेत्र मे विनाश का रूप धारण कर लेती है और कभी पानी मे बहते हुये एक बेसहारा तिनके की तरह से आने को सामने करने के लिये प्रभाव देती है। 

Saturday, December 1, 2012

ग्रहों की योगकारक चिकित्सा

ग्रहों के जन्म से अथवा गोचर से शरीर पर प्रभाव पडता रहता है और उस प्रभाव के कारण या तो शरीर की क्षति होती रहती है या शरीर काम करने के योग्य नही रहता है। जब शरीर ही स्वस्थ नही है तो दिमाग मी स्वस्थ नही रहेगा और मानसिक सोच मे भी बदलाव आजायेगा या तो चिढचिढापन आजायेगा या किसी भी काम को करने का मन नही करेगा अच्छी शिक्षा के बावजूद भी जब समय पर शिक्षा का प्रयोग नही हो पायेगा तो धन और मान सम्मान की कमी बनी रहेगी। अक्सर यह भी देखा जाता है कि दो कारण एक साथ जीवन मे जवान होने के समय मे उपस्थित होते है पहला कारण अच्छी तरह से कमाई के साधन बनाने के और दूसरे रूप मे जीवन साथी के प्राप्ति के लिये,दोनो कारणो से शरीर मे कोई न कोई व्याधि लगना जरूरी हो जाता है जैसे कमाई के साधनो की प्राप्ति के लिये अधिक दिमाग का और मेहनत का प्रयोग किया जाना वही जीवन साथी और उम्र के चढाव के साथ कामसुख की प्राप्ति के लिये सहसवास आदि से शरीर के सूर्य रूपी वीर्य या रज का नष्ट होने लगना कुछ समय तो यह हालत सम्भाल कर रखी जा सकती है लेकिन अधिक समय तक इसे सम्भालना भी दिक्कत देने वाला होता है इसी कारण से अक्सर धन की प्राप्ति तो हो सकती है वह भी अगर पहले से कोई पारिवारिक या व्यक्तिगत सहायता मिली हुयी है और नही मिली है तो पारिवारिक जीवन भी खतरे मे होता है धन कमाने का कारण भी दिक्कत देने लगता है जीवन साथी से बिगडने लगती है और अक्सर यह कारण संतानहीनता के लिये भी देखे जाते है। इन सबके लिये शरीर का सही रहना जरूरी होता है,शरीर को सम्भाल कर रखने के लिये और मानसिक शांति के लिये लोग कई प्रकार के नशे की आदतो मे भी चले जाते है वे समझते है कि उनकी मानसिक शांति अमुक नशा करने से प्राप्त होती है लेकिन उन्हे यह पता नही होता है नशा कोई भी अपना घर अगर शरीर के अन्दर बना लेता है तो वह आगे जाकर आदी बना देता है बजाय लाभ के वह हानि देने लगता है आदि बाते भी पैदा होती है। ग्रहो से सहायता लेकर अगर सभी ग्रहों की मिश्रित चिकित्सा की जाती रहे तो ग्रह अपने अनुसार बल नही देंगे तब भी शरीर के अन्दर उस ग्रह की उपस्थिति होने से खराब कारण पैदा करने वाला ग्रह भी अपनी शक्ति से शरीर और मन के साथ बुद्धि को खराब नही होने देगा। मैने अपने अनुसार जो आयुर्वेदिक रूप ग्रहों के लिये प्रयोग मे लिया है उसके अनुसार पुराने समय के बीमार सिर के रोगी संतान हीन लोग ह्रदय और सांस के मरीज पेट की पाचन क्रिया से ग्रसित लोग कमजोरी से अंगो के प्रभाव मे नही रहने से अपंगता वाले लोग अपने वास्तविक जीवन मे लौटते देखे है। जब कोई भी आयुर्वेदिक दवाई का लिया जाना होता है तो पहले किसी भी प्रकार के नशे की लत को छोडना जरूरी होता है तामसी भोजन से भी बचना होता है जैसे अधिक खटाई मिठाई चरपरी चीजे त्यागनी होती है। इस आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रयोग करने से पहले यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी प्रकार से अन्य औषिधि जो डाक्टरो के द्वारा दी जा रही है,उसके साथ लेने से और भी दिक्कत हो सकती है साथ ही अगर पास मे कोई आयुर्वेदिक चिकित्सा का केन्द्र है या कोई वैद्य है तो उससे भी इस चिकित्सा के लिये परामर्श लेना जरूरी है।
हमेशा शरीर को स्वस्थ रखने के लिये आयुर्वेदिक चिकित्सा का नुस्खा
ग्रहों की रश्मियों के बिना वनस्पति भी अपने अनुसार नही उग सकती है,वनस्पति को पैदा करने मे ग्रहों का भी बहुत बडा योगदान है,जैसे सूर्य की अच्छी स्थिति मे ही गेंहू की पैदावार होती है,जब सूर्य पर किसी शत्रु ग्रह की छाया होती है या साथ होता है तो फ़सल मे किसी न किसी प्रकार की दिक्कत आजाती है,इसके अलावा भी शनि चने का कारक है और चना तभी सही रूप से पैदा हो पाता है जब जमीन मे नमी हो लेकिन बारिस ऊपरी कम हो अगर शनि की फ़सल मे पानी की अधिक मात्रा का प्रयोग कर दिया जाता है तो फ़सल मे पैदावार कम हो जाती है उसी प्रकार से चन्द्रमा की फ़सल चावल के समय मे अगर राहु का प्रकोप चन्द्रमा पर अधिक हो या किसी प्रकार से दु:स्थान पर हो तो फ़सल मे कीडे लग जाते है या खाद आदि के प्रयोग से फ़सल जल जाती है या कम हो जाती है इसके अलावा राहु की अधिकता होने पर जैसे कर्क के राहु मे चावल की पैदावार कम होती है लेकिन चावल के पुआल की मात्रा बढ जाती है। शरीर मे सभी प्रकार के ग्रहो के तत्वो को पूरा करने के लिये आयुर्वेद मे जडी बूटियों का प्रयोग किया जाता है।यह नुस्खा इस प्रकार से है:
  1. दक्षिणी गोखुरू (सूर्य बुध राहु) १०० ग्राम
  2. असगंध (शनि केतु) १०० ग्राम
  3. शुद्ध कौंच (गुरु शनि) १०० ग्रम
  4. शतावरी (मंगल गुरु) १०० ग्राम
  5. बिदारी कंद (चन्द्र शनि) १०० ग्राम
  6. सतगिलोय (राहु मंगल) १२५ ग्राम
  7. चित्रक की छाल (मंगल शनि) ३० ग्राम
  8. तिल काले (शनि केतु) १०० ग्राम
  9. मिश्री (चन्द्र मंगल) ४५० ग्राम
  10. शहद (चौथा मंगल) २२५ ग्राम
  11. गाय का घी (शुक्र राहु) १२५ ग्राम
  12. काली मूसली (अष्टम शनि चन्द्र) १०० ग्राम
  13. सफ़ेद मूसली (चौथा चन्द्र शनि) १०० ग्राम
  14. खरैंटी (राहु गुरु) १०० ग्राम
  15. तालमखाना (अष्टम चन्द्र शुक्र) १०० ग्राम
  16. मकरध्वज (बारहवां मंगल) ५ ग्राम
  17. प्रवाल पिष्टी (लगन का मंगल) २० ग्राम
  18. बसंत कुसुमाकर (बुध शनि केतु) २० ग्राम
इन अठारह जडी बूटियों को साफ़ सफ़ाई से पीस कर आटा चालने वाली छलनी से बडी परात में छान कर मिला लेना चाहिये बाद में घी और शहद को मिला लेना चाहिये,इन्हे मिलाकर किसी साफ़ स्टील के बडे बर्तम मे रख लेना चाहिये। यह दवाई किसी भी उम्र के लिये अत्यन्त फ़ायदे वाली है,बच्चों के दिमागी रूप से कमजोर होने पर दी जा सकती है जिन बच्चो की आंखो की कमजोरी है याददास्त कमजोर है उन्हे भी दी जा सकती है। चिन्ता करने वाले लोग भी इसे प्रयोग मे लाकर दिमागी काम कर सकते है नि:सन्तान लोग भी इस दवाई के लगातार प्रयोग से संतान को प्राप्त कर सकते है,जिनके जननांग मे कमजोरी है और वे सन्तान पैदा करने मे असमर्थ है वे लोग रोजाना सुबह शाम को डाबर का सांडे का तेल और मल्ल तेल मिलाकर जननांग पर चार बूंद मालिस करते रहे तो जननांग की कमजोरी मे फ़ायदा होता है। दिमागी काम करने वाले लोग इसे लेते रहे तो किसी भी प्रकार के दिमागी काम मे उनकी उन्नति देखी जा सकती है। इस दवाई को बच्चे आधा चम्मच फ़ीके गुनगुने दूध के साथ ले सकते है,बडे लोग एक चम्मच फ़ीके गुनगुने दूध के साथ तथा बुजुर्ग लोग डेढ चम्मच फ़ीके दूध गुनगुने दूध के साथ ले सकते है। इस दवाई के लेने के समय मे युवा लोग मैथुन आदि से एक महिने दूरी रखे,बुजुर्गों के घुटनों का दर्द पीठ का दर्द मास पेशियों का दर्द सभी मे यह रामबाण औषिधि की तरह से काम करती है। जिन लोगो के द्वारा इस दवाई को नही बनाया जा सकता है या सामान नही मिलता है वह मुझे ईमेल से लिख सकते है - astrobhadauria@gmail.com

ग्रहों की पंचायत और राहु का दखल

इस संसार मे दो लोग जीवन मे तरक्की नही कर पाते है एक वे जो कुछ नही जानते है और एक वे जो सब कुछ जानते है। नही जानने वाला व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार विषय वस्तु को प्राप्त करता रहता है और जीवन साधारण तरीके से निकल जाता है। जानने वाला व्यक्ति लोगो को बताते बताते अपना जीवन निकाल देता है और उसका जीवन भी अपने बारे मे कभी नही सोचने के कारण साधारण रूप से ही निकल जाता है। प्रस्तुत कुंडली के अनुसार मीन लगन की जातिका है और लगनेश गुरु छठे भाव मे वक्री होकर विराजमान है लेकिन लगनेश के मालिक सूर्य लगन मे ही विराजमान है,इस प्रकार से सूर्य और गुरु का परिवर्तन योग भी पैदा हो जाता है। जातिका के लिये कभी तो दिमागी रूप से सूर्य जैसी चमक चाहिये और कभी छठे गुरु जैसी लोगो की सहायता करने की आदत उनकी दुख पीडा को दूर करने के उपाय आदि। जातिका के लिये गुरु एक प्रकार से फ़लदायी तभी बनता है जब वह अपने अनुसार अपनी सर्वोच्च याददास्त का प्रयोग करे,कारण गुरु वक्री जब कुंडली मे बैठता है तो वह उसी भाव और राशि का प्रभाव इतना अधिक दे देता है कि जो साधारण लोग तीन साल मे कर पाये वह एक साल मे ही कर देता है। कुंडली मे लगन मे एक साथ पांच ग्रह की पंचायत है यह पंचायत शुक्र बुध शनि राहु सूर्य की है। इस पंचायत के सामने केवल केतु ही सहायक है बाकी चन्द्रमा शिक्षा के अन्दर है और गुरु रोजाना के काम काज के लिये अपनी युति कभी कभी दे देता है। इस पंचायत का प्रभाव साधारण रूप से समझने के लिये लगन को कढाही समझा जाये और ग्रहों को सब्जियों के रूप मे देखा जाये तथा सप्तम के केतु से पकाने की आग का रूप दिया जाये वक्री गुरु को सब्जियों के प्रति पकाने के समय ध्यान रखने का कारक समझा जाये,तथा मंगल को इन सब्जियों का रखवाला माना जाये,तो एक विचित्र बात पैदा होती है। मीन राशि का शुक्र आसमानी बादलो की तरह से है,जिन्हे देख तो सकते है लेकिन पकड नही सकते है अथवा उनका प्रयोग भी नही कर सकते है यह बादलो की मर्जी है कि वे बरसात देकर जमीन की प्यास बुझा दें या जमीन पर घनघोर बारिस देकर जमीन को दलदल बनादे या तालाब बनाकर सराबोर कर दें। मीन राशि का बुध हवा मे उडता हुआ गुब्बारे की तरह से है वह चलने वाली हवा पर निर्भर होता है अगर हवा गर्म है तो ऊंचा उठता जायेगा और हवा सर्द है तो जमीन की तरफ़ नीचे आता जायेगा,जिस दिशा की हवा चलेगी उसी दिशा मे चलता चला जायेगा,और कभी भी बिना किसी कारण के सीमा तक पहुंचने के पहले ही या सीमा तक जाने के बाद भी अपनी गति को कायम रखेगा या गति से विहीन होकर जमीन पर गिर कर फ़ूट जायेगा। मीन राशि का शनि हवा मे लटके पत्थर की तरह से है,वह दिवालो का सहारा लेकर खडा कर दिया जाये तो छत के रूप मे होता है और उसे अगर रहने वाले स्थान के रूप मे देखा जाये तो वह जन्म के बाद के स्थान को हमेशा के लिये त्याग कर दूसरे स्थान पर चला जाये केवल याददास्त मे रखा जाये कि अमुक शान पर पैदा हुये थे। मीन राशि का राहु अनन्त आकाश की कल्पना है,आकाश को देखा जा सकता है लेकिन उसकी सीमा का आकलन नही किया जा सकता है,वह प्रकाश के कारणो को समझ सकता है प्रकाश की गति से द्रश्य और अद्रश्य हो सकता है,इस राहु को एक ऐसे शिक्षा संस्थान के बारे मे या एक ऐसे निवास के बारे मे भी कल्पित किया जाता है जैसे एक जेल एक कालेज जहां से बिना अन्य की मर्जी से बाहर भी नही निकला जा सकता है और जहां से अपनी मर्जी से कोई काम भी नही किया जा सकता है सभी काम दायरे से बाहर के होते है,केवल राहु से सप्तम के केतु की खाली जगह को भरने के लिये ही इसका प्रयोग किया जा सकता है। मीन राशि का सूर्य आसमान मे चमकता हुआ सितारा भी है और सुबह के पहले प्रहर का उदय होता प्रकाश भी है जो प्रकाश अपनी सीमा को बढाने मे है एक आत्मा के रूप मे अगर देखा जाये तो आसमान से जगत को देखती हुयी आत्मा के रूप मे है वह देख सकता है लेकिन उसे करने के लिये साधनो के रूप मे कुछ भी प्राप्त नही है वह प्रकाश दे सकता है जिससे लोग देख सकते है वह गर्मी दे सकता है जिससे लोग अपने जीवन को चला सकते है,लेकिन खुद के लिये कोई भी कुछ नही कर सकता है।
इस प्रकार से ग्रहों की पंचायत का सम्मिलित रूप जो सामने आता है उसके अनुसार इस जातिका के जीवन को ख्याली जीवन के रूप मे देखा जा सकता है।कुंडली मे अकेला ग्रह केतु ही पूरी पंचायत से टक्कर लेने के लिये माना जाता है और केतु के कारण ही जातिका को केवल सहायता के काम और लोक हित के काम करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह केतु जातिका को कन्या राशि से सम्बन्धित कारको को प्रसारित करने का कारण पैदा करता है,यह कारण केतु के पीछे बैठे गुरु वक्री की योग्यता के अनुसार ही माना जा सकता है जैसा गुरु प्रभाव देता है वैसा ही केतु अपने अनुसार प्रसारित करने की अपनी योग्यता को सामने रखता है।गुरु और केतु दोनो ही डाक्टरी प्रभाव भी देते है अगर चिकित्सा के कारक ग्रह शनि और राहु केतु और गुरु को अपना असर प्रदान करते है। केतु के लिये तब और मुश्किल पैदा हो जाती है जब मंगल से केतु का षडाष्टक योग पैदा हो जाता है केतु मंगल को अपनी जड से उखाडने वाली नजर से देखता है और मंगल केतु को अपने लिये सहायक का काम करने के लिये सामने रखता है। मैने पहले भी कहा है कि केतु कलम है और वह उसी भाव और राशि के असर को जीवन मे लिखता है जिस भाव या राशि मे वह स्थापित होता है। केतु को लिखने के लिये जो विषय जातिका के सामने आते है वह शुक्र से आंखो की बीमारी स्त्री सम्बन्धी बीमारी प्रजनन सम्बन्धी बीमारी और उसके निदान के लिये बुध से स्नायु सम्बन्धी बीमारी खोपडी के विकार आदि के कारण शरीर के नर्व सिस्टम के लिये प्रकाशित करना शनि से बुद्धि के जडता वाले रोग शरीर के बाल खाल त्वचा वाले रोग एक साथ रहने पर लगने वाले छूत वाले रोग आदि के लिये तथा राहु से शरीर के इन्फ़ेक्सन कानो के इन्फ़ेक्सन छूत से लगने वाले रोग पेट और सांस के अन्दर लगने वाले रोग जननांग सम्बन्धी रोग जो सहसवास और अनैतिक सम्बन्धो के कारण पैदा होते है आसमानी रोग जैसे अचानक बीमार हो जाना डर जाना आदि वाले रोगो के लिये जाना जाता है। चन्द्रमा के पानी की राशि और राज्य के भाव मे होने से चन्द्रमा पानी वाले रोग पानी के कारण शरीर मे व्याप्त रोग सांस की दिक्कत जुकाम का अधिक बना रहना मोटापा और मनोवैज्ञानिक रोग के लिये जानकारी देते रहना,केतु से पेट के अन्दर आंतो वाले रोग पेट की बीमारिया पाचन क्रिया आदि के रोग भी केतु से जाने जाते है। सूर्य से हड्डी वाले रोग नेत्र रोग आंखो में लगने वाली चोटो के रोग पैरों के पंजो मे होने वाले रोग आदि के लिये भी सूर्य अपनी पहिचान को देता है। इस सभी ग्रहो की आपसी युति के लिये भी एक साथ इतने कारण बन जाते है कि उनका विश्लेषण करने पर बहुत बडी व्याख्या की जा सकती है और एक साधारण आदमी के लिये यह एक असम्भव जैसी बात हो सकती है।
अक्सर मीन राशि का राहु अचानक दिमाग को बदलने वाला होता है और जब देखो तभी किसी न किसी प्रकार से बने बनाये गणित को समाप्त कर देता है किसी भी प्रकार से सोचे गये काम को नही होने देता है और जो भी काम बन भी रहा हो तो केवल अपनी शक्ति से अचानक समाप्त कर देता है। राहु के साथ शनि के मिल जाने से शक्ति के रूप मे दवाइयों की जानकारी देता है और अचानक पारिवारिक स्थिति मे अपनी युति बनाकर काली आंधी के रूप मे सामने समझ मे आता है यह शनि राहु कृष्ण भक्ति के प्रति भी धारणा बना देता है और किये जाने वाले कामो मे भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति को आधार बनाकर चलने वाला होता है।अपने माता पिता के प्रति समर्पित होता है और आजीवन अपने सुख आदि को त्याग कर खुद के माता पिता के प्रति एक छतरी की तरह से तना रहकर अपनी सेवाओ को देता है। राहु के साथ जब सूर्य का मिलना होता है तो उम्र की बयालीस साल के बाद से ही स्थिति मे सुधार आने की बात मिलती है और बयालीस साल तक दूसरो पर ही निर्भर रहना पडता है जितना भी काम किया जाये वह एक प्रकार से फ़ूस के झोपडे जैसा ही असर प्रदान करने वाला होता है। रोज मर्रा की जिन्दगी मे अपनी स्थिति को हमेशा शंका और भ्रम से पूर्ण रखने के कारण आगे भी नही बढने देता है। मीन राशि का सूर्य राहु के घर मे ही होता है जो भी किया जाता है वह भ्रम और लोगो की शंका को दूर करने के लिये एक प्रकार से बडे संस्थान जैसे काम करता है लेकिन केतु की वजह से वह केवल अपने विचार शनि शुक्र की युति वाले कारक कागज पर उतारने के अलावा बुध राहु के संयोग से कम्पयूटर पर डिजायन बनाना आंकडो को लिखना फ़ार्मूला प्रकाशित करने की कल्पना करना आदि बाते मानी जाती है लेकिन बुध और राहु के असीमित गणित के कारण जो भी फ़ार्मूला आदि चिकित्सा क्षेत्र के लिये बनाये जाते है वह साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर होने की बजह से भी प्रयोग मे नही लिये जा सकते है।
अक्सर सूर्य शनि की युति के साथ चन्द्रमा का नवम पंचम का योग होने से जातक अपने माता पिता के रहते अपने जीवन के लिये कुछ भी नही सोच पाता है उसे अपने माता पिता का किसी भी कारण से ख्याल रखना होता है और उन ख्याल रखने वाली बातो से तथा किसी पर भी उनके लिये की गयी सेवा से संतुष्टि नही मिलने से जातिका अपने द्वारा ही की गयी सेवा भाव से संतुष्ट रहता है।मीन राशि के सूर्य के लिये एक बात और भी देखी जाती है कि जातक को जो भी राजकीय सम्मान या विदेशो मे प्रसिद्धि का कारण बनता है वह जीवन के अन्तिम समय मे या मृत्यु के बाद ही सम्मान मिलने की बात देखी जाती है इसी प्रकार से शनि की सूर्य से युति मीन राशि मे होने से जातक को समझने के लिये कई वैज्ञानिक एक साथ विचार विमर्श करते है तभी जाकर जातिका की छवि और उसके ज्ञान का आकलन कर पाते है एक व्यक्ति अगर जातिका के बारे मे समझना चाहता है तो वह जातिका के बराबर का ज्ञान रखे तभी सम्भव माना जा सकता है अन्यथा जातिका के ज्ञान के स्वरूप अलग अलग ग्रहो से पूर्ण शक्ति वाले ग्रह ही जातिका के लिये अपनी समझ को प्रसारित कर सकते है जैसे कुंडली मे बुध राहु शनि राहु सूर्य राहु शुक्र राहु आदि की युति रखते हो।
जातिका के परिवार के लिये अगर देखा जाये तो जातिका के दादा तीन भाई होते है और वे अपनी पैत्रिक जायदाद को छोड कर बाहर जाकर बसे होते है। दादा का स्थान जातिका के पैदा होने के स्थान से दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ़ होता है जातिका के पिता अपने पैत्रिक कारणो को सम्भालने मे कालेज शिक्षा न्याय आदि के कारणो से जुडे होते है माता का प्रभाव भी इन्ही क्षेत्रो के कारको से निबटने के लिये माना जाता है जातिका की छवि भी अपनी माता से मिलती है और दांतो की बनावट बहुत ही खूबशूरत होती है। जातिका का ख्याल केवल अपने पुराने जीवन से जुडा होता है वह इतिहास के बारे मे अधिक जानती है और अपने परिवार के पूर्व इतिहास को बताने मे रुचि रखती है। जातिका को भावुक भी माना जाता है और वह अपनी भावना को प्रकट करने के लिये ऊपर लिखे ग्रहो के अनुसार ही अपने को प्रसारित कर सकती है। अधिक सोचने और अधिक स्मय एकान्त मे व्यतीत करने से तथा बाहरी कारणो को लगातार ध्यान मे रखने से घटनाओ के अधिक समय तक याद रखने से शरीर के अन्दर यह राहु और चन्द्रमा मिलाकर एक प्रकार का एसिड तैयार करता रहता है जिससे आंखो पर भी असर पडता है सांस लेने के कारणो मे भी दिक्कत आती है और मानसिक बोझ भी बढता है, इस कारण से जातिका को मोटापे का शिकार भी होना पडता है अथवा अधिक एसिड बढ जाने से भोजन करने के बाद पेट का अफ़ारा आंतो का सही रूप से काम नही करना आदि बाते भी मानी जा सकती है। शुक्र राहु की युति से जातिका के अन्दर के प्रकार से अनगिणत रूप से आगे बढने का मानसिक प्रभाव भी उत्तेजना देने के लिये माना जा सकता है और जातिका की चाहत होती है कि वह अपने नाम और धन के साथ बहुत आगे बढने के लिये अपनी सीमा रेखा को बना सके उसके पास दो सहायक होते है जो उसके लिये अपनी भावनाओ से प्रकट करने की योग्यता रखते है लेकिन आपसी बहस करने और आपसी विचार एकत्रित नही होने के कारण अक्सर बातचीत मे तर्क वितर्क की मात्रा भी बढ जाती है।
वर्तमान मे चन्द्रमा से चौथे घर मे शनि के आजाने से तथा सूर्य से अष्टम मे शनि के आने से जो भी जातिका के द्वारा कार्य किया गया है उसे परखने का और समझने का समय शुरु हुआ है सूर्य से पिता के अष्टम मे शनि के आने से पिता को पाचन क्रिया सम्बन्धी बीमारिया और भोजन का नही पकना और लैट्रिन आदि की समस्या का कारण बनना माना जाता है तथा माता के चौथे भाव मे शनि के आने से माता को यात्रा वाले कारणो मे जाना साथ ही सर्दी वाली बीमारियों का होना छाती मे जकडन आदि होना भी माना जा सकता है। इस समय की युति से माता के लिये छाती मे जकडन का हो जाना और कफ़ का जमा हो जाना भी माना जा सकता है लेकिन खुद के दूसरे मंगल की द्रिष्टि इस चन्द्रमा पर होने से माता पर दवाइयों का प्रयोग भी सही समय पर किया जाना माना जा सकता है। राहु का गोचर आने वाले जनवरी 2013 तक नवम भाव मे रहने से पिता के लिये आक्समिक आघात का समय भी माना जा सकता है साथ ही राहु का गोचर अष्टम मे होने से निवास से दक्षिण पश्चिम दिशा में व्यापारिक चिकित्सालय मे काम करना भी माना जा सकता है। इसके अलावा नवम्बर 2014 से शनि की युति जब लगन के ग्रहो से होगी तभी जातिका के द्वारा लिखे गये और मानसिक तथा बुद्धि के कारणो से प्रकाशित कथनो के प्रति जैसे प्रकाशित होना और प्रकाशित होने के बाद उनके प्रसारण आदि की बाते मानी जा सकती है,वही समय जातिका के लिये धन और सम्मान से उदय होने का समय माना जा सकता है।

Friday, November 30, 2012

जिन्दगी घूम जाती है ग्रहों से !

लगन का रूप लगनेश पर स्थिति होता है और लगनेश स्थिति राशि के मालिक पर निर्भर होते है लगनेश की राशि के मालिक उस राशि के मालिक पर निर्भर होते है जो उनके निवास की राशि है और निवास की राशि के मालिक फ़िर से लगनेश की राशि मे उपस्थित होते है तो जीवन चक्र एक प्रकार से भटकने जैसा होता है। प्रस्तुत कुंडली कुम्भ लगन की है और जातिका के लगनेश शनि है शनि शुक्र की राशि मे विराजमान है शुक्र गुरु की राशि मे विराजमान है गुरु शनि की राशि मे विराजमान है। लगनेश चौथे भाव की वृष राशि मे है यह राशि वास्तविक रूप से चन्द्रमा की राशि है। चन्द्रमा का स्थान कुंडली मे बुध (व) के घर कन्या राशि मे है,लेकिन वास्तविक रूप से तकनीकी राशि वृश्चिक के घेरे मे है जिसका मालिक मंगल है। चन्द्रमा की राशि का मालिक वक्री बुध है और वक्री बुध का स्थान भी शनि की राशि कुम्भ मे है जिसका मालिक भी शनि है। केतु पंचम भाव मे है और बक्री बुध की राशि मिथुन मे है बुध का स्थान भी लगन मे है तथा बुध की राशि का मालिक भी शनि है। राहु का स्थान गुरु की धनु राशि मे है और वास्तविक रूप से यह स्थान शनि का है राहु गुरु के घर मे है गुरु शनि के घर मे है। मंगल का स्थान शनि के घर मे है,सूर्य का स्थान गुरु के घर मीन राशि मे है और मीन राशि का मालिक गुरु है गुरु का स्थान भी शनि के घर मे है,शुक्र का स्थान भी गुरु के घर मीन राशि मे है और मीन राशि का मालिक गुरु भी शनि के घर मे है। इस प्रकार से पूरी कुंडली शनि के घेरे मे आजाती है। शनि के आगे केतु ने अपनी रोक लगा रखी है। मिथुन का केतु लिखने वाली कलम से जाना जाता है धागे के काम से जाना जाता है। जातिका का जीवन केतु से सम्बन्धित कामो पर निर्भर है। केतु के अनुसार जातिका तीसरे नम्बर की बहिन है। पहले नम्बर की बहिन ग्यारहवे भाव के राहु के रूप में दूसरे नम्बर की बहिन बक्री बुध के रूप मे और तीसरे नम्बर पर मंगल की राशि मेष है,इस राशि का मालिक मंगल गुरु के साथ होने से भाई के रूप मे सामने आता है। इस प्रकार से जातिका तीन बहिन एक भाई है,लेकिन सभी किसी न किसी रूप मे शनि के घेरे मे है।
केतु का प्रभाव सीधे रूप में सप्तम नवम ग्यारहवे और लगन मे प्रभाव देने के लिये अपना असर प्रदान कर रहा है। केतु को लेखनी के रूप मे धागे के रूप मे दर्जी वाले कामो के रूप में माना जाता है। केतु के सप्तम मे राहु का प्रभाव होने से ज्योतिष के रूप मे भी जाना जा सकता है जो लाभ के कारको को प्रदान कर रहा है। यही राहु अपना असर बुध वक्री पर दे रहा है जो दूसरो को सिखाने के लिये माना जा सकता है,यह लिखने किताब आदि बनाने के लिये भी माना जा सकता है।लेकिन चौथे शनि की वक्री नजर होने के कारण लिखी गयी कारक किताब या तो चौथे भाव के शनि के प्रभाव से फ़्रीज हो गयी होती है या धन की कमी के कारण जनता मे या सीखने वाले लोगो मे पहुंच नही पाती है। यह शनि इच्छा पूर्ति के भाव मे होने के कारण अष्टम के चन्द्रमा से अपनी युति कर्जा लेकर रिस्क लेकर अपने को जोखिम मे डालकर बारहवे भाव के गुरु मंगल तक जाने के प्रयास मे है लेकिन बीच मे राहु का असर आने से गुरु मंगल तक शनि की सीधी पहुंच नही जा पा रही है। गुरु भी अपनी पूरी शक्ति से दूसरे भाव के सूर्य और शुक्र पर अपनी नजर दे रहा है लेकिन गुरु शुक्र की आपसी दुश्मनी के कारण तथा गुरु के नीच प्रभाव मे होने पर और शुक्र के उच्च प्रभाव के कारण गुरु कमजोर हो जाता है केवल अपने स्वार्थ की भावना से काम करने वाला होता है। सूर्य भी उच्च के शुक्र को अपनी शक्ति से कमजोर इसलिये कर रहा है क्योंकि सूर्य के तेज के कारण शुक्र का प्रभाव अस्त है। लगनेश से आगे का ग्रह अपनी शक्ति से जीवन को चलाने की शक्ति को प्रदान करने के लिये माना जाता है। लेकिन केतु का स्वभाव कि वह आगे वाले ग्रह से लेकर पीछे देने के लिये अपनी शक्ति को रखता है इसलिये वह जो भी कमाया जाता है वह कर्जा दुश्मनी के भाव मे दे रहा है चाहे वह ब्याज के रूप मे हो या दैनिक कार्यों की भरपाई के लिये हो। बारहवे भाव मे गुरु मंगल की युति से जातिका को जितना आता है वह उससे अधिक ज्ञान के काम करने की कोशिश करती है फ़लस्वरूप कार्य भी पूरा नही हो पाता है और किये गये काम मे कमी आने के कारण दिमाग भी सन्तुष्ट नही हो पाता है।
इस कुंडली मे अकेले लगनेश के उपाय करने से कोई फ़ल प्राप्त नही हो सकता है लगनेश के मालिक शुक्र को स्वतंत्र किया जाये,फ़िर गुरु को नीच के प्रभाव से बचाया जाये तब जाकर शनि की क्रिया जीवन के प्रति सही रूप से काम कर सकती है। चौथे शनि का रास्ता छठे भाव मे है दसवे भाव मे है और लगन मे है। लगन मे बक्री बुध शनि की स्थिति को सुधारने का काम कर सकता है,इस बक्री बुध को मार्गी बनाने के लिये रोजाना धर्म स्थान मे जाकर फ़ूल जो बुध के कारक है उन्हे चढाकर वापस लाया जाये तथा घर मे सामने के भाग में किसी गमले आदि में लगे पेड पर के नीचे रखा जाये जो पेड चौडे पत्ते वाला हो या किसी फ़ैलती हुयी लता के रूप मे हो। इस प्रकार से बुध का बल बढते ही शनि बुध की आपसी युति पहले से किये गये काम जैसे किताब आदि की कीमत रायलटी के रूप मे सही मिलने लगेगी। इसके बाद शनि शुक्र के मालिक गुरु का स्थान मंगल से हटाने के लिये गुरु को चौथे भाव के शनि से मिलाया जाये इसे मिलाने के लिये घर के वायव्य में उत्तर की तरफ़ आसन लगाकर दोपहर के समय ध्यान लगाया जाये और ध्यान में शिवजी को लाया जाये या ऊँ को सुनहले अक्षरों में ध्यान मे आरोपित किया जाये। वैसे गुरु मंगल की कारक देवी माता तारा के लिये दर्शन पर्शन और पूजा मंत्र - "ऊँ तारे तुरुतुरे तुरे स्वाहा" का जाप रोजाना शाम के समय दक्षिण-पूर्व की तरफ़ ध्यान लगाकर किया जाये। गले मे सोना पहिनना मूंगा और नीलम बायें हाथ की अनामिका और मध्यमा मे पहिनने से भी स्थिति मे सुधार आ सकता है और देश विदेश मे नाम के साथ साथ धन की स्थिति बहुत अच्छी बन सकती है।

Monday, November 19, 2012

रत्न धारण कैसे और कब करें ?

जीवन की दो गतियां होती है एक तो भौतिक होती है जो दिखाई देती है और एक अद्रश्य होती है जिसे देखने की चाहत जीव जन्तु जड चेतन सभी के अन्दर होती है। ज्योतिष मे शरीर को लगन से देखा जाता है.लगन एक प्रकार से द्रश्य है जो शरीर के रूप मे सामने दिखाई देती है,अगर लगन मे कोई ग्रह नही है तो इसका मतलब है कि शरीर का मालिक यानी लगनेश जिस भाव मे विराजमान है वह भाव लगन के लिये देखा जायेगा। इसी प्रकार से लगनेश द्रश्य होता है तो लगनेश जिस भाव को देखता है और वहां कोई ग्रह है तो लगनेश को जीवन में आमना सामना करने के लिये द्रश्य प्रभाव मिल जाता है और आजीवन लगनेश सामने वाले ग्रह से जूझता रहता है अगर सामने वाला बलवान होता है तो लगनेश हार कर जीवन को जल्दी समाप्त कर लेता है और लगनेश बलवान होता है तो सामने वाले ग्रहो को परास्त करने के बाद लम्बे जीवन को भी जीने के लिये शक्ति को प्राप्त करता है और गोचर से चलने वाले ग्रहो को भी समयानुसार प्रभाव मे लाकर अपने को मन से वाणी से कर्म से फ़लीभूत कर लेता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि शनि एक ठंडा और अन्धेरा ग्रह है और इसके प्रभाव से जीवन मे जो भी प्रभाव आता है वह केवल अपनी सिफ़्त के अनुसार ही मिलता है लेकिन वही शनि अगर वक्री है तो वह जीवन को उत्तरोत्तर आगे बढाने के लिये भी अपनी शक्ति को देता है। एक व्यक्ति शनि के मार्गी रहने पर केवल काम करना जानता है और एक व्यक्ति शनि के वक्री रहने पर लोगो से काम करवाना जानता है। सफ़लता उसी को मिलती है जो काम को करवाना जानता है काम को करने वाला अगर एक वस्तु का निर्माण कर सकता है तो काम को करवाने वाला कई वस्तुओं का निर्माण भी कर लेता है और काम करने वाले से काम करवाने के कारण अपना नाम धन मान सम्मान आदि को बढाता है। कुंडली के किसी भी भाव मे शनि के वक्री होने पर शनि को उत्तम ही देखा जाता है।

प्रस्तुत कुंडली एक व्यक्ति की है जिसने नीलम पन्ना जिरकान मूंगा पहिन रखा है और उसकी इच्छा है कि वह सूर्य रत्न माणिक को भी पहिने। लगनेश शनि मित्र भाव मे वकी होकर विराज रहे है,वक्री शनि के सामने द्रश्य कोई भी ग्रह नही है और बुद्धि का भाव खाली है गोचर से कभी कभी जो भी ग्रह सामने आजाता है जातक उसी के अनुसार अपनी बुद्धि को प्रयोग मे लाता है और गोचर के ग्रह का समय समाप्त होने पर जातक की बुद्धि फ़िर से खालीपन को महसूस करने लगती है। उदाहरण के लिये इस बात को ऐसे भी देखा जा सकता है कि लगन एक प्रकार से कार की तरह से है और पंचम स्थान कार को चलाने के लिये सीखी गयी विद्या ड्राइवरी की तरह से और कार के अन्दर कार को चलाने के लिये पेट्रोल की जरूरत को पूरा करने के लिये नवम का रूप भाग्य के रूप मे मिलता है,अगर तीनो भावो में ग्रह उपस्थित है तो कार अपनी उम्र के अनुसार चलती रहेगी और ग्रह नही है तो कार केवल तभी चलेगी जब गोचर से कोई ग्रह स्थान पर आयेगा। लेकिन जरूरी नही है कि कार के रूप मे शरीर सामने ही हो या बुद्धि के रूप मे ड्राइवर उपस्थित ही या पेट्रोल के रूप मे भाग्येश भी साथ हो जब तीने स्थानो के मालिक अपने अपने स्थान पर होंगे तभी कार रूपी शरीर की यात्रा शुरु हो सकेगी। अन्यथा गोचर से चलाने के कारण चन्द्रमा मासिक गति सूर्य वार्षिक गति में तथा अन्य ग्रह भी अपनी अपनी गति के अनुसार आते जायेंगे और जीवन को उम्र के अनुसार चलाते जायेंगे।

लगनेश शनि वक्री है और शनि के लिये लगभग सभी ज्योतिष ग्रंथ विद्वान आदि नीलम के प्रति धारणा रखते है,नीलम शब्द से ही मान्य है कि नीलम नीला होता है,शनि का रंग काला होता है,राहु का रंग नीला होता है,फ़िर शनि के लिये राहु का रंग नीला क्यों ? इसके बाद भी एक किंवदंती कि शनि मार्गी है तो भी नीलम और शनि वक्री है तो भी नीलम ? मार्गी शनि मेहनत करने वाला व्यक्ति है तो वक्री शनि बुद्धि को प्रयोग मे लाकर काम करवाने वाला व्यक्ति है,मेहनत करने वाले और मेहनत करवाने वाले के बीच के भेद को समझे बिना ही एक साथ दोनो के लिये एक ही रत्न को बताना क्या बेमानी नही है ? बुद्धिमान के लिये कोई रत्न काम नही करता है और बेवकूफ़ के लिये भी कोई रत्न काम नही करता है यह भी जानना जरूरी है,जैसे सपूत अगर है तो उसके लिये धन संचय करने से कोई फ़ायदा नही है वह अपने बाहुबल से धन को संचित कर लेगा और कपूत के लिये भी धन संचय से कोई फ़ायदा नही है वह अपनी बेवकूफ़ी से संचित धन को बरबाद कर देगा ! "पूत सपूत तो का धन संचय और पूत कपूत तो का धन संचय" वाली कहावत को भी समझना चाहिये। वक्री शनि वाला व्यक्ति बुद्धि को सही स्थान पर प्रयोग करे इसके लिये उसे ज्ञान की आवश्यकता होगी और ज्ञान के लिये हर कोई जानता है कि बुद्धि के भाव यानी पंचम का रत्न धारण करना उपयुक्त है,इसलिये जातक को कुंडली के अनुसार पंचम के लिये हीरा या जिरकान उपयुक्त रत्न है,जिसे चांदी या सफ़ेद धातु मे बनवाकर शनि की उंगली मध्यमा में शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिये। नीलम को पहिनने से चलने वाली बुद्धि वक्री शनि वाले व्यक्ति के लिये मार्गी होने पर कुंद हो जायेगी और वक्री समय मे जो कुछ समय के लिये है काम करती रहेगी। शनि को राहु के द्वारा सकरात्मक होने पर और केतु के द्वारा नकारात्मक होने पर ही संभाला जा सकता है,बाकी शनि को संभालने के लिये किसी भी ग्रह का प्रयोग रत्न के द्वारा करना एक प्रकार से बुद्धिमानी की श्रंखला मे नही माना जा सकता है।

जीवन की गति के लिये तीन कारण बहुत जरूरी होते है। एक तो शरीर को द्रश्य रखना,दूसरा बुद्धि को जाग्रत रखना और प्रयोग करते रहना तीसरे भाग्य की बढोत्तरी से ऊंची सोच शिक्षा परिवेश से बाहर निकल कर कानून धर्म समाज जाति देश आदि के द्वारा लगातार उन्नति का बल लेते रहना। अगर लगन खाली है तो लगनेश का रत्न,पंचम खाली है तो पंचमेश का रत्न और नवम खाली है तो नवमेश का रत्न धारण करना चाहिये। अगर तीनो भावो मे कोई ग्रह शत्रु या मित्र है तो उसके लिये ग्रह के अनुसार मिक्स प्रभाव देने वाला रत्न धारण करना जरूरी है। जैसे उपरोक्त लगन मकर है,और मकर लगन का मालिक शनि है,लेकिन लगन के समय मे सूक्षम रूप से देखे जाने पर श्रवण नक्षत्र की उपस्थिति जिसका मालिक चन्द्रमा है और इस नक्षत्र के चौथे पाये मे जातक का जन्म हुआ है तो उसका मालिक सूर्य बन जाता है इस प्रकार से सूर्य चन्द्र और शनि की मिश्रित आभा वाले रत्न को धारण करना लगन को द्रश्य करने के लिये काफ़ी है। सूर्य से गुलाबी चन्द्रमा से पानी की तरह से चमकीला और शनि के लिये काली आभा से पूर्ण रत्न का प्रयोग करना जरूरी है इस प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से एलेक्जेंडरा नामक रत्न मे तीनो आभा मिलती है,जातक को लगन को द्रश्य करने के लिये एलेक्जेन्डरा को सोने की अंगूठी मे बनवाकर दाहिने हाथ की बीच वाली उंगली मे पहिना जाना जरूरी है कारण पुरुष जातक है और उसी स्थान पर अगर स्त्री जातक होता तो बायें हाथ की बीच वाली उंगली मे यह रत्न काम करने लगता। इस जातक का पंचम स्थान भी खाली है,पंचम स्थान वृष राशि का है और यह स्थान वृष राशि का तेईस अंश बीता हुआ भाग है,इस अंश का मालिक रोहिणी नक्षत्र है और रोहिणी का मालिक चन्द्रमा है,इस प्रकार से बुद्धि की जाग्रति के लिये और द्रश्य प्रभाव देने के लिये शुक्र चन्द्र की युति वाला रत्न धारण करना जरूरी है। चांदी में जिरकान या हीरा पहिना जाना उपयुक्त है लेकिन पंचम का स्थान कालपुरुष के अनुसार सूर्य की राशि मे होने से सोने मे पहिने जाने से और भी फ़लदायी माना जा सकता है। इसी कुंडली मे जातक का नवा भाव भी खाली है इस भाव के लिये जातक तेईस अंश के मालिक हस्त नक्षत्र जिसका मालिक चन्द्रमा है के लिये गुरु कालपुरुष बुध राशि और नक्षत्र मालिक चन्द्रमा के अनुसार रत्न का उपयोग करने के बाद भाग्य जीवन की उन्नति और सहयोग के लिये आगे बढ सकता है। जातक केवल एलेक्जेन्डरा को ही प्रयोग करता है तो जातक को लगन पंचम और नवम का प्रभाव द्रश्य होने लगता है बाकी के रत्न धारण करने से गोचर से ग्रह के विपरीत अवस्था मे जाने से शनि के वक्री होने के समय में दिक्कत का कारण पैदा करने के लिये काफ़ी है।

Saturday, November 17, 2012

बुध


बुध को ज्योतिष मे संचार का ग्रह कहा गया है,यह सूर्य के आगे पीछे रहकर सांसारिक गतिविधियों को प्रकाशित करने का काम करता है,नये ग्रह के रूप मे होने के कारण इसके अन्दर बालपन की छवि भी देखी जाती है। नये ग्रह का तात्पर्य जो सूर्य के पास है वह नये ग्रह के रूप मे और जो ग्रह सूर्य से दूर है वह पुराने यानी बुजुर्ग ग्रह के रूप मे जाना जाता है। बुध पीढी बनाने का कारक भी है कानून को भी प्रसारित करने वाला है अपने को जमीन पर लाने के बाद हरी भरी प्रकृति को भी देने वाला है। मनुष्य जाति मे बुध का रूप कन्या के रूप मे भी देखा जाता है और बुजुर्ग बुध को हिजडे के रूप मे भी देखा जाता है। बुध गणित का कारक भी है और जो व्यक्ति बुध से प्रभावित होता है उसके लिये आकलन करना और जोडना घटाना आदि अच्छी तरह से ज्ञात होता है। बुध का स्वभाव अच्छे के साथ अच्छा है और बुरे के साथ बुरा। मेष राशि के लिये बुध प्रदर्शित करने की भावना को और कर्जा दुश्मनी बीमारी से जूझने के लिये अपनी गति देता है,बुध मेष राशि मे बलवान होने पर शौर्य और पराक्रम को प्रसारित करेगा और कमजोर होने पर कन्या सन्तान की अधिकता देगा और शुक्र को बरबाद करेगा। वृष राशि मे बुध कुटुम्ब के व्यक्ति के साथ आजीवन साथ देने के लिये बहिन बुआ बेटी के लिये अपनी मुद्रा को प्रसारित करता है साथ ही फ़ैसन पहिनावा आदि से धन प्रदान करवाता है चेहरे की सुन्दरता से मजबूत होने पर कोमलता देता है और कमजोर होने पर चेहरे पर झुर्रियां आदि देने के लिये माना जाता है। बुध वृष राशि मे बुद्धि का कारक भी है और यह अपने असर के कारण मजबूत होने पर कर्जा दुश्मनी बीमारी नौकरी शिक्षा आदि मे धन आदि के लिये अपनी तस्वीर अच्छी प्रसारित करता है वहीं कमजोर होने पर यह मन को एक प्रकार से विदीर्ण करने के बाद परिवार समाज घर सन्तान आदि के क्षेत्र मे कोई न कोई कमी खोजने की आदत देता है और अच्छे के साथ भी बुरा बर्ताव करने तथा बुरे के साथ भी अच्छा बर्ताव करने के लिये माना जाता है अक्सर इस राशि वाले लोगो के लिये बुध कमजोर होने पर घर की स्त्री संतान को बरबाद करने के लिये ही माना जाता है।

मिथुन राशि के लिये बुध शरीर जाति और कुल की समीक्षा के लिये देखा जाता है अगर मजबूत है तो लगनेश होने के कारण राजयोग भी दे सकता है कमन्यूकेशन और मीडिआ आदि के क्षेत्र मे अपनी मजबूती से नाम और प्रभाव भी रोशन करता है वही अगर कमजोर है तो वह चुगली करने और एक दूसरे को लडवाने तथा फ़ूट डालने के लिये भी जाना जाता है अक्सर कमजोर बुध के लोग ही कूटनीति की भाषा का प्रयोग करते है और शांति मे अशांति का प्रयोग करते है। इस राशि वाले लोगो के लिये चौथे भाव का मालिक होने से माता मन मकान घर की शांति और वातावरण के लिये वाहन आदि की जानकारी के लिये किये जाने वाले व्यापार और इसी प्रकार के कारणो के लिये भी जाना जाता है इस राशि वाले मजबूत बुध होने कर कर्जा देकर ब्याज कमाने घर को बनवा कर उससे किराया लेने नौकरी आदि के लिये कन्सलटेंसी जैसी सेवा बनाकर दलाली से नौकरी आदि दिलवाने के लिये भी अपना काम करता है। वहीं कमजोर होने पर घर मे कन्या संतान या बहिन बुआ बेटी के दखल से माहौल को दूषित करने के लिये भी जाना जाता है। मंगल के साथ चौथे भाव मे युति देने पर या तो बकरी पालन का धंधा करवा देता है या पक्षी जैसे मुर्गी फ़ार्म आदि बनवा कर रोजगार देने का कारक बन जाता है।चन्द्रमा के साथ मिलकर कृषि आदि के क्षेत्र से हरी सब्जियों का काम करवाना शुरु कर देता है राहु के साथ होने पर बैंकिंग आदि के क्षेत्र के प्रति कम्पयूटर सोफ़टवेयर आदि का काम करवाने के बाद बेव साइट का व्यवसाय करने के बाद धन की उपलब्धि करवाता है।

कर्क राशि के लिये बुध का स्थान बाहरी सम्बन्धो और गुजरे हुये इतिहास को बताने की शक्ति देता है बारहवे भाव का कारक होने के कारण स्वार्थी कारणो से भावुकता को भी देता है और छोटे मामा या मौसी के जीवन साथी के कारणो मे अपने समय और धन को बरबाद करने के लिये भी माना जाता है मीडिआ आदि के क्षेत्र मे जाकर जनता की गतिविधियो और धन आदि की समीक्षा करने के लिये तथा गोलमेज सभा मे अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाने के लिये भी माना जाता है।आसमानी जानकारी ग्रहो के बारे मे स्पष्ट विवरण भी मजबूत बुध के कारण ही समझने को मिलता है लेकिन कर्क राशि के लिये तीसरे भाव का मालिक होने के कारण जातक की पहिचान उन्ही कारणो मे जानी जाती है जो कारण ब्याज किराया किस्त देने का काम नौकरी आदि के लिये भागने का लोगो के लिये या तो इन कारणो को सुलझाने का काम करने की बात मानी जाती है या खुद ही इन्ही कारणो मे घिरे रहने की बात मानी जाती है।

सिंह राशि में बुध का स्थान नकारात्मक रूप से धन आमने सामने की सहायता राज्य या राजकीय क्षेत्र से मिलने वाले लोन या सबसिडी वाली सहायता के लिये जाना जाता है वही कमजोर होने पर गाली गलौज देना और बात बात मे कर्जा दुश्मनी बीमारी को पैदा करना माना जाता है या तो ग्यारहवे भाव का मालिक होने से लाभ देने वाला होता है या लगातार हानि देने वाला होता है लाभदायी होने के लिये एक बात और भी मानी जाती है कि अगर जातक की बडी बहिन है और उससे लगातार सम्बन्ध स्थापित है तो लाभ वाली बात को देखा जाता है और या तो बडी बहिन नही है या सम्बन्ध नही है तो लाभ की जगह पर हानि की बात मानी जा सकती है। बुध की सहायता से इस राशि वाले राजयोग को भी प्राप्त कर सकते है और बदनामी के कारणो को भी झेलने के लिये बुध के प्रभाव को समझ सकते है। चोटी रोटी और बेटी तीनो को समझना है तो सिंह राशि वाले इसका जबाब सही दे सकते है।

कन्या राशि के लिये बुध अपनी योग्यता से सेवा वाले कामो मे नाम देने वाला बना देता है। बोलने की भाषा और व्यवहार से ही व्यक्ति की पहिचान को बना देता है और सेवा भावी होने से या तो बडे संस्थान देश समाज मे नाम देने वाला बन जाता है या राजयोग देकर जीवन को अपने समय मे उन्नति के लिये आगे कर देता है। माता के स्वभाव को या तो धार्मिक बना देता है या पैदा होने के बाद माता के अन्दर बदनामी पैदा करने वाले कारण पैदा कर देता है। यही बात पिता के लिये भी मानी जाती है।

तुला राशि के लिये बुध हमेशा ही किसी न किसी प्रकार से बदनामी देने के लिये अपनी गति को प्रदान करता है नवे भाव का मालिक होने के कारण या तो कानून के क्षेत्र मे नाम देता है या समाज मे बडी इज्जत को देने वाला बन जाता है बिगडने पर यह घर के बहिन बुआ बेटी पर गलत असर डालता है और या तो उनके पारिवारिक जीवन को बिगाड देता है या बहिन बुआ बेटी को आजीवन झेलने के लिये घर मे ही रख देता है। मन के अन्दर देवी भक्ति की तरफ़ ध्यान को देता है और इन्ही कारको मे जैसे धर्म स्थानो मे देवी स्थानो की यात्रा करना लोगो के लिये कर्जा दुश्मनी बीमारी को दूर करने के लिये व्यवसाय आदि मे धन आदि की उधारी को प्राप्त करने के लिये देने के लिये भी माना जाता है तुला राशि के लिये बुध हमेशा धन की सहायता से दो बाते पैदा करता है एक तो जिसे धन अपने हाथ से सहायता के लिये दे दिया जाये तो वह धन भी वापस नही आता है और जिसे धन दिया जाता है वह व्यक्ति या तो दुश्मनी पैदा कर लेता है या किसी न किसी प्रकार से बदनामी वाले कारण पैदा कर देता है।

वृश्चिक राशि के लिये बुध मजबूत होने पर वरदान साबित होता है और कमजोर होने पर अघोरी बना देता है।इसका कारण भी यह माना जाता है कि बुध वृश्चिक राशि के लिये अष्टम का प्रभाव देता है जो अघोरी होने पर शमशानी कारणो को सामने लेकर आता है और जो भी बात इस राशि वाले जातक के द्वारा की जाती है वह केवल बिच्छू जैसे डंक मारने की नियत से की जाती है इन्ही कारणो से वृश्चिक राशि का जातक या तो बोली पहिचान मे खरा कहा जाता है या बोली के कारण ही उसे पहिचाना जाता है यही कारण उसके लिये आजीवन लाभ के लिये भी माने जाते है।

धनु राशि के लिये बुध एक तो राज योग देने वाला होता है दूसरे वह सप्तम का मालिक होने से अगर वह स्त्री जातक है तो पति के रूप मे उसे भोला भाला मासूम पति ही प्राप्त होता है बुध का प्रभाव कभी अन्य ग्रहो के साथ होने पर अपना नही होता है वह वही फ़ल प्रदान करता है जिन ग्रहो के साथ साथ वह अपने गोचर से या जन्म के समय से होता है। बुध अगर शुक्र के साथ स्त्री जातक की कुंडली मे छठे भाव मे है तो वह जीवन साथी को किसी न किसी कारण से अन्य स्त्री सम्बन्धो से जोड कर रखता है और एक प्रकार से इस राशि वाले जातक के लिये अपने जीवन साथी के प्रति ही दिक्कत का कारण माना जाता है अगर शुक्र वकी है तो धनु राशि वाले जातक के लिये बुध का प्रभाव बहुत ही उल्टा हो जाता है वह वक्री शुक्र की सिफ़्त के अनुसार अपने जीवन को लेकर चलने वाला होता है और कभी तो वह पति पत्नी के सम्बन्धो मे चलना शुरु हो जाता है और कभी वह अपने को स्वतंत्र मानकर दूर के रिस्तो की तरफ़ अपना प्रभाव देने लगता है अक्सर इस कारण मे पति पत्नी का विवाद बढ जाता है और वह कोर्ट केश या इसी प्रकार के कारणो से स्त्री जातक है तो पति से मासिक आमदनी के अलावा और कुछ हासिल नही कर पाता है और वह पुरुष है तो वह आजीवन अपने जीवन की गृहस्थी अविश्वास के साथ जीने को मजबूर हो जाता है। धनु राशि के लिये बुध अक्सर पति पत्नी के सम्बन्धो मे नीरसता को इसलिये भी दे देता है क्योंकि बुध का प्रभाव यौन सम्बन्धो मे बेरुखी को भी देने वाला होता है।

मकर राशि वालो के लिये बुध का प्रभाव सेवा जैसे कामो के लिये और कोर्ट केश आदि के कारणो मे वह आगे बढाने वाला होता है साथ ही बैंक बीमा बचत और नौकरी आदि के कामो के लिये वह अपनी स्थिति को इस राशि वालो के लिये फ़ायदा देने वाला होता है काम के समय मे अपनी पहिचान बनाना और गैत विद्या मे अपने को आगे लेकर चलना भी एक कारण माना जाता है अक्सर यह बुध जातक के जीवन साथी मे एक प्रकार की बोली बातचीत आदि से परेशान करने वाला भी माना जाता है और वह जीवन साथी को अक्सर ढोकर चलने वाली पोजीसन जैसे मानकर चलने वाला होता है। नवे भाव का स्वामी होने से जातक को नौकरी धन आदि के लिये या तो अपने पिता के स्थान को देखना होता है या अपने मित्रो बडे भाई के लाभ के साधनो से कमाने का कारण बनता है यही बात उसके लिये अपनी मानसिक स्थिति को समझने के लिये भी मानी जाती है वह अपने मानसिक कारणो मे उन्ही बातो को अधिक लेकर चलने वाला होता है जहां बातो का प्रभाव होता है जैसे किसी ने उसके प्रति क्या कहा है और वह कही जाने वाली बात कितनी उसके जीवन मे प्रभाव देने वाली है वह छोटी छोटी बातो को भी कभी कभी इतना तूल दे देता है कि जीवन एक प्रकार से अपनी पहिचान बनापाने के लिये उसे श्रम और अभाव से भी जूझना पडता है।

कुम्भ राशि वाले जातक अपनी बुद्धि को तभी विकसित कर पाते है जब वह बोलने चालने की कला मे अपने प्रभाव को प्रदर्शित करने वाले होते है अक्सर बुध का प्रभाव उनकी प्राथमिक शिक्षा पर पडना अधिक देखा जाता है अगर उनकी स्थिति घर मे छोटे भाई बहिन के रूप मे है तो वह अपने जीवन को अपनी बडी बहिन के पास बिताने के लिये या अपनी प्राथमिक शिक्षा को बहिन बुआ के अनुसार ही प्राप्त करने के लिये माना जाता है। अकर कर्जा दुश्मनी बीमारी के समय मे कुम्भ राशि वाले जातक अपने लिये कोई न कोई बुध का कारण ही बना लेते है। उनकी पहिचान भी एक प्रकार से उनकी बहिन बुआ बेटी के द्वारा ही मानी जाती है। अगर बुध मजबूत है तो उनकी संतान जो स्त्री सन्तान के रूप मे होती है वह घर की मर्यादा और जीवन के अन्दर तरक्की के क्षेत्र विकसित करने मे कामयाब हो जाती है और बुध कमजोर है तो वह गलत रास्ते मे जाकर सामाजिक मर्यादा और गुप्त सम्बन्धो के कारण अपनी पहिचान को बिगाडने के लिये भी उत्तरदायी बन जाता है। इसी प्रकार से अगर इस राशि वाले सेवा या नौकरी के क्षेत्र मे है तो उनके सम्बन्ध किसी न किसी प्रकार से उन लोगो से बन जाते है जो उनके लिये बीमारी या कर्जा या किसी प्रकार की दुश्मनी मे उनकी सहायता करते है या गाढे वक्त पर उनकी आर्थिक या सेवा वाली सहायता मे होते है।

मीन राशि वाले जातक के लिये बुध एक प्रकार से वरदान दायक तब बन जाता है जब वे अपनी बोली और व्यवहार से रहने वाले क्षेत्र अपने घर और यात्रा आदि मे सम्भालने वाले काम के अन्दर केवल अपनी बोली का प्रयोग करते है और आदेश आदि के द्वारा काम करवाने की कला को प्रदर्शित करते है। अक्सर इस राशि वाले जातक तभी सफ़ल होते है जब उनके जीवन साथी का स्वभाव सेवाभावी होता है और उनके सामने आने वाले कर्जा दुश्मनी बीमारी और नौकरी आदि के क्षेत्र मे आने वाली समस्याओ को सुलझाने की कला जानने वाला जीवन साथी हो।  बुध की कमजोरी मे मीन राशि के जातक अक्सर अपने जीवन साथी के व्यवहार से दुखी होते है घर मकान माता और घर के सदस्यों की छींटाकसी से भी परेशान होते देखे गये है।

Monday, November 5, 2012

विवाह मे देरी

कहा जाता है कि जन्म माता पिता के आधीन जीवन ईश्वर के आधीन विवाह समाज और परिवार के आधीन तथा मौत खुद के कर्मो के आधीन होती है। मनुष्य किसी भी स्थान पर अकेला नही चल सकता है। माता पिता के बिना जन्म नही हो सकता है,माता पिता के कर्म और समाज का व्यवहार व्यक्ति के लिये जीवन साथी और तरक्की के लिये नियत समय पर अपने अपने फ़लो को प्रदान करने के लिये मुख्य कारक माने जाते है। प्रस्तुत कुंडली कुम्भ लगन की है माता का कारक ग्रह शुक्र है और पिता का कारक ग्रह भी नवे भाव के अनुसार शुक्र ही है,शुक्र की स्थिति कुंडली मे दूसरे भाव मे उच्च राशि मीन मे है और शुक्र को बल प्रदान करने वाले ग्रहों केवल वक्री मंगल और वक्री शनि ही है.माता से पंचम मे और पिता से बारहवे भाव मे स्थापित शनि और मंगल की युति जातक के प्रति अपमान जोखिम शरीर के अन्दर बल की कमी चतुरता की अधिकता जीवन आराम वाले साधनो की अधिकता,पिता के भाव मे गुरु वक्री होने से जातक के पिता के लिये उन्ही कारको समझना पडता है जो कारक पिता के लिये दिमाग से धन कमाने अपनी अच्छी याददास्त के सहारे जीवन मे तरक्की करना कानूनी न्याय सरकारी क्षेत्र मे अपना अधिकार जमाना सरकारी कारणो से वकालत जैसे काम करना आदि बाते मानी जाती है माता के भाव मे बुध के स्थापित होने से माता का व्यवहार बातूनी धन सम्बन्धी कारणो को समझकर घर परिवार व्यवहार आदि के प्रति अधिक से अधिक चिन्ता करने के बाद अपनी ही सन्तान के प्रति शरीर मे कई बीमारियों के पैदा करने के बाद खून और शक्ल सूरत मे कमजोरी के कारको को पैदा करना माना जाता है। अक्सर माता का स्वभाव चन्द्रमा से भी देखा जाता है और जब चन्द्रमा राहु के घेरे मे आजाये तो माता को मानसिक रूप से कनफ़्यूजन के कारको मे गिना जाने लगता है और पिता का कारक सूर्य माना जाता है तो पिता से तीसरा राहु होने के कारन उनके अन्दर जनता से सम्बन्धित कनफ़्यूजन को शान्त करने की कला और न्याय तथा इसी बाहरी सहायताओ से दूसरो के लिये सहायता करना भी माना जाता है। जातक के अन्दर खून मे पिता के और माता के प्रभाव का समावेश होने से जातक के अन्दर बुद्धि से काम करवाने वाली कला याददास्त का तेज होना धर्म और कानून के अलावा भाग्य आदि के प्रति गुरु के वक्री होने से उल्टी क्रिया को करना शुरु कर देना जैसे बडी शिक्षा के अन्दर जाकर उसी प्रकार की शिक्षा को प्राप्त करना जो विदेशी कारको से जुडी हो और व्यापारिक कला के अन्दर गुरु बुध की षडाष्टक नीति से विदेशी भाषा के साथ साथ एक और भाषा का सही आकलन करना आता हो ज्योतिष तन्त्र और इंजीनियर जैसे दिमाग से दूसरो को सिखाने तथा बताने के साथ साथ उल्टे सम्बन्धो को सुधारने की कला भी जातक के अन्दर यही ग्रह युति पैदा करती है।

चन्द्रमा के अनुसार जातक का संसारी जीवन एक प्रकार से मिथुन का चन्द्रमा होने से कमन्यूकेशन के क्षेत्र मे उन्नत माना जाता है जातक को कम्पयूटर के ज्ञान तथा सोफ़्टवेयर की अधिक जानकारी शिक्षा के साधनो और कोड आदि के बनाने से सोफ़टवेयर बनाने उसे प्रयोग करने और संचार के साधनो मे किसी भी विदेशी सहयोग से नये नये कारण पैदा करने के लिये भी माना जा सकता है। राहु के साथ चन्द्रमा के होने से जातक की सोच मे एक प्रकार का इतना बडा फ़ैलाव हो जाता है कि वह अपनी जीवन की सोच को इकट्ठा करना चाहे तो भी वह इकट्ठा नही कर पाता है यही बात शिक्षा के प्रति अगर चन्द्रमा के पंचम भाव मे आने से देखी जाये तो जातक की शिक्षा का बदलाव पंचम से पंचम मे गुरु के वक्री होने से भी देखा जा सकता है,एक प्रकार से अपनी गरिमा को दूर करने के बाद उस गरिमा के ऊपर चलते जाना जिसका समाज परिवार व्यवहार आदि मे कोई स्थान नही माना जाता है और इन्ही कारणो से समाज ऐसे जातको को अपने से धीरे धीरे दूर करता चला जाता है। जातक अपने को अकेला समझता जरूर है लेकिन हर प्रकार से अपनी काबलियत पर भरोसा करने के कारण कभी अपने को हारा हुआ भी नही मानता है रिस्तो के प्रति स्वार्थी बदलाव से भी जातक को गृहस्थ जीवन चलाने मे दिक्कत का सामना करना पडता है। गुरु के वक्री होने के कारको मे यह भी देखा जाता है कि जातक विवाह आदि सम्बन्ध अपने कुल या रीति से करता भी है तो वह विवाह के कारणो को निभा पाने मे असमर्थ रहता है वह अपनी सोच के कारण और आधुनिकता के भ्रम मे वह सब नही कर पाता है जो परिवर समाज और जान पहिचान वाले लोग चाहते है इस प्रकार से या तो सम्बन्ध बन नही पाते है और बन भी जाते तो वह अधिक समय तक चल नही पाते है। सबसे बडा कारण एक और भी माना जा सकता है कि पंचम मे चन्द्रमा के साथ राहु के होने से सोच प्रेम प्रसंगो के प्रति अधिक उलझ जाती है वह अपने अन्दर इस बात का गहन विचार नही कर पाता है कि आखिर मे प्रेम प्रसंगो के बाद का जीवन कैसा रह पायेगा। इस प्रकार के जातक अपने को कभी कभी शनि मंगल के अष्टम मे वक्री होने के कारण सेक्स आदि के कारणो मे असमर्थ भी मान लेते है और सन्तान के अभाव का रूप भी देखा जा सकता है उनका जीवन बुध के चौथे भाव मे होने से केवल बातो मे ही उलझ कर रह जाता है और सप्तम से दूसरे भाव मे शनि मंगल के वक्री होने से जो भी जीवन साथी का चुनाव करने के बाद जीवन मे मान्यता दी जाती है वह वैवाहिक जीवन को रति क्रिया के अभाव मे एक प्रकार से बदलाव वाली नीति को धारण करने मे ले कर चलने वाला हो जाता है और इस प्रकार से जातक को या तो पुत्र की प्राप्ति नही हो पाती है या होती भी है तो वह अपने को अपने माता पिता से दूर ले जाकर अपने जीवन को जीने के लिये मजबूर हो जाता है।

लगन से शुक्र का पास होना कई रिस्ते बनने और बिगडने वाली बाते तब और करने लगता है जब शुक्र को शनि मंगल की वक्री नजर लग गयी होती है,उसे जो भी रिस्ता मिलता है वह शुक्र के सामने सूर्य के होने से एक प्रकार की चमक दमक को सामने लाने की कोशिश मे रहने लगता है कि वह ऐसे सम्बन्ध को बनाये जो उसे और उसके परिवार को एक प्रकार से पारिवारिक स्थिति मे बडप्पन दे सके,मकर यह सोच तब अधूरी रह जाती है जब सूर्य का प्रभाव तीसरे भाव मे होने से और पिता की इज्जत और धन आदि के कारको मे वह अपने बराबर का रूप खोजने मे अधिक समय को लगाने का रूप भी सामने आजाता है। उपरोक्त कुंडली मे विवाह की देरी के लिये जो कारण है वह इस प्रकार से है :-
  • लगनेश शनि अष्टम मे वक्री है इसलिये जातक बुद्धि के बल पर जीवन जीने का कारण जानता है,लेकिन अपने ही क्षेत्र मे वह इस प्रकार के जीवन साथी को चाहता है जो उसके बराबर की श्रेणी मे हो और उसके बराबर की सोच रखने वाला हो।
  • सप्तमेश सूर्य जब तीसरे भाव मे होते है तो पिता का भी अकेलापन देखा जाता है और पिता के भाई बहिन जो भी होते है उनके प्रति जातक का पिता अपने जीवन को और उनके जीवन मे आने वाले व्यवहारिक कारणो को निभा नही पाता है फ़लस्वरूप या तो पिता के भाई दूर हो गये होते है या चल बसे होते है अगर होते है तो वह अन्दरूनी तरीके से विवाह आदि के लिये अपने उल्टे कारणो को प्रसारित करते रहते है और नही होते है तो पिता के कमाई के साधन या पिता के अहम के कारण जो व्यापारिक रूप से जन सामान्य मे प्रयोग मे लाये जाते है वह कारण भी जातक के प्रति वैवाहिक जीवन को स्थापित कर पाने मे असमर्थ होते है।
  • ग्यारहवा केतु जब अपनी नवी नजर से सप्तम को देखता है तो वह सप्तम से प्राप्त करने के बाद अपने पंचम यानी तीसरे भाव मे विराजमान सूर्य को देना चाहता है,सूर्य एक प्रकार से तीसरे भाव मे या तो जीवन साथी का सरकारी रूप से समर्थ होने का बखान करता है या फ़िर सूर्य की कारक चीजे जैसे स्वर्ण अपनी हैसियत के प्रति सरकारी सहायता आदि।
  • वर्तमान मे चलने वाली शनि मे गुरु की दशा और राहु का प्रतियंतर भी विवाह आदि कारको मे अनिश्चितता देता है और इस भ्रम वाली स्थिति मे विवाह आदि का होना नही माना जाता है,
  • जीवन साथी का नेचर सप्तमेश सूर्य से देखा जा सकता है सूर्य का सप्तम मे प्रभाव होने से जीवन साथी की दिशा पश्चिम मे होनी मानी जाती है लेकिन नवम के प्रभाव के कारण पैदा होने के स्थान से दक्षिण-पश्चिम दिशा का होना माना जा सकता है.
  • जिस व्यक्ति से सम्बन्ध होना या तो उसकी शादी पहले होकर टूट गयी होगी या सम्बन्ध बनने के बाद ही समाप्त हो गया होगा.
  • शादी का समय आने वाले मई दो हजार तेरह के आसपास का मिलता है.

Saturday, November 3, 2012

जन्म का पाया

जन्म समय के अनुसार नक्षत्र और राशि के पाये को देखा जाता है नक्षत्र पाया शरीर और परिवार से जोडा जाता है राशि का पाया दिमागी सोच सांसारिक स्थान और कार्य विवाह आदि के लिये माना जाता है। पाये चार प्रकार के होते है -

स्वर्ण पाया
रजत पाया
ताम्र पाया
लौह पाया

नक्षत्र का स्वर्ण पाया सही माना जाता है राशि का स्वर्ण पाया सही नही माना जाता है जो पाया स्त्री के लिये सुखकारी होता है वही पाया पुरुष के लिये हानिकारक माना जाता है। अगर राशि का पाया स्त्री का स्वर्ण है तो वह उत्तम माना जाता है और पुरुष केलिये स्वर्ण पाया राशि से खराब माना जाता है। पुरुष के स्वर्ण पाये मे जन्म लेने से या तो उसके जीवन में अल्प आयु का योग होता है या वह आजीवन अपने अहम और बुद्धिमान समझने के कारण आगे नही बढ पाता है इस कारण मे एक बात और भी देखी जाती है कि जातक को वास्तविक जीवन मे जाने के लिये माता पिता रोकते रहते है उसे गमले का पौधा समझकर पाला जाता है जातक का स्थानन्तरण होता रहता है इस प्रकार से व्यक्ति अपने सामाजिक पारिवारिक और व्यवहारिक जीवन को समझ नही पाता है फ़लस्वरूप वह एकान्त मे रहने वाला और अपने काम को खुद करने के बाद सफ़लता को नही लेने वाला होता है। सफ़लता के लिये जीवन की लडाई को लडना जरूरी होता है और जब जीवन की लडाई दूसरो के भरोसे से लडी जाती है तो कभी न कभी बडी असफ़लता हाथ ही लगती है.इस पाये के व्यक्ति को पिता का सुख कम मिलता है अपने पारिवारिक जीवन से जैसे चाचा चाची ताऊ ताई दादा दादी से दूरिया बनी रहती है।

रजत पाया सभी मायनो मे सही माना जाता है यह स्त्री जातक के लिये भी और पुरुष जातक दोनो के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। व्यक्ति अपने मानसिक कारणो को सम्भालने उन्हे बेलेन्स करने के लिये अपनी योग्यता को जाहिर करता रहता है सभी प्रकार के कार्य जो उसके जीवन के लिये प्रभावी होते है वह लोक रीति से सामाजिकता से एक दूसरे के मानसिक प्रभाव को जल्दी समझ लेने से पूरा करता रहता है उसे अपने जीवन मे लोगो की बुरी सोच का परिणाम भी सफ़लता के लिये आगे बढाने वाला होता है वह किसी कार्य के गलत होने पर उसे शिक्षा के रूप मे मानता है माता के साथ सम्बन्ध अच्छे रहते है पिता का ही लगाव सही रहता है लेकिन बहिनो की संख्या और स्त्री संतान की अधिकता होना माना जाता है,इस पाये मे जन्म लेने वाले जातक पानी के किनारे रहने पानी सम्बन्धी काम करने मे सफ़ल होते है.


ताम्र पाया तकनीकी दिमाग को प्रदान करने वाला होता है जातक बात का धनी होता है लम्बी आयु को जीने वाला होता है धन की कमी जातक को नही अखरती है वह अपने व्यवहार आदि से धन के क्षेत्र को कायम रखने वाला होता है खुद के लोग उस पर भरोसा करने वाले होते है जातक जो भी बात करता है उसे निभाने वाला होता है समय पर काम आने वाला होता है लेकिन अपने जीवन को दूसरो के प्रति बलिदान करने वाला भी होता है। जमीन जायदाद अचल सम्पत्ति और खनिज आदि कारको मे आगे बढता जाता है। भाइयों के लिये मित्रो के लिये और जान पहिचान वालो के लिये जीवन को बचाने वाला रोजाना की जिन्दगी मे अपने को आगे ही आगे बढाने वाला होता है। सन्तान सुख मे कमी रहती है लेकिन जो भी सन्तान होती है वह नाम कमाने वाली और परिवार का नाम रोशन करने वाली होती है मर्यादा मे तथा कायदे से चलने वाली होती है जीवन साथी से मतभेद होना और किसी न किसी बात पर आपसी कलह को भी होता देखा जाता है लेकिन जीवन साथी से दूरिया नही हो पाती है कुछ समय के लिये आपसी कलह तो हो सकती है लेकिन हमेशा के लिये नही माना जा सकता है जातक भोजन सम्बन्धी कारणो मे आगे रखने वाला होता है जातक का हाजमा भी सही होता है और जातक को भूख भी बहुत लगती है.तीखे भोजन मे जातक की अधिक रुचि होती है।

लोहे के पाये को खराब माना जाता है जातक या जातिका आलसी प्रवृत्ति के होते है चालाकी से काम करना एकान्त मे रहना मेहनत वाले काम करने के बाद केवल जीविका को चलाने के लिये माने जाते है दूसरो की सेवा करना और अपने श्रम के आधार पर ही जीवन को चलाना माना जाता है सन्तान भी आलसी होती है साथ ही जीवन मे कब पैदा हुये और कब मर गये इसका भी प्रभाव नाम और धन के क्षेत्र मे उजागर नही हो पाता है। माता पिता के लिये भी कष्टकारी होता है विद्या के क्षेत्र मे कमी रहती है विवाह आदि के क्षेत्र मे सरलता से जीवन नही चल पाता है जीवन साथी को एक प्रकार से जातक को ढो कर ले कर चलने वाली बात को माना जाता है वह बात चाहे अस्पताल सम्बन्धी कारण से बनी हो या जातक की अकर्मण्यता से मानी जाती हो जातक को शराब कबाब तामसी और नशे की आदते भी होती देखी जाती है नीचे लोगो से मित्रता और नीचे काम करने जुआ लाटरी सट्टा आदि के क्षेत्र मे अधिक रुचि देखी जाती है खेल कूद मे भी कम मन लगता है दूसरो को लडाकर खुद मजा लेने वाले लोग भी अधिकतर इसी पाये मे जन्म लिये हुये देखे गये है,हिंसा से बहुत अधिक प्रीति देखी जाती है दया भाव की कमी होती है ऐसे लोग अपने ही लोगो को ठग भी सकते है और धोखा भी देते देखे गये है।

स्वर्ण के पाये मे जन्म लेने वाले जातक को सोने मे हरे रंग के नगीने पिरोकर गले मे पहिनना चाहिये जिससे उनके जीवन मे आहत होने वाले कारण कम होते है नारियल का दान देते रहना चाहिये,पिता की आयु की बढोत्तरी के लिये रोजाना सूर्य को अर्घ देना चाहिये पराये धन और स्त्री पुरुष से सम्बन्धो के मामले मे बचना चाहिये कारण इस पाये मे जन्म लेने वाले को यौन सम्बन्धी बीमारिया अधिक होती है,धारी वाले कपडे पहिनने से भी इस पाये का दोष कम होता है हाथ मे कलावा बांधने से भी दोष मे कमी होती है धार्मिक स्थानो मे जाना और माथा टेकते रहने से भी दोष कम होता है।

रजत पाये वाले व्यक्ति को तीर्थ स्थानो मे जाते रहना चाहिये और तीर्थ स्थान के जल को अपने घर मे या सोने वाले कमरे मे ऊंचे स्थान पर रखना चाहिये माता के कष्ट को दूर करने के लिये रोजाना शिव स्तोत्र का पाठ करना चाहिये चांदी के पात्र मे पानी या दूध पीना चाहिये,हरे रंग के कपडो का अधिक प्रयोग करना चाहिये,ठगी चालाकी आदि के कामो से दूर रहना चाहिये।

ताम्र पाये के दोष की शांति के लिये मन्दिरो मे या दान के स्थानो मे भोजन का दान करना चाहिये तांबे की कोई न कोई चीज अपने पास रखनी चाहिये भोजन मे मिर्च का अधिक प्रयोग नही करना चाहिये मीठा भी कम ही लेना चाहिये,भाइयों की सेवा करने से और मित्रो का सहयोग करने से भी इस पाये का दोष कम होता है।

लौह के पाये मे जन्म लेने वाले जातक को अपने वजन के बराबर का लोहा शनि स्थान मे दान करना चाहिये आलसी प्रभाव को रोकने के लिये मिर्च का अधिक सेवन करना चाहिये लेकिन काली मिर्च का सेवन ही सुखकारी होगा,आंखो की ज्योति को बढाने के लिये घी काली मिर्च और बतासे को आग मे पका कर रोजाना सुबह को प्रयोग मे लेना चाहिये तुलसी की पत्ती काली मिर्च और नीम की टांची को रोजाना बासी पेट लेने से भी इस पाये का दोष दूर होता है लोहे का छल्ला दाहिने हाथ मे स्त्री और पुरुष दोनो को मध्यमा उंगली मे पहिनने से भी परिवार की कलह और घर के मतभेद दूर होते है।

 

वक्री शनि के साथ केतु बनाम चलती फ़िरती वकालत की किताब

धनु लगन की कुंडली है गुरु का स्थान वक्री बुध और सूर्य के साथ तीसरे स्थान मे है.राहु लगन मे है शुक्र दूसरे भाव मे है,चन्द्रमा चतुर्थ मे है,मंगल छठे भाव मे है,शनि वक्री होकर केतु के साथ सप्तम स्थान मे है.कार्य का मालिक तभी सफ़ल माना जाता है जब लाभ का मालिक सहयोग करे और धन का मालिक तभी सफ़ल माना जाता है जब भाग्य का मालिक सहयोग करे। शुक्र कुंडली मे लाभ का मालिक है लेकिन शुक्र ही कर्जा दुश्मनी बीमारी और रोजाना के कार्यों का मालिक है,लाभ तभी माना जा सकता है जब रोजाना के कामो मे कर्जा दुश्मनी बीमारी को निपटाने वाले काम किये जाये,लेकिन मकर राशि के शुक्र की आदत होती है कि किसी भी काम को दुबारा करना और दुबारा करने के पहले किये जाने वाला काम खत्म कर देना इस प्रकार से जो भी लाभ वाली बात होती है वह एक बार करने के बाद समाप्त करने से दुबारा करने से मेहनत और समय के साथ साथ बुद्धि का कारन भी दोहरा खर्च करना पडता है इस प्रकार से जो लाभ एक रुपये का होना था खर्चा पचास पैसे का था वहां पर खर्चा भी एक रुपया हो गया और लाभ भी एक रुपया हुआ तो फ़ायदा केवल काम का पूरा होना बाकी की बचत और रोजाना के कामो के लिये जद्दोजहद का लगातार बना रहना जारी रहा। सप्तमेश और कार्येश बुध का तीसरे भाव मे वक्री होने का मतलब है कि लोगो के लिये काम करना लोगो को सलाह देना और केवल वाहवाही को प्राप्त करना लाभ के मामले मे केवल लम्बी सांस भरकर यह सोच लेना कि चलो अपना काम नही हुआ तो कोई बात नही किसी का फ़ायदा तो हो गया है। वक्री बुध का एक प्रकार और भी देखा जाता है कि अगर तीसरे भाव मे है तो वह लोगो के लिये बात करने की बजाय लोगो की बात को सुनने मे अपना समय अधिक लगाता है लोग कहते रहते है और जातक बातो को सुनता रहता है वह लोगो की बात को सूर्य के साथ होने से सरकार के पास पहुंचाता है या लोगो की बात को राजनीतिक रूप से प्रदर्शित करता है इस प्रकार से अनुसंसा करने वाले लोगो की श्रेणी मे जातक का जीवन चला जाता है। गुरु भी साथ है तो खुद के बडे भाई के रूप मे खुद को प्रदर्शित करता है और अपने जीवन को या तो खुद की औकात के साथ बडे भाई के सानिध्य मे बिताना पडता है या बडे भाई बनकर लोगो की सहायता करनी पडती है। बुध का गुरु के साथ वक्री होने का मतलब भी एक प्रकार से रिस्ता जोडकर लोगो की सहायता करने के साथ ही माना जाता है वह लोगो के लिये रिस्ता जोडने का काम करता है लोगो के फ़ायदे के लिये सरकारी सहायता की व्यवस्था को कायम करता है या लोगो के लिये भागदौड करता है खुद के धन को खर्च करता है अपने जान पहिचान और सम्बन्धो के आधार पर लोगो की सहायता करता है। लेकिन निश्चित काम खुद के लिये नही होते है। कहने को तो चन्द्रमा से दसवा राहु भूत की तरह से काम करने का अधिकारी बनाता है लेकिन जरूरी नही है कि राहु देव की कृपा हमेशा ही बनी रहे कभी कभी तो इतना आलसी बना देता है कि काम करना तो दूर की बात है यह ही पता नही होता है कि काम कब करना कितना करना और काम का फ़ल आगे क्या मिलना है।

वक्री शनि दिमागी काम करने के लिये अपनी पूरी ताकत देते है और केतु भी साथ हो जाये तो दिमागी रूप से धागे फ़ैला कर जाल बनाने का काम भी बडी अच्छी तरह से किया जा सकता है पैदाइसी वकील का दिमाग होने से अदालती कामो मे समाज के काम मे राजनीति और धर्म सम्बन्धी काम मे सरकार से मिलने वाली सहायता और बिना लाभ के लोगो के लिये लाभ देने वाली संस्थाओ के निर्माण से भी माना जाता है दिमाग से जो भी बुन दिया जाता है उससे एक नया कारण बन जाता है लेकिन वक्री शनि केतु के साथ मिलकर अपने दिमाग को खाली समय मे इतना प्रयोग मे ले लेते है कि वह भोजन भूख नींद आदि को कुछ समय के लिये भूल से जाते है और शरीर मे कमजोरी का होना रोजाना के कामो मे देरी होना जैसे किसी की सहायता के जल्दी जाग गये और उसके काम मे इतने मशूगल हो गये कि अपने रोजाना के काम जैसे दिन चर्या आदि सभी कुछ भूल कर केवल सामने वाले के लिये किये जाने वाले काम मे कानून मीडिया बातचीत और बताने लिखने कहने प्रसारित करने पहिचान बनाने मे बिजी कर लेना भी एक बात मानी जाती है।

वक्री शनि के लिये एक उपाधि लालकिताब से मिलती है वह उपाधि बहुत ही मजेदार भी है और काम के समय मे मतलबी के लिये भी जानी जाती है यह उपाधि मतलबी चाचा के लिये मानी जाती है यानी चाचा जब मतलब हुआ तो साथ मे आ गया और बिना भतीजे (केतु) के काम नही होना है जैसे ही चाचा का काम हो गया भतीजे को भूल गये या इस प्रकार से भी समझा जाये कि जातक को यह वक्री शनि केवल लट्ठ की तरह से प्रयोग करता है जब तक जरूरत रही साथ रखा और जैसे ही जरूरत पूरी हुयी कमरे के कौने मे खडा कर दिया। यही बात उन लोगो के लिये भी मानी जाती है जो राजनीति मे अपनी जरूरत को पूरा करने के लिये लोगो का प्रयोग करते है काम के वक्त मे उनके लिये सभी साधन बना देते है लाभ के लिये भी कई प्रकार के सपने दिखा देते है और जब तक उनका सहयोग लेना होता है वाहन की सुविधा भोजन की सुविधा अधिकार देने की सुविधा धन को खर्च करने की सुविधा को देते रहते है हथियार को साथ लेकर चलने का काम बाडी गार्ड का काम कानूनी कामो को करने के लिये अदालती चक्कर लोगो से मिलने जुलने का काम सामाजिक कामो मे भेजकर अपने नाम को प्रसारित करने वाले काम आदि इस शनि की शिफ़्त के अनुसार करवाये जाते है लेकिन जैसे ही वक्री शनि रूपी चाचा का मतलब सिद्ध हुआ या कोई काम नही हुआ तो जातक को एक किनारे पर रख दिया और खुद भी अपने को दूर दूर रखने लगे आदि बाते इस वक्री शनि के लिये देखी जाती है।

मार्गी शनि शनि के वक्री होने पर काम करने की बुद्धि देता है और वक्री शनि शनि के मार्गी होने पर काम करने की बुद्धि देता है अक्सर यह बात जातक खुद ही महसूस करते है कि वक्री शनि जब गोचर से वक्री होता है तो उन्हे शरीर की तकलीफ़े बढ जाती है वह जो भी काम करते है वह मेहनत से करना पडता है और मेहनत से वही काम कर सकते है जिनके जन्म समय मे शनि मार्गी होता है। मार्गी शनि वाले लोग तभी बुद्धि वाला काम कर सकते है जब गोचर से शनि वक्री हो। शनि केतु की युति को वकील की हैसियत से भी देखी जाती है अक्सर जिनके जन्म समय मे शनि मार्गी होता है वह शनि के वक्री होने के समय मे हारा हुआ केश भी जीत जाते है और जिनके जन्म समय मे शनि वक्री होता है वह शनि के वक्री समय में जीता हुआ केश भी हार जाते है। यही बात उन लोगो के लिये भी देखी जाती है जो लोग संस्था बनाने का काम करते है कम्पनी बनाकर काम करना जानते है इनके साथ भी वकील जैसी हालत होती है ।

मार्गी शनि वाले व्यक्ति समाज के अनुसार चलने वाले कामो को करने मे विश्वास करते है लेकिन वक्री शनि वाले जातक उन्ही कामो को अधिक करते है जो समाज से उल्टे काम माने जाते है। उल्टे कामो का तात्पर्य इस प्रकार से है जैसे एक काम करने वाले होते है और दूसरे काम करवाने वाले होते है अगर काम करने वाले काम को नही भी करना चाहे तो काम को करवाने वाले व्यक्ति अपनी बुद्धि से चालाकी से काम करवाने की तकनीक से काम करवाने की क्षमता को रखते है और अगर वह किसी कम्पनी के लिये काम कर रहे है तो वे लेबर से अधिक काम करवा सकते है वक्री शनि वाले लेबर यूनियन के नेता बनते है और मार्गी शनि वाले उस यूनियन के सदस्य बनते है। लेकिन नेता का समय तभी उल्टा हो जाता है जब गोचर से शनि वक्री हो जाता है उस समय लेबर को बुद्धि आजाती है और नेता के लिये अनर्गल बाते शुरु हो जाती है नेता जबाब नही दे पाता है और कभी कभी लेबर के विरुद्ध होने की वजह से चलने वाली नेतागीरी बन्द भी हो जाती है,यही बात समाज का काम करने वाले के लिये भी माना जाता है परिवार को सम्भालने वाले के लिये भी माना जाता है।

वक्री शनि अगर वक्री बुध से किसी प्रकार की युति ले लेता है तो व्यक्ति शायर की हैसियत का आदमी बन जाता है यानी शायर जो भी लिखता है वह उल्टा ही लिखता है जितना उल्टा लिखना जिसे आता है वही सफ़ल लिखने वाला शायर कहा जाता है।  प्रसिद्धि भी उन्ही लोगो को मिलती है जो उल्टा लिखना जानते है। यही बात सूर्य गुरु के साथ वक्री बुध और वक्री शनि के प्रति जंगल के राजा शेर के लिये मानी जाती है,शेर कभी भी सीधी राह पर चलने वाला नही होता है वह हमेशा रास्ता छोड कर उल्टे रास्ते पर चलने वाला होता है,कारण सीधे रास्ते पर चलने पर उसे कोई शेर की गिनती मे नही कहेगा,घास खाने वाले जानवर सीधे रास्ते पर चलने वाले होते है लेकिन घास खाने वालो को खाने के लिये शेर उल्टे रास्ते पर चलना अपनी शान समझता है यही बात सूर्य गुरु वक्री बुध और वक्री शनि के लिये सन्तान के रूप मे सपूत के लिये मानी जाती है,सन्तान जब समाज और लोगो के अनुसार अपने काम को करती है तो वह साधारण सन्तान कही जाती है लेकिन सपूत हमेशा समाज के कामो के लिये परिवार के कामो के लिये उल्टे तरीके से सोचना और काम करने का अधिकारी माना जाता है लोग काम करने के बाद परिणाम को तभी देखते है जब शनि मार्गी होता है लेकिन काम को करने के पहले ही अनुमान लगाकर काम करना कि काम का फ़ल कितना मिलेगा यह बात काम करने के पहले सोच लेने के लिये सपूत को ही माना जाता है लेकिन केतु के साथ होते ही वह अन्य के लिये माना जा सकता है खुद के लिये कभी भी फ़लदायी नही होता है।

वक्री शनि के साथ केतु के होने से अगर व्यक्ति के जीवन के उत्थान के लिये कोई शनि वाला चलता हुआ उपाय करवाया जाये तो वह फ़लीभूत भी नही होता है और किये जाने वाले उपाय का महत्व भी आस्तित्वहीन हो जाता है अगर वक्री शनि वाला व्यक्ति उल्टे उपाय करे तो उसे फ़ल अच्छे मिलने शुरु हो जाते है,जैसे कोई शनि का दान करने के बाद अच्छे फ़ल प्राप्त करता है तो वक्री शनि वाला शनि से दान लेकर अपने को सफ़ल बना सकता है जैसे शनि वाली वस्तुये मन्दिर से लाना और खाने पीने मे रोजाना के प्रयोग मे लाना आदि। मार्गी शनि वाला व्यक्ति शनि की फ़ायदा वाली बात को नीलम को दाहिने हाथ की बीच वाली उंगली मे पहिन कर भाग्य को चमका सकता है लेकिन वक्री शनि वाला व्यक्ति नीलम को बायें हाथ की बीच वाली उंगली मे धारण करने के बाद भाग्य को चमका सकता है,अपने जीवन साथी को नीलम पहिना कर अपने भाग्य को चमका सकता है लोगो को शनि वाली वस्तुये प्रदान कर अपने भाग्य को चमका सकता है आदि बाते समझनी जरूरी होती है। वक्री शनि अगर गुरु सूर्य और वक्री बुध के साथ केतु का साथ ले रहा है तो जातक को राजनीति पर लिखना बहुत सही होता है वह अपने लेखो के द्वारा अपने कार्यों की समीक्षा को हकीकत मे प्रसारित करने के बाद अपने आसपास के माहौल में होने वाले राजनीति वाले कारणो को अपनी उल्टी लेखनी के द्वारा प्रसारित करने के बाद धन और यश दोनो को प्राप्त कर सकता है वह अपनी लेखनी को मासिक पत्रिका या इसी प्रकार की हमेशा चलने वाली धारा प्रवाह लेखनी को चलाता रहे तो एक दिन उसे नाम और धन से बहुत अच्छी तरह से नवाजा जाता है। यही बात अगर जातक अपने जीवन मे राजनीति के सम्बन्ध मे कायम कर ले और रोजाना के कामो मे लोगो की राजनीति से सम्बन्धित राजकीय कार्यों मे आने वाली बाधा के सम्बन्ध मे सहायता करने लगे नियत समय पर लोगो से मिलना और उनकी राजकीय सहायता से सम्बन्धित कार्यो को करवाना जो लोग कानून को नही जानते है उन्हे कानूनी सहायता को देना जो लोग सामाजिक रूप से प्रताणित है उन्हे समाज मे स्थान दिलवाना आदि काम अगर नियत समय पर किये जाये तो वह काम जातक को सफ़लता भी दे सकते है और एक दिन राजकीय जान पहिचान और लोगो के अन्दर अपना स्थान बनाकर राजकीय पुरुष जैसे मंत्री नेता आदि का रूप भी प्रदान कर सकते है राजकीय व्यक्ति का व्यक्तिगत सलाहकार भी बना सकते है।

वक्री शनि के साथ केतु वाले व्यक्ति को एक बात और भी ध्यान मे रखकर चलना चाहिये कि ऐसा व्यक्ति अगर खुद काम करता है तो वह सफ़ल नही हो सकता है अगर इस प्रकार की युति वाला जातक लोगो से काम करवा सकता है तो सफ़ल हो सकता है,यानी इस युति वाले जातक को कोई भी काम खुद नही करना चाहिये वह लोगो से काम करवा कर अपने जीवन को चमका सकता है उसे अगर कोई प्रार्थना पत्र भी लिखना है तो वह अपनी डिक्टेशन को लोगो के द्वारा ही लिखवाये खुद नही लिखे,केवल अपने दिमाग का प्रयोग करने के बाद कार्य करवाने की कोशिश करे। इस युति के जातक अपने रोजाना के कामो को समय के अनुसार करे तथा आलस आने के समय में सोचे नही केवल नींद को पूरा करने का प्रयास करें,तामसी भोजन शराब कबाब अधिक ऐशो आराम अकर्मण्य बना सकता है इससे इस युति के जातक बचे रहे तो उन्हे आशातीत सफ़लता प्राप्त करने से कोई रोक नही सकता है। एक बात और भी जरूरी है कि अगर इस युति मे पैदा होने वाले जातक अपने बायें हाथ का किसी भी काम मे पहले प्रयोग मे लाये तो काम जरूर ही पूरा होता है,बायें हाथ का मतलब है कि अपने जीवन साथी से उस काम की शुरुआत करवाये अगर अकेले है तो अपने बायें हाथ का काम मे लगाना उन्हे जरूर सफ़लता की तरफ़ ले जाता है।


Friday, November 2, 2012

ग्रह कब रास्ता चलते पिटवा देते है ?

एक जातक की कुंडली के अनुसार मेष लगन है मंगल जो लगनेश है वह नवे भाव मे स्थापित है लगन मे सूर्य राहु की युति है,सप्तम मे केतु है,बुध बारहवां है,चन्द्र दसवां है,गुरु ग्यारहवां है,शुक्र दूसरा है,शनि वक्री होकर अष्टम मे विराजमान है। जातक का प्रश्न है कि उसे रास्ता चलते कुछ दिन पहले कुच लोगों ने बिना बात के पीट दिया और वह पिटकर घर पहुंचा तो केवल यह सोच रहा था कि बिना किसी बात के उसको लोगों ने क्यों पीटा ? लगन का राहु जीवन को राहुमय ही बना देता है खुद को तो अपने बारे मे भ्रम मे रखता ही है लेकिन समय समय पर लोग भी भ्रमित होकर कुछ का कुछ समझ बैठते है,और शामत तो तब आजाती है जब राहु का गोचर अष्टम मे हो और लगनेश भी अष्टम मे हो बुध जो बोलने और पहिचान बताने का कारक है वह भी अष्टम मे हो शुक्र जो अच्छे बुरे की समझ को देने बाला होता है वह भी छठे भाव मे गोचर से चला गया हो। अक्सर यह भी देखा जाता है कई लोग अपने कपडो से अपनी पहिचान को रखते है और कभी कभी शुक्र और शनि की आमने सामने की युति भी बिना किये गये कारणो को सिर पर थोपने केलिये काफ़ी होते है।

राहु शनि मंगल और बुध की युति रास्ता चलते पिटवाने के लिये काफ़ी मानी जाती है। लेकिन अष्टम का भी सहयोग देना जरूरी है वह चाहे अष्टमेश के द्वारा हो या अष्टम स्थान मे हो। यह काम दशा और अन्तर्दशा के चलते भी देखा जाता है। पिछले पच्चीस अक्टूबर के आसपास जातक की कुंडली में मंगल राहु बुध और जन्म का शनि एक साथ आ गया और बुध ने राहु से अपनी युति को ले लिया। राहु बुध के साथ मिलने पर और अष्टम मे जाने के बाद गाली गलौज का कारक बन जाता है जातक अपने बचाव के लिये कुछ कहना भी चाहे तो वह या तो कह नही पाता है या सामने वाले उसकी बात झूठा समझ कर उसे अपने बचाव का मौका ही नही देते है। मेष लगन मे गुरु भाग्य का मालिक होता है और जब गुरु वक्री हो तो भी यह बात सामने आती है कि वह भाग्य से भी नही बच पाता है और लोग उसका रास्ता चलते अपमान कर जाते है।

अष्टम भाव या अष्टम का मालिक जीवन मे प्रभावी है तो जातक को आजीवन अपमान सहना पडता है। उसे राहु के अनुसार बिना किये गये कार्य का आक्षेप मिलता है और अगर बारहवा भाव चौथे के स्वामी के साथ अपना सहयोग कर रहा है तो वह बिना किये काम की बजह से आजीवन जेल की सजा तक कटवा सकता है। चोरी का आक्षेप देकर अपमानित करवा सकता है,बिना की गयी बात का आक्षेप लगाकर सामाजिक रूप से अपमानित कर सकता है। चोरी दुष्कर्म अनैतिक काम कत्ल आदि के लिये यह बात मानी जा सकती है। अगर अष्टम का मालिक राहु के साथ है और वह माता के कारक ग्रह के साथ अपना गोचर कर रहा है बचाने वाला ग्रह अगर अस्त वक्री या दु:स्थान मे है तो माता के साथ भी दुष्कर्म के आक्षेप लग सकते है। सप्तमेश और सप्तम पीडित हो चुका है तो जीवन साथी भी बिना किये गये कार्य का आक्षेप लगाकर दूर हो सकता है,अथवा अपमानित करने का कारण पैदा कर सकता है। यही बात संतान के लिये परिवार के सदस्यों के लिये भी मानी जाती है।

बाधकता से साधकता !

जन्म कुंडली मे बाधक ग्रहो और बाधक स्थानो के लिये कई प्रकार की डरावनी बाते कही जाती है। यह भाव बाधक यह ग्रह बाधक है और कार्य मे बाधा देगा आदि बाते बताकर लोग अपनी अपनी कथनी का विवेचन करते है। रुकावट होना और रुकावट के कारण कष्ट होना यह बात ग्रहों के भावो के अनुसार कथन किया जाता है। जन्म के बाद शरीर का पनपना और शरीर के पनपने के समय मे मिलने वाली कठिनाई बात करने मे अक्षरों का उच्चारण चलने मे पैरों का सही स्थान पर नही रखा जाना काम करते वक्त हाथ का सही काम नही कर पाना आदि कितने ही कारण शरीर की पनपाहट मे बाधक होते है और इस प्रकार की बाधकता को पार नही किया जाय तो वही अंग या अवयव नाकाम रह जायेगा जो लोग बाधकता से नही डरते है और अपने को लगातार प्रयास मे लगाये रहते है वह अन्य लोगो से अधिक लचीला और मजबूत अंग बनाने मे सफ़ल हो जाते है। कुंडली मे तीसरा स्थान सबसे पहले बाधक का काम करता है। तीसरा स्थान खुद के पहिचान बनाने के कारणो का भी होता है छोटे भाई बहिनो का भी होता है छोटी यात्रा करने के लिये भी माना जाता है मकान के बाहर रहने का कारण भी होता है पति या पत्नी के धर्म रिवाज समाज व्यवहार के लिये भी जाना जाता है जीवन साथी की ऊंची शिक्षा कानूनी प्रभाव विदेश आदि का रहना और विदेशी नीतियों को अपने परिवार आदि मे समायोजित करना भी होता है। अपनी पहिचान बोली भाषा आदि के लिये भी यही स्थान माना जाता है। शरीर मे बायें हिस्से का कारक भी माना जाता है। इस प्रकार से छोटे भाई बहिन को सम्भालना जीवन की बाधकता मे माना जाये तो यह कहना यथार्थ होगा कि व्यक्ति सामाजिकता से परे जा रहा है। रामायण मे भगवान श्रीराम की कथा में लक्षमण जी का आजीवन साथ रहना उनके तीसरे भाव का पराक्रम से जोडा गया रूप है माता सीता जी का आजीवन साथ रहना उनके सप्तम का सही रूप से विवेचित रूप है उनके बडे भाई होने का अहसास तथा उनके बडे भाई के कर्तव्यों का निर्वहन किया जाना उनके ग्यारहवे भाव के कारक को फ़लीभूत करने का साहस माना जाता है। जब बाधक ग्रह के प्रति लगातार चिंतन किया जाये और उसके ऊपर सफ़लता को प्राप्त कर लिया जाये तो वही विजय का रूप कहलाता है। कोर्ट केश दुश्मनी आदि बाते सप्तम भाव से देखी जाती है तथा जीवन साथी का भाव भी सप्तम स्थान के रूप मे ही समझा जाता है अगर कोर्ट केश को करने वाले व्यक्ति को बाधक के रूप मे लिया जाये तो यह कहना भी गलत नही होगा कि तीसरा भाव जब कमजोर है अपनी पहिचान और हिम्मत दिखाना नही आता है तो अपने आप ही सातवा भाव कमजोर हो जायेगा और सातवे के कमजोर होने से ग्यारहवा भाव अपने आप ही बजाय लाभ के हानि देना शुरु कर देगा।

तीसरा सप्तम और ग्यारहवा भाव और इनके स्वामी काम नाम के पुरुषार्थ से जुडे होते है। किसी भी पौधे के बढने और पनपने के लिये दूसरा भाव और जैसे ही पौधे की पहिचान होती है तीसरा भाव सामने आता है। पौधे से मिलने वाले लाभ और हानि तथा पौधे का जलवायु के अनुसार पनपाहट चौथे भाव से देखी जाती है पौधे का अन्य पौधो के साथ पनपना और मजबूत होना पंचम से देखा जाता है पौधे मे लगने वाले रोग और जडो की गहराई का विवेचन छठे भाव से किया जाता है उसी प्रकार से पौधे मे जब पनपाहट के बाद फ़ूल खिलता है तो वह सप्तम की पहिचान तीसरे के अनुसार ही मिलती है और फ़ूल के अन्दर जब पराग कण का निषेचन होता है तो वह अष्टम का कारण बन जाता है। फ़ूल का बनना बन्द होना और फ़ल का रूप शुरु होना नवे भाव से जोडा जाता है कच्चे फ़ल का रूप दसवे भाव से और फ़ल के पकने और उसके द्वारा मिलने वाले लाभ हानि का कारण ग्यारहवे भाव से देखा जाता है फ़ल की समाप्ति और फ़ल के असर का रूप समाप्त होने का भाव बारहवा है। इस प्रकार से तीसरा सातवा और ग्यारहवां ही पौधे की पहिचान पौधे की सुन्दरता और पौधे से मिलने वाले फ़ल का रूप है बिना बाधक भाव के और बाधक ग्रह के जीवन मे पहिचान नही बन पाती है जीवन मे जीने के लिये कारण नही मिल पाता है और जीवन जब जिया जाता है तो जीवन लेने का उद्देश्य भी नही मिल पाता है यानी जैसे व्यक्ति पैदा हुआ था और उसी प्रकार से बिना कुछ किये चला जाये तो यह समझना चाहिये कि जातक के जीवन मे बाधक ग्रहों का असर बाधक भावो का प्रभाव नही था।