Wednesday, February 29, 2012

शमशान से साक्षात्कार

शमशान या कब्रिस्तान भूतों की जगह कही गयी है,अगर भूतो से मिलना है तो शमशान या कब्रिस्तान मे जाना जरूरी होता है। बिना शमशान मे जाये भूतो की कल्पना करना बेकार की बात है,अगर बन्द कमरे मे बैठ कर भूतो की कल्पना की जाये तो हो सकता है कमरे मे पिछले समय मे मरे किसी चूहे काकरोच चीटी चीटे झींगुर के भूतो से साक्षात्कार हो जाये तो अलग बात है। आदमी के भूत से मिलना है तो जरूरी है कि शमशान या कब्रिस्तान की शरण मे जाना। पहली बार बचपन मे शमशान गया था,एक अजीब सा डर दिमाग मे भरा था,लोगो के द्वारा बताये जाने से एक मानसिक चित्रण दिमाग मे बना हुआ था,कि शमशान मे भूत होते है। जिस जगह पर मुर्दा शरीर को जलाया जाता है उस स्थान पर उसी आदमी का भूत होता है जिसे जलाया गया है,लेकिन जिस स्थान पर हजारो लाखो मुर्दे जला दिये जाते है वहां एकता मे अनेकता का रूप जरूर देखने को मिलता है,लोग भूल भी जाते है कि जिस स्थान पर उन्ही के पूर्वज जले थे उसी स्थान पर उनके शत्रुओं को भी जलाया गया था,जब एक जगह पर जलाया गया है तो शत्रुता तो पूर्वजों की खत्म ही हो गयी,कारण उनके पूर्वजों का भूत और शत्रु का भूत एक साथ मिल गया,भूत मिलने से उनकी आपसी शत्रुता भी खत्म हो गयी। एक सज्जन मिले उन्होने भूतो पर काफ़ी कुछ शोध किया है जैसे भूत कहां रहते है कहां कहां तक आ जा सकते है,क्या खाते है क्या करते है सभी कुछ उन्होने अपने अनुभव से सीखा था। धर्म ग्रंथो मे भी पढा था कि आदमी मरने के बाद स्वर्ग भी जाता है नरक मे भी जाता है,जब उन्हे कहीं जगह नही मिलती है तो वह मरने के बाद वापस अपने परिवार मे ही आकर जन्म ले लेता है उसे पुनर्जन्म के सिद्धान्त के रूप मे जाना जाता है। स्वर्ग और नरक को तो देखा नही है लेकिन पुनर्जन्म के सिद्धान्त को समझ कर जरूर कुछ लोगों में मरे हुये व्यक्ति की बाते हाव भाव गुण धर्म आदि देखे है,कई लोगो को मरने के बाद जिन्दा होता हुआ भी देखा है और जो बाते उन्होने बताई उससे विश्वास भी बढा कि मरने के बाद भी कोई दुनिया है,जहां जैसे जिन्दा रहने के बाद अनुभव मिलता है उसी प्रकार से मरने के बाद भी अनुभव किया जा सकता है। वैज्ञानिक कहते है कि जिन्दा रहकर ही अनुभव किया जा सकता है,इसका कारण है कि द्रश्य सुख श्रवण सुख स्पर्श सुख गंध सुख स्वाद सुख केवल केवल आंख कान त्वचा नाक और जीभ के द्वारा ही  हो सकता है यह तो मरने के बाद जला दिये जाते है या दफ़न कर दिये जाते है फ़िर भूत के अन्दर यह पांचो इन्द्रियां कहां से आजाती है। इस बात का भी जबाब है लेकिन यह बात वैज्ञानिकों को हजम भी नही होती है कारण विज्ञान कारक को द्रश्य रूप मे देखना चाहता है,श्रवण करने से अनुभव करने से और अनुमान लगाने से विज्ञान दूर ही रहता है। विज्ञान को विस्वास तभी हो पाता है जब बिजली के पंखे की तरह से वह बिजली के द्वारा चलने लगता है,जब तक वह चालू नही होता है तब तक विज्ञान विस्वास नही करेगा कि वह पंखा चलता भी है और हवा भी देता है। इसी बात के जबाब को देने के लिये यह भी कह दिया जाये कि क्या पंखा के अन्दर आयी हुई बिजली को उन्होंने देखा है,अगर नासमझी से नंगे तार को छू लिया जाये तो उन्हे विश्वास होता है कि उसके अन्दर बिजली है और बिजली झटका भी मार सकती है और चिपका कर मार भी सकती है जब चिपका हुआ छटपटाता हुआ देखा जाता है तो समझ लिया जाता है कि बिजली मार भी सकती है। बिजली कणों के रूप मे चलती है,उसे चलने के लिये धातु या सुचालक कारक की जरूरत होती है,जब तक उसे सुचालक कारक नही मिलेगा वह इंच भी आगे नही बढ सकती है,जैसे बटन के अन्दर बिजली के पथ को जोडने और अलग करने के लिये धातु का प्रयोग किया जाता है और बटन के बाहरी हिस्से को कुचालक के रूप मे बनाया जाता है।

शरीर स्वाद लेना जानता है शरीर खुशबू बदबू का पता कर सकता है,शरीर ही स्पर्श सुख को समझता है शरीर ही आवाजो को पहिचानने की बात को समझता है.शरीर ही चित्र और उपस्थिति को देख सकता है तो एक बात समझना कि आत्मा जो पंचतत्व से विहीन हो चुकी है वह किस प्रकार से शरीर के बिना अपना काम कर सकती है। आत्मा का प्रभाव आभाषित हो सकता है आत्मा अपने प्रकार को जलवायु के अनुरूप प्रकाशित कर सकती है लेकिन आत्मा स्वयं कुछ भी कर पाने मे असमर्थ है। आत्मा को एक कारक की जरूरत पडती है वह अपने कार्य को करने के लिये किसी भी कारक को पकडती है वह अपने शत्रु को अगर प्रताणित करना चाहती है तो वह हमेशा शत्रु के साथ रहती है,कई स्थानो पर वह शत्रु के हौसले को बढाने के लिये उसकी सहायता भी करती है,लेकिन जैसे ही वह शत्रु को मृत्यु की सीमा मे देखती है वह उसके ही शरीर मे उद्वेग के रूप मे प्रवेश करने के बाद उसका काम तमाम कर देती है। इस बात के कई उदाहरण देखे गये है कि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का कोई लेना देना नही है,लेकिन एक दूसरे के जान के प्यासे बन जाते है जब एक व्यक्ति दूसरे की हत्या कर देता है और जब वह जेल की कालकोठरी मे बैठता है तो उसे यह समझ मे नही आता है कि आखिर उसने ऐसा काम कर कैसे दिया। कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि एक निश्चित समय पर आत्मा किसी को लगातार परेशान तो करती है लेकिन मारती नही है वह दिमागी रूप से परेशान करने के लिये उस व्यक्ति की संतान पत्नी या किसी भाई आदि के साथ होती है वह उसे परेशान करने के लिये अपनी क्रियाओं को करने से नही चूकती है। हमारे एक जानकार जो बहुत अच्छी शिक्षा लेकर कलकत्ता से जयपुर मे दवाइयों का कार्य कर रहे है उन्होने बताया कि वे एक बार ट्रेन मे जा रहे थे,उन्हे दो योगी मिले जो किसी धर्म स्थान के लिये जा रहे थे,उन्हे देखकर एक योगी ने कहना शुरु कर दिया कि उनकी भाभी की बदौलत उनका परिवार परेशान है,और भी बाते उसके घर परिवार के बारे मे बताई और सभी बाते सही थी उन सज्जन को पहले तो भरोसा इसलिये नही हुआ कि उन्होने पहले कभी ऐसे व्यक्तियों को देखा नही था,लेकिन जो बाते उनके बारे मे बता रहे थे जैसे पिता के देहान्त के बारे मे घर की स्थिति के बारे मे बच्चे के बारे मे खुद के काम धन्धे के बारे मे तो उन्हे विश्वास करना पडा,उन सज्जन जो उस योगी ने बताया कि उनकी भाभी जो परेशान कर रही है हकीकत मे वे कुछ नही कर रही है,शादी के बहत्तर घंटे पहले उनकी भाभी किसी विवाह के धार्मिक कार्य के लिये बाहर गयी थी और उन्हे सजी धजी देखकर एक अतृप्त आत्मा उनके साथ हो गयी,उस आत्मा के साथ होने के बाद उनकी भाभी को बुखार आ गया और शादी भी दवाइयों के लेने के बाद हुयी,वह आत्मा उनकी भाभी को अपने साथ ले जाना चाहती है और उन्हे ले जाने के लिये वह पहले ससुराल के परिवार वालो को परेशान कर रही है उसके बाद वह जब अपने माता पिता के पास अकेली रहने लग जायेंगी तब किसी भी परिवेश मे उन्हे समाप्त करने के बाद वह आत्मा उन्हे ले जायेगी। अभी तक की स्थिति तो यह है कि उनकी भाभी अपने माता पिता के साथ ही रह रही है और वे अजीब अजीब से कारण पैदा करती है देखा जाये तो उनकी भाभी के माता पिता भी परेशान है। इस तरह के कारणो के अलावा जब किसी व्यक्ति को अर्धविक्षिप्त अवस्था मे देखा जाता है और उससे पहले वह बहुत ही सज्जन और नेक स्वभाव का होता है तो लोग कहने लगते है कि किसी गलत संगति मे पड गया होगा इसलिये वह पागल सा हो रहा है,लेकिन जब व्यक्ति साधारण अवस्था मे होता है तो वह अपने पिछले अनुभवो को बताता है कि वह क्या कर रहा है उसे कोई पता नही है।

अभी कुछ दिन पहले एक प्रकरण मेरे सामने आया था मैने उसकी आडियो रिकार्डिंग भी आप सभी के सामने डाली थी। इसके अलावा भी खुद के अनुभव भी हमने देखे,लोगों के भी सुने,लेकिन भूत देखने का और भूत के द्वारा खुद कार्य करने का कारण मैने कभी नही देखा कि भूत आकर खुद अपना काम करने लगे। वह लोगो के साथ होकर किसी के सिर पर सवार होकर कोई भी काम कर सकता है लेकिन कोई आत्मा स्वयं आकर कोई काम नही कर सकती है। योगी लोग जो शमशान साधना मे रहते है उन्हे अपनी अन्तर्द्रिष्टि से यह तो पता हो जाता है कि यह तृप्त आत्मा है और यह अतृप्त आतमा है। अक्सर कब्रिस्तानो मे शमशानो मे जो नदियों के किनारे होते है वे इसी बात का पता करने के लिये विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान किया करते है। उन अनुष्ठानो से उन्हे यह पता लग जाता है कि कौन सी आत्मा उनके लिये सहायक हो सकती है और कौन सी आत्मा उनके साथ सहयोग नही कर पायेगी। जो लोग सफ़ल व्यक्ति हुये है उनके साथ कोई न कोई आत्मा अपना साथ जरूर देती रही है,और उन लोगो की पहिचान होती है कि उनकी हथेली मे जीवन रेखा के ऊपर शुक्र पर्वत पर एक सहायक रेखा जरूर जा रही होती है,जीवन के एक आयाम तक साथ देती है और उसके बाद दूर हो जाती है।

कालभेदन

कालभेदन का शाब्दिक अर्थ है काल को जानना समय को समझना समय का ज्ञान होना स्थिति का भान होना आदि.कालभेदन के लिये प्राचीन जमाने से किंवदन्तिया चली आ रही है कोई कालभेद को करने के लिये एक दूसरे के प्रति आपसी समझ को रखता है कोई जलवायु के अनुसार कालभेदन करता है कोई स्थान और परिवेश के अनुसार काल भेद करता है.काल यानी समय को समझने के लिये अक्सर एक साधारण आदमी भी समझता है,जानवरो के अन्दर काल को समझने की गति बहुत तीव्रता से होती है। किसी प्रकार की अनहोनी होने के पहले ही पशु पक्षी हरकते करने लगते है वह समझ जाते है कि काल मे कोई परिवर्तन होने वाला है,समय की गति कुछ अलग ही करने जा रही है,सर्दी से अक्समात गर्मी होने के समय मे भी यही बात देखी जा सकती है साफ़ मौसम मे अक्समात बरसार होने के लिये भी यही बात देखी जा सकती है। समय की गणना करना और समय को समझना एक प्रकार से अलग अलग कारण होते है। एक व्यक्ति समय को पहिचानने के लिये अपनी बुद्धि का जो उसने प्रयोग मे लिया है या जो उसने सुना है या जो उसने कल्पना की है उस के ही आधार पर वह अपनी स्थिति को दर्शा देता है,पिछले समय मे मेरी साइट astrobhadauria.com पर एक सज्जन ने लिखा था कि जो राशिफ़ल अखबार और टीवी आदि मे आता है वह क्या सही होता है,इस बात के लिये मैने एक ही जबाब लिखा था कि शब्द का समझना ही फ़लादेश को समझना होता है जो कनफ़्यूज होता है वह एक शब्द के कई अर्थ भी निकाल सकता है और जो जानकार होता है वह अपनी स्थिति के अनुसार शब्द को समझ कर अपने कार्यों मे सुधार भी करता है और सोच समझ कर भी चलता है। उक्त कुंडली मे केतु लगन मे है और केतु की द्रिष्टि मे स्थान भेद को समझने के लिये लगन से शरीर को भी माना जा सकता है,इसी को अगर किसी स्थान विशेष के लिये देखे तो स्थान के परिवेश के लिये भी माना जा सकता है,इसी को अगर किसी घटना के लिये देखे तो घटना का कारक बनाकर भी जोडा सकता है स्त्री या पुरुष या बच्चे के लिये भी इस कुंडली को देखे तो यह अपने रूप से केतु के रूप मे अलग अलग फ़लादेश देने के लिये माना जायेगा। लगन के मालिक को मंगल मानने पर मंगल पंचम मे होने से साधारण रूप से अगर किसी व्यक्ति के मामले मे जानने की कोशिश करते है तो उसे परिवार भाव मे लाया जायेगा किसी देश के मामले मे देखते है तो राजनीति के बारे मे लाया जायेगा अगर किसी जानवर के लिये देखते है तो वह जानवर के पाचन क्रिया के लिये या जानवर के भोजन के लिये देखा जायेगा अथवा जानवर की प्रजनन क्षमता को समझने के लिये किया जायेगा अगर किसी वस्तु के प्रति देखते है तो वह वस्तु की शक्ति या उपयोगिता के आधार पर मनोरंजन आदि के साधन या शिक्षा के साधन के लिये देखा जायेगा अगर किसी प्रकार गूढ भेद को जानने की कोशिश करते है तो इस मंगल के रूप को जैसे यह वक्री है तो बलहीन है लेकिन नीच राशि के पास है इसलिये इसे बलयुक्त भी कहा जायेगा इसी प्रकार से वक्री मंगल की द्रिष्टि को समझने की कोशिश करते है तो दिशा से विपरीत परिणाम के प्रति भी देखा जायेगा आदि बाते मानी जा सकती है।

कालभेदन के लिये अगर कुंडली को देखते है तो काल यानी मृत्यु का देवता के प्रति भी सोचना जरूरी हो जायेगा,कारण जब कोई मृत्यु को प्राप्त होता है तो लोग कहने लगते है उसका काल आ गया था यानी उसका समय आ गया था। म्रुत्यु की गति को समझना भी एक प्रकार से कालभेदन कहा जा सकता है। मृत्यु के कारण को समझकर उसे नकारा करने की क्रिया को भी कालभेदन कहा जा सकता है। एक प्रकार से सटीक कथन को करना और उसे रूपानतर करने के बाद स्पष्ट कहना भी कालभेदन की सीमा मे आ सकता है। जैस उपरोक्त कुंडली मे राहु ज्येष्ठा नक्षत्र मे बुध के साथ है,नक्षत्र का मालिक भी बुध है,जब बुध राहु के साथ इसी नक्षत्र से आठवी नजर से लगनेश मंगल को देखेगा वह भी तब जब मंगल वक्री होगा उसी समय आने वाले मौत के समय को समझा जायेगा लेकिन उस मौत को रोकने के लिये जब राहु के सामने कोई उच्च का ग्रह सामने होगा तो मौत रुक जायेगी और कह दिया जायेगा कि अमुक कारण से मौत रुक गयी।

काल यंत्र के मामले मे अगर जाना जाये तो सबसे पहले सूर्य चन्द्रमा तारे आदि जाने जाते थे,उनकी स्थिति के अनुसार समय को समझा जा सकता था। कई व्यक्तियों को मैने देखा है जो अन्धे है लेकिन रात के बारह बजे भी उनसे समय को पूंछो तो वे समय को घंटा मिनट सेकेण्ड तक बता देते है। इस प्रकार के चमत्कारिक कारण उन्ही लोगो को मिलते है जो स्थिति प्रभाव परिवेश और जलवायु को समझ कर किसी विशेष इष्ट को मानने लगते है। सूर्य से उदय होने पर दिन की स्थिति को समझा जाता था दोपहर दिन के समय मे शंकु आदि के प्रयोग से छाया आदि से काल की गणना की जाती थी रात मे चांदनी और चन्द्रोदय तथा चन्द्र श्रंगों के अनुसार काल को जाना जाता था रात को ध्रुव तारे की स्थिति से दिशा का भेद भी समझ मे आता था सप्त ऋषि के ध्रुव तारे के आसपास होने त्रितारा बंसी सितारों के कारणो में समय का भेद भी देखा जाता था सर्दी गर्मी और बरसात के समय मे अलग अलग तरीके प्रयोग मे लाये जाते थे,लेकिन आधुनिक समय मे घडियों का निरमाण कर लिया गया और समय की गणना को समझा जाने लगा।

कालभेद का एक अन्य कारण भी समझा जा सकता है कि अलग अलग जलवायु के अनुसार काल की अलग अलग पहिचान की जाती है जैसे सर्दी वाले देशो मे काल का कुछ महत्व होता है गर्मी वाले देशो मे काल का कुछ अलग ही महत्व होता है साथ जन्म परण और मरण का एक अलग से ही काल का कारण जाना जा सकता है। जैसे जहां तीन ऋतुयें होती है वहां सर्दी की ऋतु मे अधिक गर्भाधान होते है और जहां सर्दी के कारण अधिक होते है वहां गर्मी की ऋतु मे अधिक गर्भाधान होते है जहां अधिक बरसात होती है वहां जब सूखे का मौसम होता है तभी गर्भाधान अधिक होते है इसी प्रकार से जहां तीनो ऋतुयें होती है वहा अधिक सर्दी अधिक गर्मी और अधिक बरसात मे मौतो की संख्या बढ जाती है जहां सर्दी की ऋतु होती है वहां पर सर्दी के उतरते समय मौतो की संख्या बढ जाती है जहां बरसात अधिक होती है वहां अधिक बरसात के समय मौतो की संख्या बढ जाती आदि बातें जलवायु से कालभेद के लिये जानी जा सकती है।

स्थान विशेष के लिये कालभेद को समझने के लिये यह भी देखा जाता है कि जहां रेगिस्तान है और वहां अधिकतर राते सर्द होती है और दिन अधिक गर्म होते है जब दिन की गर्मी चरम सीमा पर होती है और रेगिस्तान के लोग उस गर्मी मे अपने जीवन को अच्छा चला सकते है कोई यात्री अगर घूमने के लिये आया है और वह उस गर्मी की चपेट मे आजाता है तो वह सहन नही कर पाता है और परलोक सिधारने के लिये अपनी गति क बना लेता है इसी प्रकार से एक रेगिस्तान का व्यक्ति अगर पानी वाले इलाके मे जाता है और उस पानी वाले इलाके मे उसे जाने के कुछ समय बाद फ़ेफ़डों की बीमारी होने लगती है अगर वह अपने शरीर के अनुसार पानी की मात्रा को प्रयोग भी करता रहता है तो भी उसे सांस के अन्दर अधिक नमी के कारण जकडन आदि की बीमारी होना लाजिमी होता है इस प्रकार से कालभेद को जानने के लिये स्थान विशेष की महत्ता को भी समझना जरूरी होता है।

Sunday, February 26, 2012

कम्पयूटर और खुद से कुंडली मिलान

प्रस्तुत कुंडली एक कन्या की है और इस कुंडली के अनुसार वृश्चिक लगन है,चन्द्र राशि मेष है,लगनेश अष्टम मे है,भाग्येश चन्द्रमा त्रिक भाव मे छठे भाव मे है,कुंडली मे मन के भाव मे केतु विराजमान है.सम्बन्धो का कारक गुरु सूर्य और शुक्र बुध के साथ भाग्य मे विराजमान है.इस ग्रह युति के कारण जातिका अपने को बैंक बीमा फ़ायनेंस बचत किये गये धन के प्रति कमन्यूकेशन के द्वारा अपने कार्य को करने के लिये जानी जा सकती है। शनि का स्थान सूर्य की राशि मे होने के कारण तथा राहु के साथ होने से जातिका के पास कभी तो बहुत काम होते है और कभी वह बिना कार्य के परेशान होती रहती है,उसे काम करने के लिये बाहरी लोगो से मिलना बडे धन को इकट्ठा करना साथ ही मन के अन्दर अपने भावो को प्रसारित करने के कारण वह हमेशा अपने कार्यों और परिवार से अपने को दिक्कत मे रखने के लिये मानी जाती है। इसके साथ ही पिता के भाव मे शनि राहु के होने के कारण पिता का कार्य क्षेत्र और पिता के स्थिति के लिये एक प्रकार से अपनी संतान के लिये ग्रहण देने के लिये ही मानी जा सकती है।माता भाग्य की कारक मानी जा सकती है और माता के द्वारा ही इस जातिका के प्रति कोई भी धारणा बनाना भी माना जा सकता है।जीवन साथी का कारक शुक्र है शुक्र का स्थान सूर्य गुरु बुध के साथ मे है,सूर्य गुरु जीवात्मा योग का कारक है और बुध साथ होने से बहुत बडे परिवार और संस्थान के बारे मे जाना जा सकता है। जीवन साथी का कारक जन्म लेने के स्थान से दक्षिण पश्चिम दिशा मे माना जा सकता है। इस कुंडली से एक अन्य कुंडली को मिलाने पर जब सोफ़्टवेयर से कुंडली को मिलाया जाता है तो दोनो मे कुल गुण साढे बारह ही मिलते है और किसी भी प्रकार से इस कुंडली से कुंडली नही मिलती है। लेकिन जब कुंडली को सूक्ष्म रूप से मिलाया जाता है तो कुंडली मे जो धारणायें बराबर की मिलती है वे मिलाने से सभी कुंडली कृत गुण दूर होते हुये माने जा सकते है।
 प्रस्तुत कुंडली से मिलान करने पर देखा जा सकता है कि चन्द्रमा जो मन का कारक है वह स्त्री कुंडली मे तो छठे भाव मे है और पुरुष की कुंडली मे नवे भाव मे है तो लेकिन वह वृश्चिक राशि का होने के कारण मंगल की ही राशि मे विराजमान है जैसे स्त्री कुंडली मे चन्द्रमा मेष राशि मे होने पर मंगल की ही राशि मे विराजमान है.मन से मन को द्रिष्टि मे रखकर अगर बात की जाती है तो यह मिलान चन्द्रमा से उत्तम माना जा सकता है। मन के बाद शादी के लिये जो महत्वपूर्ण बात होती है वह एक दूसरे की शक्ति से मानी जाती है स्त्री कुंडली मे जो मंगल अष्टम मे है और इस मंगल से पुरुष कुंडली के मंगल को अगर देखा जाये तो वह पंचम मे स्थापित है और पंचम के मंगल की पूर्ण कन्ट्रोल करने वाली नजर स्त्री के मंगल पर है पुरुष शक्ति से जब स्त्री शक्ति कन्ट्रोल करने की क्षमता होती है तो स्त्री शक्ति हमेशा कार्य के लिये मानी जा सकती है और स्त्री कभी भी गलत रास्ते की सोच को दिमाग मे नही पैदा कर सकती है। इसके अलावा शनि जो कर्म का कारक है दोनो की कुण्डली मे एक ही राशि मे यानी सिंह राशि का ही विद्यमान है स्त्री कुंडली मे शनि दसवे भाव मे है जो कार्य और पिता के सुख से दूर करने वाला तथा वैवाहिक सुख और जीवन साथी के सुख के लिये दिक्कत देने वाला माना जाता है जब कि पुरुष कुंडली मे वही शनि छठे भाव मे विराजमान है जो स्त्री कुंडली से नवम पंचम का योग कारक होने के कारण शनि से टक्कर लेने के लिये माना जा सकता है कहा भी जाता है कि लोहा लोहे से ही काटा जा सकता है दूसरे स्त्री कुंडली से अगर सप्तम के लियेदेखा जाये तो पुरुष कुंडली के अन्दर शुक्र राहु बुध सूर्य आदि ग्रह टक्कर लेने के लिये माने जाते है शनि से सूर्य की युति से धन सम्बन्धी कारणो मे सरकार और बैंक आदि के लिये अच्छा माना जा सकता है बुध से युति लेने के लिये खुद की बैंकिंग की जानकारी से आगे की बढोत्तरी की जा सकती है राहु से युति लेने से शाखायें बनाना और लोगो को रोजगार देने की बाते भी मिलती है शुक्र से युति लेने के बाद स्त्री और पुरुष दोनो ही अपनी अपनी चेष्टा से धन समाज संस्थान आदि के लिये उत्तम माने जा सकते है। गुरु जो सम्बन्धो का बनाने वाला है दोनो की कुंडली मे स्त्री कुंडली मे तो नवे भाव मे होने से गुरु का भाग्य बढाने वाला माना जा सकता है पुरुष कुंडली मे चौथा गुरु उच्च का हो जाता है और भाग्य के लिये अपनी गति को नीचता को भी उच्चता मे लाने के लिये माना जा सकता है इस प्रकार से अगर कम्पयूटर से कुंडली को मिलाया जाता है तो इतनी सभी बाते एकदम एक किनारे रखकर इस प्रकार के उपयुक्त मेल को हटा दिया जा सकता है। 

देव भक्ति और आसन

हिन्दू देवी देवताओं में प्रत्येक देवी देवता के लिये एक निश्चित सवारी का दिखाया जाना एक प्रकार से साधना के प्रथम रूप का वर्णन किया जाना माना जाता है। जिस देवता या देवी की साधना की जाती है वह उसकी सवारी के अनुरूप ही माना जाता है। दुर्गा की सवारी शेर को दिखा गया है,दुर्गा भक्ति के लिये अपनी प्रकृति को शेर की प्रकृति से जोड कर रखा जाता है। दुर्गा की भक्ति को मन्दिर मे या घर के अन्दर नही किया जा सकता है उनकी भक्ति के लिये जंगल पहाड और निर्जन स्थान कन्दरा आदि को अपनाया जाता है। इसी प्रकार से जब शिव की भक्ति को करना होता है तो अपने को इस प्रकार के स्थान पर ले जाना होता है जहां केवल सन्नाटा हो कोई वनस्पति और जीवित कारक आसपास नही हो साथ ही बाघम्बर बिछाने और भभूत लपेटने का अर्थ भी एक प्रकार से यही माना जाता है कि शिव की साधना के लिये शव यानी मृत मानना जरूरी हो जाता है बिना अपने को मृत माने शिव की साधना नही हो पाती है,निराकार मे साकार का प्रवेश होना उन्ही लोगो के लिये देखा जा सकता है जो अपने को कुछ नही मानते जो अपने को अहम के अन्दर ले कर चलते है वे शिव भक्ति कभी नही कर सकते है। गणेश भक्ति के लिये अपने को चूहा की प्रकृति मे ले जाना पडता है जैसे चूहा अपने को सुरक्षित रखते हुये सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नही करता है वह किसी भी बडे अबलम्ब के किनारे चलने और अपनी सुरक्षा को रखते हुये चलता है,तथा एकान्त और ऐसे स्थान पर अपने निवास को बनाता है जो किसी आम जीव की पहुंच से दूर हो एक प्रकार और भी देखा जाता है कि गणेश भक्ति मे अक्सर बाधा आती है उन बाधाओ से बचने के लिये चूहा अपने निवास के आसपास या माहौल मे अपने को एक से अधिक रास्ते जिस प्रकार से प्रयोग करने की युक्ति को बनाकर चलता है उसी प्रकार से गणेश भक्ति को करने वाले लोग अपने को एक ही सिद्धान्त पर लेकर नही चल पाते है उनके लिये कई प्रकार के रास्ते बनाने पडते है और एक रास्ता बन्द हो जाने पर दूसरा रास्ता उन्हे अपने आप चुनना पडता है। विष्णु को गरुण की पीठ पर सवार होता हुआ दिखाया गया है,इस वाहन से शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति अपने को दूर गामी और ऊंचाई पर लेजाकर नजर सभी कारको पर रखे और सयंत होकर अपने को आसपास के माहौल मे रखकर एकात्मक रूप से वायु प्रधान होकर यानी निराकार होकर साकार को दिष्टि मे रखकर चलता रहे। विष्णु को शेष शैया पर होना और शेषनाग का समुद्र मे होना भी एक प्रकार से शिक्षा देने वाला होता है कि गहरे पानी यानी मन के अन्दर गहरे विचार पैदा करने के बाद भी अपने आसपास के माहौल को मुलायम और जीविन्त रखकर उन विचारो का एक से अधिक कारण पैदा करने के बाद ही रहा जा सकता है। उसी प्रकार से कार्तिकेय जी की मोर के ऊपर सवार होने का कारण भी बताया गया है कि मोर स्वयं द्रष्टा होता है वह अपने को सयंत रखकर भी जब मुदित होता है तो अपने पंखो को फ़ैला कर नाचना शुरु करता है और जगत कल्याण की भावना से यह समझा जाता है कि जीव की पूर्ति का साधन पानी बरसना तय होता है उसी प्रकार से जब किसी प्रकार की गलत शक्ति की आहट होती है तो मोर चिल्लाना शुरु कर देता है,इस कारण को सूक्ष्म रूप से समझे जाने पर पता चलता है कि सुन्दर और समृद्ध होने पर स्थिति को समझने की शक्ति भी होनी जरूरी होती है इसके साथ ही विष को भोजन करने के बाद भी मोर का कुछ नही बिगडता है कारण उसके अन्दर पराशक्तियों की इतनी गर्मी होती है कि वह मोर कंकडी जैसे पत्थर को खाकर भी अपने जीवन को चलाते रहने के लिये माना जाता है। इसी प्रकार से सरस्वती का वाहन हंस भी पानी का राजा कहा जाता है वह अपने ही माहौल मे रहना पसंद करता है तथा वह भूखा रह सकता है लेकिन भोजन मे मोती ही उसकी क्रियाशैली मे माने जाते है,अपने को स्माधिस्थ भी रखता है और अपने कार्य को भी करता रहता है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया जाता है इसका एक ही कारण होता है कि लक्ष्मी उसी के पास आती है जब संसार सोता है और उल्लू जागता है की नीति से अगर काम किया जाता है तो वह लक्ष्मी प्राप्त करने के लिये अपनी गति को बना लेता है। यानी जब सब सोते है तब उल्लू जागता है और जब सब जागते है तब उल्लू सोता है। उसी प्रकार से कमल के फ़ूल पर लक्ष्मी के विराजमान होने का भान यही माना जाता है कि जैसे ही सूर्य उगता है कमल का फ़ूल खिल जाता है यानी जैसे ही सूर्य उदय हो और व्यक्ति अपने को संसार मे फ़ैलाना शुरु कर दे यानी देर तक सोना और रात को देर से सोना भी व्यक्ति को अकर्मण्य बना देता है लक्ष्मी उसके पास नही रहती है। इसी प्रकार से तकनीकी रूप बुद्धि को प्रदान करने वाले मंगल की सवारी मेढा को बताया गया है इस जीव की यह बात मानी जाती है कि तकनीकी रूप से बुद्धि को विकसित करने के लिये खोपडी मजबूत होनी चाहिये तथा दिमाग को सबल रखना चाहिये आदि बाते देवी देवताओं की सवारी से जोड कर देखी जा सकती है।

Saturday, February 25, 2012

पिता की जायदाद मिलने का समय

पिता की जायदाद मिलने का समय
माता पिता की जायदाद पर लगभग सभी का हक होता है माता पिता के द्वारा पालन पोषण करने के बाद जातक को जब अपने लिये कर्म करने के लिये स्वतंत्र कर दिया जाता है और माता पिता की मौत के बाद उनकी जायदाद जो जातक के भाई बहिने होते है उन्हे आपस मे कानूनी रूप से वितरित कर दिया जाता है लेकिन कभी ऐसी भी परिस्थितियां आती है कि जातक के अधिक भाई बहिने होने के कारण या जातक द्वारा अपने माता पिता की सही सेवा या अपने को उनके प्रति दूरियां बनाने के कारण उन्हे जायदाद से दूर रख दिया जाता है कभी कभी माता पिता के मरने के बाद या उनके जिन्दा रहते ही  जातक के भाई बहिन अपनी चालाकी से माता पिता की जायदाद को अकेले ही भोगने की इच्छा से अपने अन्य भाई बहिनो को दूर कर देते है। कभी कभी यह भी होता है कि अगर जातक स्त्री है और उसके कोई भाई नही है तो जातिका को जायदाद से दूर करने के लिये उसके पिता के भाई आदि जातिका को पिता की जायदाद नही देते है इस कारण जो आपसी द्वंद जो कानूनी या सामाजिक होता है वह जातिका के लिये दिक्कत देने वाला हो जाता है कभी कभी जायदाद मिल जाती है और कभी कभी चालाक लोगो के कारण जायदाद नही भी मिल पाती है। उपरोक्त कुंडली एक जातिका की है और उसे यह जानना है कि उसके पिता की जायदाद उसे मिलेगी कि नही ? कन्या लगन की कुंडली का मालिक बुध मृत्यु से सम्बन्धित राशि वृश्चिक मे विद्यमान है। बुध को नवम पंचम का योग देने वाले ग्रहो मे केतु और मंगल नीच का है। नीच का मंगल पिता के भाइयों के लिये इसलिये माना जाता है क्योंकि दसवे भाव के आगे मंगल पिता के कुटुम्ब मे विराजमान है.इस प्रकार से पिता का मालिक बुध जो दसवे भाव का मालिक है वह मृत्यु की राशि मे होने के कारण पिता के पास केवल पुत्री संतान ही है। जातिका को तीन बहिन भी बुध और केतु की युति से माना जाता है इसके साथ ही बुध केतु का साथ पिता परिवार के उनके भाइयों के लिये जो पिता भाव से तीसरे भाव में शनि की उपस्थिति और शनि के आगे चन्द्र राहु होने से तथा शुक्र सूर्य की युति होने से जातिका के ताऊ आदि उसके पिता की अचल सम्पत्ति के लिये अपनी नीच की मंगल वाली हरकत को करने के लिये माने जाते है। मंगल बुध और केतु की युति से जातिका का अदालती और पुलिस वाला मामला भी माना जाता है साथ ही वर्तमान मे राहु का गोचर जन्म के बुध पर होने से जातिका को पिता की जायदाद से छल या किसी कागजी बदलाव के कारण करना भी माना जाता है जातिका वर्तमान मे नवे केतु यानी जातिका की बडी बहिन के पति के द्वारा अपनी स्थिति को कोर्ट कचहरी से या उच्चतम न्यायालय की शरण मे जाकर अपनी जायदाद की प्राप्ति को लेकर परेशान है.जातिका का केतु सबल है और राहु भी चन्द्रमा के साथ है जातिका का राहु वर्तमान मे जायदाद के प्रति छल तो दे रहा है लेकिन आने वाले जनवरी के महिने से यही राहु जब जातिका के दूसरे भाव मे आयेगा तो नीच के सूर्य को अपनी गति से और अधिक परेशान करने वाला माना जायेगा इस समय मे जातिका के लिये जो छल किया गया है या किसी वकील या अन्य व्यक्ति के द्वारा कागजो मे छल आदि किया गया है वह खुल जायेगा इस प्रकार से मंगल से चौथा राहु आने से जो व्यक्ति जातिका की जमीन आदि को हडपना चाह रहे है उन्हे सजा भी मिलेगी तथा जातिका की जायदाद जातिका को मिल जायेगी। शनि जब जातिका के दूसरे भाव मे शुक्र से गोचर करेगा तो जातिका का स्थान बदलाव अपनी जायदाद के प्रति माना जायेगा,अगर जातिका आने वाली जनवरी तक अपनी जायदाद के लिये लगातार सक्रिय रहती है तो जातिका को जायदाद मिल जायेगी।

Wednesday, February 22, 2012

फ़ायनेंस कम्पनिया और राहु

कुंडली का चौथा आठवा और बारहवां भाव व्यापार का भाव होता है.व्यापार के भावो को चलाने के लिये उनके चौथे भाव का सशक्त होना जरूरी होता है.जैसे खुद के व्यापार के लिये चौथे भाव से चौथा भाव यानी सातवा भाव और ब्रोकर वाला कार्य करने के लिये ग्यारहवा भाव विदेशी कारको का व्यापार करने के लिये तीसरा भाव सशक्त होना जरूरी होता है.व्यापार का प्रकार हमेशा चौथे आठवे और बारहवे भाव के स्वामी के अनुसार ही मना जाता है.जितने शक्तिशाली इनके भावेश होते है उतनी ही अच्छी तरह से व्यापार का कारण बनता है और व्यापार के भाव से ग्यारहवे यानी दूसरे छठे और दसवे भाव के अनुसर ही कार्य करने पर व्यापार का फ़ल प्राप्त होता है अगर व्यापार का भाव किसी प्रकार से इन भावो के स्वामियों की कमजोरी या किसी विरोधी ग्रह के कारण दिक्कत मे होता है तो व्यापार का कारण अक्सर बरबाद होता ही देखा जाता है.प्रस्तुत कुंडली सिंह लगन की है और स्वामी सूर्य का स्थान छठे भाव मे है,जातक धन के मामले मे अच्छा जानकार है बैंकिंग बचत कर्जा देना कर्जा लेना कर्ज से ब्याज कमाना आदि कारण जातक को बहुत अच्छी तरह से आते है.लगनेश से ग्यारहवे भाव मे व्यापार का चौथा भाव है जातक व्यापार करने के लिये केतु का सहारा लेता है,यानी वह अपनी लगन से मृत्यु के बाद की सम्पत्ति को प्रयोग करने अपने द्वारा जो भी कार्य किये जाते है उनके अन्दर सरकारी धन को लेने के बाद अपने अनुसार धन को देने के लिये बुद्धि को रखता है यह एक प्रकार से सरकारी धन बैंक आदि के लिये दलाली या ब्रोकर वाला कार्य जाना जाता है.इस कुंडली मे धन का स्वामी बुध है और लाभ का स्वामी भी बुध है बुध के साथ पंचमेश और अष्टमेश गुरु बारहवे भाव के स्वामी चन्द्रमा तीसरे और दसवे भाव के स्वामी शुक्र भी अपनी शक्ति को प्रदान कर रहे है। शनि जो छठे और सातवे भाव के स्वामी है भाग्येश और सुखेश मंगल के साथ विराजमान है.चन्द्र राशि धनु है तथा कारकांश मेष का है।

सूर्य राजनीति का कारक भी है और लगनेश भी है सूर्य से बारहवे भाव मे गुरु शुक्र चन्द्र और बुध के होने से जातक का लगाव राजनीतिक व्यक्तियों से भी है और यही कारण जातक को व्यापार मे बल देने के लिये भी माना जा सकता है। कार्य भाव मे राहु है और राहु सूर्य से युति लेकर विराजमान है सूर्य राहु के लिये अपनी सहायता को  प्रदान कर रहा है और इसी राहु के कारण जातक का अपने को धन के लिये विस्तार मे लाने के लिये भी अपनी शक्ति को दे रहा है। जब केतु वृश्चिक राशि का होता है और चौथे भाव मे बैठ जाता है तो जातक जनता के साथ धन और बैंकिग वाले कार्यों को करने लगता है,इस भाव के ग्यारहवे भाव का स्वामी बुध है और बुध अक्सर दूसरे भाव से प्राइवेट बैंकिन्ग को तभी प्रसारित करता है जब वह इस भाव के दूसरे यानी पंचम भाव के मालिक से अपनी युति को प्राप्त करता है। गुरु कानून भी है बुध जानकारी के लिये फ़ाइनेन्स वाले कानूनो को भी जानता है पिता या परिवार का कोई सदस्य कानून का अच्छा जानकार हुआ करता है इस कारण से जातक को कानूनी प्रक्रिया मे दिक्कत नही आती है। लेकिन जातक का भाग्य हर अठारह महिने मे बदलते रहने के लिये राहु अपनी युति को प्रदान करता रहता है। तथा अपनी गति से जातक के लिये हर ग्यारह साल मे एक प्रकार का उल्टा प्रभाव देने के लिये भी अपनी गति को प्रदान करता है। जातक की स्थिति इस प्रकार से पहले तो बढती है और धीरे धीरे बढने के बाद घटनी शुरु हो जाती है। एक बार जातक के प्रयासो से स्थिति बनती है और बाद मे साझेदारो या साथ मे काम करने वाले लोगो की जल्दबाजी से घटनी शुरु हो जाती है। यह राहु के कारण ही होता है। इसके साथ ही जातक को समाप्त करने के लिये जल्दी से धन कमाने वाली स्थिति से भी उल्टा प्रभाव शुरु हो जाता है जातक अपने सहायक लोगो के साथ जल्दी से धन कमाने वाले कारणो मे शुरु हो जाता है और जैसे ही वह इस प्रकार के कार्यों मे अपने को ले जाता है यह राहु सभी प्रकार के जल्दी से कमाने वाले साधनो को बरबाद करने के लिये अपनी गति को प्रदान करने लगता है.

गल्ती दिग्विजय की नहीं ?

मीन राशि का मालिक गुरु बताया जाता है लेकिन हकीकत मे इस राशि का मालिक राहु होता है.राहु के गोचर के अनुसार मीन राशि काम करती है.प्रस्तुत कुंडली एक दिग्विजय नामक व्यक्ति की है जो मुंबई मे पैदा हुआ है और बहुत ही बडी उलझन मे फ़ंसा हुआ है.इस राशि के अनुसार धन भाव मे बाहुवल है,हिम्मत मे धन बल है मानसिकता मे कमन्यूकेशन है,राज्य मे जनता है रोजाना के कामो मे और कर्जा दुश्मनी बीमारी को पैदा करने मे राज्य का बल मिला है साझेदार और जिन लोगो से जीवन भर उलझना है वह बाते उन्ही लोगो के लिये है जो मेहनत कश लोग है बैंक और बचत वाले कामो से जुडे है,अपमान मृत्यु जान जोखिम मे तथा रिस्क लेने मे बेलेन्स बनाने की कला है,धर्म भाग्य और विदेश आदि के मामले मे गूढ बातो को निकाल कर कटाक्ष करने की आदत है,जब भी कोई तीखी बात की जायेगी वह धर्म कानून और बडी शिक्षा के प्रति ही की जायेगी रोजाना के कामो मे न्याय से जुडे लोगों में कालेज शिक्षा से जुडे व्यक्तियों से विदेशी नीतियो मे अपनी दखल देने की बात को भी दसवे भाव मे धनु राशि की उपस्थिति से माना जा सकता है.लाभ मे सरकारी कार्यों और सरकारी क्षेत्र से जुडी राशि मकर होने से इन्ही को लाभ के लिये देखा जायेगा तथा जो भी खर्चा होगा वह लाभ से प्राप्त करने के बाद अपनी साख बनाने के लिये मित्रो पर कार्य पूंजी को कार्यों मे लगाकर तथा मानसिक रूप से अपने जीवन को एक बार मित्रता मे लाकर उस मित्रता के प्रति मर मिटने की बात भी सोची जा सकती है और मित्रता के कारणो मे ही अन्तिम गति को माना जा सकता है।

राहु इस राशि का मुख्य कारक होता है जैसे जैसे राहु गोचर से भ्रमण करता है वैसे वैसे कारण जातक के जीवन मे पैदा होते जाते है। यह भी माना जाता है कि जातक के लिये राहु ही भाग्य विधाता से लेकर भाग्य अवरोधक के रूप मे अपना काम करता है.इस राशि वाले अक्सर राहु की आदतो से भी देखे जाते है और दो लोगों को लडाकर दूर बैठ कर तमाशा देखने वाले कारको मे राहु को भी गिना जाता है.राहु मेष राशि मे होने से जातक को बाहुबल देता है वृष राशि मे प्रसिद्धि देता है मिथुन राशि मे असीमित यात्राये देता है और जनता से जुडने के काम देता है कर्क राशि मे जनता से जुडे और जल्दी से धन कमाने के कारको के साथ साथ खेल कूद तंत्र मंत्र और निजी शिक्षण संस्थाओ आदि से धन को देने वाला होता है यह जनता के मनोरंजन आदि के लिये भी अपनी बातो को लोगो से कहलाकर मजे लेने के लिये जाना जाता है,राहु जब सिंह राशि का होता है तो यह गुप्त रूप से सरकारी दवाइयों सरकारी अस्पतालो और सरकार से जुडे बचत करने वाले कार्यों मे अपना दखल देता है कन्या राशि से जूझने के लिये ही इस राशि का प्रभाव राहु देता है और जब यह कन्या राशि का होता है तो इतने दुश्मन पैदा कर देता है कि जातक उन दुश्मनो से जूझने की हिम्मत अपने साथ तीन साथियों के साथ होने पर ही लेता है.लेकिन बडी पोस्ट देने के लिये भी कन्या का राहु अपनी योग्यता को देता है.तुला राशि का राहु जातक को जेल जाने जैसी बातो के लिये जाना जाता है जातक को पश्चिम दिशा से बुरी तरह से अपमानित भी किया जाता है यह अपमान जनता के द्वारा ही होता है या जान जोखिम के लिये जातक को तुला राशि वाले ही अपनी योग्यता से सामने आकर भिडने की कोशिश मे रहते है.यही राहु जब वृश्चिक राशि का होता है तो जातक अपनी अन्दरूनी गुप्त नीतियो से कानूनी लोगो को समाप्त करने और कानूनी के कारको को अपमानित करने के लिये भी अपनी गति को प्रदान करता है विदेशी लोगो से अनाप सनाप फ़ायदा लेने के लिये भी जातक अपनी योग्यता को जाहिर करता है,इस राशि के राहु से जातक सीधे रूप मे तो अपने मित्रो का भला करने की बात करता है सामने भी रहता है लेकिन अन्दरूनी रूप से जो उसके लिये चल रहा होता है वह किसी को नही पता होता है वह अपनी चालाकी से या गुप्त नीति से अस्पताली कारण बनाकर पोस्टमार्टम वाला न्याय दिलाने की हिम्मत भी रखता है.धनु राशि मे आकर वह राज्य से सम्बन्धित धन को प्राप्त करने की युति को पूरा करता है यह धन चाहे वह विदेशी नीतियों से मित्रो के सहयोग से प्राप्त करे या वह रक्षा सेवा आदि के लोगो से उगाही करने के बाद करे या उसने जो पूर्व मे अपनी मानवीय भीड सम्बन्धित बाहुबल प्राप्त किया होता है उससे प्राप्त करने के लिये जाना जाता है इसके अलावा वह सिंह राशि से सम्बन्ध रखने के कारण गुप्त रूप से मनोरंजन मे खेल मे शिक्षा मे राज्य की दुखद स्थिति मे कमाने की हिम्मत भी करता है और दिन रात इसी प्रकार के कारणो मे अपने को लगाये रखता है जैसे वह ही सबसे अधिक काम करने वाला हो,इसके अलावा भी वह राहु जो मीडिया का कारक है के सामने अपनी अच्छी बुरी नीतियों को प्रदर्शित करने की योग्यता को भी रखता है साथ ही अपने किसी भी प्रतिद्वंदी की नीतियों को जनता मे प्रसारित करने की योग्यता को भी सामने रखने की औकात को रखता है,यही राहु जब मकर राशि का होता है तो राजकीय मित्रो की सहायता से दक्षिण दिशा की मित्रता की बदौलत अपने लाभ के साधनो को देखता है राहु की पूरी द्रिष्टि चन्द्रमा पर होने के कारण जातक आसमानी रूप से प्रसारित करने वाली मीडिया से अपना सम्पर्क रखता है और निजी मित्रता पूर्ण सम्बन्ध बनाकर उनसे मन चाहे काम भी निकलवाने की हिम्मत रखता है। यही राहु जब इस राशि के बारहवे भाव मे होता है तो राज्य से सम्बन्धित कारको को बढाने के लिये अपनी छाया से अपने मित्र और राज्य से प्राप्त करने वाले लाभ आदि के लिये भी अपनी डर वाली नीति को प्रदर्शित करता है जिससे लोग उसके आगे पीछे घूमते रहते है।

किसी भी राशि के लिये उसका मानसिक कारण और उसकी मानसिक सोच अगर देखी जाये तो वह जातक के चौथे भाव से देखने को मिलती है,मीन राशि के चौथे भाव मे मिथुन राशि होती है जो भी कारक मिथुन राशि के होते है जैसे मीडिया लिखने की कला बोलने की कला अपने को प्रदर्शित करने की कला लोगो से बात चीत करने की कला अगर यही बात राजकीय पार्टियों के रूप मे देखी जाये तो कांग्रेस जो मिथुन राशि से सम्बन्ध रखती है के रूप मे देखा जा सकता है जबकि विरोध मे कन्या राशि के होने से और कन्या राशि के चौथे भाव मे धनु राशि होने से भाजपा जैसी पार्टियों के खिलाफ़ ही इस प्रकार के जातक अपनी सोच को रखते है। भारत की राशि भी इसी राशि से होने के कारण मीन राशि हमेशा अपने ही देश के प्रति कुछ न कुछ नुक्ताचीनी करने के लिये जानी जाती है और अपने कार्य स्थल को बनाने तथा अन्दरूनी रूप से मिलकर कार्य करने के लिये भी अपनी योग्यता को देखने के लिये जाना जा सकता है.

मीन राशि का जातक किसी न किसी प्रकार से तांत्रिक कारणो से जुडा होता है चाहे वह अपने घर मे पितर आदि की पूजा करता हो या किसी ऐसे व्यक्ति की शरण मे रहता हो जैसे वह शमशानी कारणो से जुडा हो अक्सर इस राशि वाले शमशानी शक्तियों के पुजारी होते है और इस बात को तब और पहिचाना जा सकता है जब इस राशि वाले जातको के होंठो को अगर देखा जाये तो ऊपर वाले होंठ के बीच का हिस्सा कुछ नीचे लटका हुआ होता है। शमशानी शक्तियों के दबाब के कारण अक्सर इस प्रकार का जातक चलते समय नीचे देखकर ही चलता है।

इस राशि वाले व्यक्ति के लिये मारक मेष राशि वाले जातक ही होते है और अक्सर सिर की बीमारियों से जातको की मृत्यु होती है। मोक्ष देने के लिये भी चौथे भाव की राशि को माना जाता है कारण चौथे भाव मे मिथुन राशि होने के कारण और मिथुन राशि का स्वभाव दोहरा होने के कारण जैसे वह किसी के साथ भी अच्छा भी कर सकती है और बुरा भी कर सकती है के कारण जैसे ही इस राशि वाला जातक इस राशि के लिये अयोग्य सिद्ध होता है इस राशि का कारण ही जातक को समाप्त करने के लिये माना जाता है।

पिछले अडतीस महिने से इस राशि के लिये राहु अपने अच्छे फ़ल दे रहा है लेकिन आने वाले जनवरी दो हजार तेरह से राहु मृत्यु भाव मे गोचर करेगा वह समय इस राशि के जातक के लिये दुखदायी माना जा सकता है कारण जो भी जातक के लिये जूझने वाले कारण है उन कारणो की मानसिक गति जातक के तीसरे भाव मे होगी और यानी गुरु का गोचर तीसरे भाव मे प्रतिपक्षी के धर्म मे होगा,यही धार्मिक कारण जातक को अपमान भी दे सकते है दुर्घटना को भी दे सकते है जेल की हवा भी दे सकते है या जातक को गुप्त रूप से दक्षिण मे रहने के लिये प्रेरित भी कर सकते है,अक्सर राहु का योगात्मक प्रभाव अष्टम से होने के कारण रिस्क देने शरीर मे कमर के नीचे इन्फ़ेक्सन देने के लिये पत्नी या गुप्त रूप से साथ चलने वाले लोगो के द्वारा ही अपघात का कारण भी जाना जा सकता है.किसी प्रकार के अनैतिक सम्बन्ध भी जातक को बडा अपमान देने के लिये माने जा सकते है।

मीन राशि वाले जातक कभी भी किसी के नही होते है वह अपनी परिवार और समाज की मर्यादा से अलविदा ले चुके होते है और उन्हे विजातीय लोगो से अपना रुतवा जमाने वाले लोगो से मिलते रहने की उत्कंठा हमेशा ही बनी रहती है,जब भी वे किसी के साथ समर्पित भावना से काम करते है तो यह समझ लेना चाहिये कि या तो वे जहां काम कर रहे है उस स्थान के सभी भेद लेने के बाद अपना एक छत्र राज्य स्थापित करने के लिये कब कैसे और कहां उसे समाप्त कर दे,या किसी प्रकार से अपघात करने के बाद जिसके लिये काम कर रहे है उसे समाप्त कर दे.

खराब समय से लाभ

कठिन समय से भी भलाई
एक जातिका का प्रश्न है कि अपने अच्छे जीवन के लिये वह क्या कर सकती है,उसक साथ जो भी हो रहा है वह सही नही है.प्रस्तुत कुंडली मे लगनेश मंगल चौथे भाव मे है इस मंगल को शास्त्रीय रूप से नीच का माना जाता है साथ मे शुक्र भी है जो बारहवे और सातवे भाव मा मालिक भी है.बारहवा खर्च का मालिक है और सातवा जो भी जीवन मे जद्दोजहद करने का कारण बनाने के लिये अपने प्रभाव प्रस्तुत करता है वैसे तो सीधी भाषा में इस भाव को जीवन साथी का भाव भी कहा जाता है लेकिन जैसे ही जातक खुद के प्रयास से कुछ करने की अपनी मर्जी को जाहिर करने लगता है वही पर सातवे भाव का फ़ल मिलना शुरु हो जाता है। उदाहरण के लिये अगर सातवे भाव को जीवन साथी का भाव कहा जाता है तो सातवा भाव साझेदार का भी होता है और सातवा भाव ही कोर्ट कचहरी मे मुकद्दमा आदि लडने वाले प्रतिद्वंदी का भी होता है। कुंडली मे अगर सप्तमेश और लगनेश का साथ होता है तो दोनो भावो का फ़ल मिश्रित हो जाता है देखना यह पडता है कि दोनो मे प्रभाव किस प्रकार का है.लगनेश मंगल मे पहला प्रभाव चन्द्रमा का है क्योंकि वह चन्द्रमा की राशि कर्क यानी चौथे भाव मे है,दूसरा प्रभाव शनि का है क्योंकि वह शनि की राशि मे है तीसरा प्रभाव उसके अन्दर नक्षत्र का जो धनिष्ठा मे विराजमान है और चौथा प्रभाव उस नक्षत्र के पद का है जो बुध का है,पांचवा प्रभाव शुक्र के साथ होने से शुक्र का भी मिश्रित प्रभाव मिला हुआ है,छठा प्रभाव बारहवे चंद्रमा का भी जो नवम पंचम गति से मंगल को अपना असर दे रहा है,सातवा प्रभाव अष्टम गुरु का है जो अपनी नवी द्रिष्टि से अपना असर दे रहा है आठवा प्रभाव गुरु चन्द्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है नवां प्रभाव गुरु चन्द्र और शुक्र की मिश्रित प्रणाली से मिल रहा है,तथा दसवा प्रभाव मिथुन तुला राशियों का भी इस प्रकार से मंगल के बल को देखने के लिये इन दस कारणो को देखना जरूरी है,यह सभी कारक जब मिश्रित किये जायेंगे तभी जातिका के जीवन के प्रति कुछ सही फ़लादेश करना उचित रहेगा।

जातिका की योग्यता आदि के लिये इन दशो प्रभावों को समझने के लिये इस प्रकार से समझा जायेगा:-

  • चौथा भाव माता मन मकान का कारक है,मंगल जब इस भाव मे होता है तो साधारण रूप से मानसिक क्लेश का कारक कहा जाता है.घर मे होने वाले क्लेश को समझने के लिये मंगल जो भाई का कारक भी है और शुक्र के साथ होने से भाई की पत्नी के लिये भी माना जाता है इसलिये भाई की पत्नी के द्वारा घर मे क्लेश पैदा किया जाना जरूरी है.घर मे किसी न किसी प्रकार से धन की जद्दोजहद का रहना भी माना जाता है यानी प्रोग्रेस के समय मे भोजन की भी कमी का होना देखा जा सकता है.फ़ेफ़डे का कारक होने के कारण तथा ह्रदय पर असर देने के कारण जुकाम वाली बीमारिया और अधिक सर्दी जुकाम रहने से सिर मे चक्कर आना तथा जुकाम के कारण ही आंखो पर असर देने के लिये भी माना जा सकता है,अक्सर यह प्रभाव बायीं आंख पर अधिक होता है जैसे आंख से पानी का बहते रहना आदि.माता के साथ जब सप्तमेश साथ मे है तो शुक्र नानी का कारक भी हो जाता है यानी चौथे से चौथा भाव नानी का भी माना जाता है,नानी के घर मे भी इसी प्रकार का क्लेश माना जा सकता है नानी की बीमारियां भी इसी प्रकार की मानी जाती है,सप्तम दूसरे नम्बर के भाई बहिन के लिये भी माना जाता है सप्तम का मालिक शुक्र लगनेश के साथ होने से दूसरे नम्बर की बहिन के साथ भी इसी प्रकार का क्लेश देखा जा सकता है,मंगल को स्त्री की कुंडली मे पति के रूप मे भी देखा जा सकता है,इसी प्रकार के कारण पति के लिये भी माने जा सकते है और यही कारण पति की माँ यानी जातिका की सास के लिये भी माना जा सकता है.लेकिन इस भाव के मंगल के लिये यह भी माना जाता है कि जातिका भले ही छोटी हो लेकिन अपनी उम्र के अट्ठाइस साल के बाद उसे अपने घर के लिये बडप्पन की बाते ही करने को मिलेंगी,कारण इस उम्र तक उसने सभी प्रकार के कष्ट सहन कर लिये होते है और अनुभव के आधार पर वह किसी प्रकार के घर के झगडे निपटाने की कला का ज्ञाता हो जाता है.यही बात पति के लिये भी होगी नानी के लिये भी होगी और भाई के लिये भी होगी.अगर जातक किसी प्रकार से अपने घर से दूर चला जाता है यानी किसी प्रकार से शादी के बाद पति के साथ दूर चला जाता है तो बडा भाई घर मे औलाद या सेहत के मामले मे दुखी ही रहना माना जाता है। माता के भाव से ग्यारहवे भाव का मालिक गुरु होने के कारण बडे मामा को भी दुखी माना जा सकता है.जातिक की कुंडली से अष्टम भाव मे गुरु होने के कारण जातिका का ताऊ भी इसी प्रकार से दुखी माना जा सकता है और इस भाव से नवे भाव मे चन्द्रमा होने से जातिका की दादी के लिये भी यही बात जानी जा सकती है.शरीर मे गले के बाद वाले भाव मे मंगल के होने से जातिका को गर्दन की बीमारियां भी होती है जो शुक्र के साथ रहने से थाइराइड जैसी बीमारियों के बारे मे भी सूचित करता है। मंगल केन्द्र मे स्थापित है और लगन का मालिक होने से चौथे मे बैठने से तथा सप्तमेश के साथ होने से दसवे भाव में सप्तमेश और लगनेश मंगल की द्रिष्टि होने से मंगल का केन्द्र मे कब्जा है यह मंगल शुक्र के साथ होने से शरीर के केन्द्र को भी आहत करता है यानी नाभि वाली बीमारियां भी होती है.
  • इस भाव का मंगल खून के अन्दर पतलापन पैदा करता है यानी पानी के भाव मे होने से और शनि की राशि मे होने से दिमाग मे शक की बीमारी को भी पैदा करता है,जो लोग जान पहिचान वाले होते उनके अन्दर भी जातिका के प्रति शक की बीमारी को पैदा करने के लिये माना जाता है.भाग्य के भाव को अपनी छठी नजर से देखने के कारण भाग्य भी काम नही करता है केतु की अष्टम द्रिष्टि होने के कारण वह उम्र की पच्चीसवी साल तक किसी न किसी प्रकार से कालेज के किसी व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धो के लिये भी जोडा जा सकता है,जैसे केतु की अष्टम नजर लगनेश पर पडने के कारण भी जाना जा सकता है.इस कारण से इस भाव के मंगल मे एक प्रकार से एक दूसरे से बदला लेने की भावना भी पैदा हो जाती है और इस भावना से मंगल जो भाई का कारक है और मंगल जो पति का कारक है बदला लेने के कारण जेल जाने के कारणो को भी बना सकता है.जेल जैसे स्थान मे रहना भी एक प्रकार से इस मंगल के कारण ही देखे जाते जब सूर्य से गयरहवा शनि राहु हो यानी एक ऐसी सरकारी संस्था जहां पिता काम करता हो और वह जेल जैसी संस्था को संभालने का काम करता हो तो भी जेल जैसी स्थिति को ही माना जा सकता है.
  • चौथे भाव को आठवा भाव नवे भाव से और छठा भाव ग्यारहवे भाव से अपनी नजर को रखता है,यानी ताऊ अपनी नजर से अपनी मालिकियत को मानता है और छठा भाव अपने लाभ का साधन मानता है इसलिये जातक को जब भी परेशानी होती है तो अपने ताऊ चाचा आदि से होती है और घर मे बंटवारे आदि जैसे कारण अधिकतर इन्ही लोगो के कारण चलते रहते है.अष्टम मे गुरु के होने से और छठे भाव मे बुध के होने से यह लोग जो भी अपनी कानूनी प्रक्रिया को करते है वह गुप्त रूप से करते है,एक तरफ़ तो वे अपने को इस प्रकार से जाहिर करते रहते है कि वे ही सच्चे हितैषी है लेकिन पीठ पीछे अपनी ही चलाने की बात करते है और गुरु के आगे केतु होने से जातिका के ताऊ आदि अपने चार प्रकार साधनो से अदालती कार्य आदि करते रहते है इस कारण से जातिका के घर मे भी तनाव रहता है.
  • सूर्य का शिक्षा स्थान मे होना और शनि राहु की सम्मिलित नजर सूर्य पर होने के कारण जातिका के पिता किसी बडे संस्थान को संभालने के लिये माने जा सकते है जो शिक्षा या राज्य के प्रति जाना जाता हो और सचिव जैसी हैसियत को रखता हो.
  • वर्तमान मे जातिका की दशा शनि की चल रही है और यह दशा जातिका को किये जाने वाले कार्यों से दिक्कत को देने के लिये मानी जाती है लेकिन इस मंगल की युति के कारण जातिका जितना कष्ट भोगेगी उतना ही उसे अपने पतले खून को मजबूत बनाने के लिये जाना जायेगा.
  • चन्द्रमा का मंगल के साथ योगात्मक प्रभाव होने के कारण जातिका की बुरे वक्त मे कोई न कोई अद्रश्य शक्ति सहायता के लिये आजायेगी.लेकिन जातिका जब मेहनत वाले काम करेगी तो ही यह सम्भव है हरामखोरी मे यह शक्ति खुद ही जातिका को परेशान करने से नही चूकेगी.
  • अप्रैल दो हजार पन्द्रह तक जातिका को बहुत मेहनत करने की जरूरत है इसके बाद जातिका को अक्समात ही प्रोग्रेस के रास्ते गुरु की सहायता से खुलने लगेंगे.

Tuesday, February 21, 2012

अष्टम राहु यानी इन्फ़ेक्सन

माया कलेन्डर को सन दो हजार बारह के आगे नही लिखा गया है कहते है कि सन दो हजार बारह के आखिर मे संसार का विनाश हो जायेगा.मुझे विनाश मनुष्य का नही समझ मे आ रहा है मनुष्यता का जरूर समझ मे आ रहा है.अगर देखा जाये तो संसार में जो मनुष्यता है वह रिस्तो पर निर्भर है,पिछले समय से राहु की गति के कारण लोग अपने अपने रिस्तो पर ही कनफ़्यूजन करने लगे है.राहु का वर्तमान का प्रभाव बहुत ही गहरा सदमा देने वाला माना जा सकता है.पहले जो भी लोग सामाजिक बन्धन मे बन्ध जाते थे उस बन्धन को आजीवन निभाने के लिये कृत्संकल्प हो जाते थे,सामाजिक वाणी उनके लिये एक प्रकार से अग्नि रेखा का के रूप मे मानी जाती थी लेकिन आज सामाजिक वाणी के साथ साथ सामाजिक मर्यादा का भी हनन हो चुका है.माता पिता बच्चे को पैदा करते है और उन्हे सीधा सा वही शिक्षा का क्षेत्र बताते है जहां से उसे बहुत ही अच्छी नौकरी या चालाकी के रास्ते बताये जाते हो.बच्चा जब शिक्षित हो जाता है तो वह अपनी माता पिता और परिवार की मर्यादा को भूल जाता है उसे लगता है कि यह सब बेकार है,वह जो कर रहा है वही सही है माता पिता जो कर रहे है वह बेकार की बात है. जब किसी प्रकार की चर्चा भी की जाये तो लोग कह देते है आधुनिक युग की बात है.जनरेशन गैप है इसे रोका नही जा सकता है.जब अधिक मर्यादा वाली बात को कर दिया जाये तो उसके लिये कई कारण भी सामने आजाते है,कभी कभी तो लोग अपने घरवार परिवार और समाज को यूं छोड कर चले जाते है जैसे वे इस समाज मे पैदा ही नही हुये हों वे कहीं बाहर से आये हों.

निम्न परिवारो की हालत यह है कि शाम को उनके घरो मे चूल्हा जले न जले लेकिन शराब का नशा जरूर करते हुये लोग मिलेंगे,उनके लिये अगर शराब का मिलना मुस्किल हो तो वे अन्य प्रकार के नशे करते मिलेंगे,जैसे खांसी की दवा का पीना कैमिकल भांग वाले मुनक्का खाना स्मेक को लेना और इसी प्रकार के अन्य नशे करने के बाद उन्हे जैसे रात गुजारने के लिये कोई स्थान चाहिये उन्हे घर से कोई मतलब नही होता है सडक पर कोई खाना बेचने वाला मिल गया तो वे उससे खाना उसी प्रकार से मांगते नजर आयेंगे जैसे वह मनुष्य नही होकर किसी भटकते हुये जानवर की श्रेणी मे आ गये हो,उनके घरो की औरतो का बहुत ही बुरा हाल है,वे कहने को तो अमुक की माता अमुक की बहिन और अमुक की पत्नी है लेकिन उन्हे यह संकोच नही है कि वे अन्य पुरुषो से सम्पर्क तो बना रही है लेकिन बदले मे मिलने वाली बीमारिया और इन्फ़ेक्सन आदि उन्हे आगे के जीवन केलिये कितना दुखदायी होगा वे किसी भी प्रकार से अपनी सेहत परिवार और समाज मे जिन्दा कैसे रह पायेंगी,उनकी सन्तान सब कुछ समझदारी से देखती है लेकिन वह कुछ तब तक नही कहती है जब तक वह बडी नही हो जाती है और जैसे ही वह बडी होती है अपने लिये एक स्त्री या पुरुष का चुनाव अपनी मर्जी से करने के बाद बिना शादी विवाह के जाकर अपने किराये या इसी प्रकार के किसी स्थान पर टिक जाते है बच्चे पैदा होने लगते है और जब  परिवार का भार बढने लगता है तो वे अपने अपने रास्तो पर चले जाते है माता अपने बच्चे को या तो अकेला छोड कर चली जाती है या पैदा होने के बाद उसे किसी अन्जान स्थान पर छोड देती है पिता किसी अन्य स्त्री को अपने लिये खोज लेता है और स्त्री अपने लिये किसी अन्य पुरुष को खोज लेती है.

मध्यम परिवारो मे अगर देखा जाये तो पुरुष और स्त्रियां दोनो ही नौकरी मे लगी होती है जब वे घर से बाहर होते है और उनके बच्चे अकेले घर मे होते है तो वे अपनी मर्जी से ही रहने खाना खाने आदि के लिये अपनी मानसिक धारणा को एकान्त का रखते ही है लेकिन जब वे कुछ बडे हो जाते है तो वे अपने माता पिता की हरकतो को देखने के बाद वही सब कुछ करने लगते है जो उनके माता पिता बच्चो को सोता हुआ समझ कर करते है.यही नही जब पिता को कोई अपनी पसन्द का कारण मिल जाता है तो पिता का हो सकता है कि वह रात को घर ही नही आता है और माता को भी देखा जाता है कि वह अपने लिये कोई भी कार्य अपने परिवार की  जरूरतो को पूरा करने के लिये या अपनी शौक को पूरा करने के लिये कर सकती है जो उसके लिये सामाजिक बन्धन मे कभी भी मान्य नही है,इस प्रकार का दगा पति पत्नी ही आपस मे करते है तो आगे बच्चे भी अपने माता पिता की बातो को दिमाग मे रखकर करने से नही चूकते है।

उच्च वर्ग मे देखा जाता है कि माता पिता दोनो ही किसी न किसी नाम के लिये अपनी योग्यता को बनाने के लिये उस प्रकार के कारणो को पैदा करने लगते है कि उनके बच्चे कांच के महलो मे कैद हो रहे होते है उन्हे स्कूल जाने और घर आने से ही मतलब होता है किसको कितना दर्द है उन्हे पता ही नही होता है अगर किसी भडे बच्चे से पूंछ भी लो कि तुम्हारे दादा का क्या नाम है तो वह नही बता पायेगा,साथ ही अन्य रिस्तो की बाते भी उसे पतानही होंगी केवल वह जानता होगा उन्ही लोगो को जो माता या पिता के लिये विजनिश मे साझेदार होते है या किसी पार्टी आदि मे शामिल होने के लिये आये होते है.

यह राहु का इन्फ़ेक्सन कालपुरुष के अनुसार लोगो के अन्दर एक प्रकार से हवस जैसी हालत को बना रहा है किसी भी सोसियल साइट पर देखो लोग अपनी अपनी धारणा को किस प्रकार से प्रकट कर रहे है कोई भी किसी प्रकार से सामाजिक धारणा को नही समझना चाहता है,घरो के अन्दर अहम का भाव पैदा हो गया है भाई भाई को नही समझ रहा है पिता माता को नही समझ रहा है माता अन्य रास्ते पर जा रही है पुत्र अन्य रास्ते पर जा रहा है पुत्री अपने रास्ते पर जा रही है किसी को किसी से कोई मतलब नही रह गया है ऐसा लगता है जैसे एक जानवर ने अपने बच्चे को पालकर बडा कर दिया है और वह अपने कर्तव्य से दूर हो गया है,जो लोग अभी भी कुछ मर्यादा को लेकर चल रहे है उन्हे मर्यादा मे रहने नही दिया जा रहा है किसी न किसी कारण से उनके लिये अजीब से कारण पैदा किये जा रहे है,कि किसी भी प्रकार से मर्यादा मे चलने वाला व्यक्ति भी उन्ही के साथ साथ अपनी कार्य शैली को प्रयोग मे लाना शुरु कर दे.

ठगी यानी राहु की माया

परीक्षा मे की जाने वाली ठगी
रहीमदास जी ने एक दोहा कहा था -"रहिमन आपु ठगाइये और न ठगिये कोय,आपु ठगे सुख ऊपजे और ठगे दुख होय॥" इस दोहे का अर्थ बहुत बडा है,जो लोग दूसरे को ठगकर अपनी स्वार्थी भावना को पूरा करना चाहते है वह कभी अपनी भावना को पूर्ण नही कर सकते है और जो लोग स्वार्थी भावना से ठगे जाते है वे अपने को आगे से स्वार्थी भावना वाले लोगो से बचने के लिये अपने उपाय कर लेते है और जो उनके द्वारा ठगा गया है उसे वह अपने प्रयास से पूरा भी कर लेते है। जिसने किसी को ठगा है वह किसी न किसी कारण से बहुत गहरे रूप में ठगा जाता है,तथ वह अपनी कमी को कभी भी पूरा भी नही कर सकता है तथा हमेश ही दुखी रहते हुये माना जाता है। नीति की बात को समझने के लिये अगर इस दोहे को समझा जायेगा तो काफ़ी राहत उन लोगो को मिलेगी जो तन से धन से परिवेश से मन से सन्तान से रोजाना के कामो से जीवन साथी से जमा की पूंजी से धर्म से कार्य से मित्रता से यात्रा आदि मे ठग जाते है और बाद मे वे अपने को यह कहकर कर चुप होते देखे जाते है कि यह समय की बात थी। मनुष्य मनुष्य को कभी ठग नही सकता है यह बात भी सत्य है कारण जो शरीर बुद्धि एक व्यक्ति के पास होती है वैसी ही दूसरे के पास भी होती है एक को समय खाली करता है एक को समय भरता है,कारण कोई भी बनता है,जब कारण बनता है तो शरीर अपने ही शरीर को ठगा देता है,धन और परिवार वाले खुद को ही ठगने के लिये तैयार हो जाते है जो परिवेश आसपास का है उसी के अन्दर लोग घात लगाकर ठगने से नही चूकते है कभी कभी घर के अन्दर भी अपने ही लोग ठगने के लिये तैयार हो जाते है यहां तक कि माता पुत्र को और पुत्र माता को भी ठग सकते है। कोई नौकरी करने के बाद ठगा जाता है कोई नौकरो के द्वारा ठगा जाता है। कभी कभी देखा जाता है कि साझेदार ही ठगी करके चला जाता है कभी पति पत्नी को और पत्नी पति को ही ठगने के लिये आमने सामने खडे हो जाते है,कभी कभी नई नई स्कीम देकर और भविष्य के लिये जमा करवा कर खुद ही अपनी ठगी का शिकार होना पडता है,कोई धर्म से ठगने के लिये अपनी बुद्धि को प्रयोग मे लाने लगता है कोई न्याय से ठगने के लिये अपने कानूनो का सहारा लेने लगता है कोई अपने पूर्वजो से ही ठगा जाता है कोई कार्य करने के मामले मे ही ठग लिया जाता है कोई अपने मित्रो से ही ठगा जाता है कोई यात्रा आदि मे आते जाते ही किसी न किसी प्रकार से ठग लिया जाता है।

सम्बन्धो मे ठगी
ठगने के लिये राहु का प्रभाव सबसे पहले माना जाता है बिना राहु के कोई भी ठगा नही जा सकता है बाकी के ग्रह भी राहु के सामने अन्धे हो जाते है और राहु अपना कार्य करने के बाद निकल जाता है। जीवन मे रोजाना राहु काल का एक समय होता है इस राहु काल मे लोग इसीलिये कोई लेन देन साझेदारी व्यापार आदि की भूमिका यात्रा तथा उपरोक्त कारणो मे नही जाते है जो भी उन्हे करना होता है वह अलावा समय मे अपने कार्यों को कर लेते है लेकिन राहु काल मे किसी भी महत्व पूर्ण कार्य को नही किया जाता है। राहु व्यक्ति के जिस भाव मे गोचर कर रहा होता है उसी भाव के अनुसार अपनी ठगी को करने के लिये अपनी शक्ति को देता है। अगर वह लगन मे है तो शरीर वाले कारको को ही ठगने मे अपनी योजना को बनाकर ठगेगा,लेकिन यह बात भी जानने के लिये जरूरी है कि ठगने के लिये केवल वही व्यक्ति अपनी योजना को बनायेगा जो खुद भी राहु से ग्रसित हो। यह बात जानने के लिये अगर आप राहु वाले जानवरों को देखे तो आराम से समझ भी सकते है और देख भी सकते है कि कैसे राहु राहु को ही ठगने मे विश्वास करता है। जीवो मे बिल्ली को भी राहु माना गया है और चूहे को भी राहु की श्रेणी मे माना गया है। बिल्ली के पास ताकत और घात लगाने की योजना का ज्ञान होता है जबकि चूहे को बिल्ली से बचने के लिये भागने और छुपने का ज्ञान होता है दोनो मे जिसके ज्ञान की कसौटी खरी उतरती है वही अपनी घात मे सफ़ल हो जाता है या बच जाता है। इसी प्रकार से जब दो व्यक्तियों के लिये देखा जाये तो राहु किसी व्यक्ति के लिये पहले तो एक प्रकार का प्रसिद्धि का कारण पैदा करता है फ़िर लोग उस प्रसिद्धि को सुनकर देखकर या अपने ही लोगो के विश्वास मे आकर उसके पास जाते है,अगर राहु सुने गये व्यक्ति का बलवान है तो जो उस व्यक्ति के प्रति सुनकर गया है वह ठगा जाता है और किसी प्रकार से जो व्यक्ति सुन कर गया है उसका राहु बलवान है तो वह सुने गये व्यक्ति की चालाकी या जो भी क्रिया उसके द्वारा की जाती है को समझकर अपने को ठगने से बचा लेता है।राहु गोचर जब लगन से शुरु होता है तो जो व्यक्ति लगन यानी शरीर से अपनी शक्ति और प्रदर्शन के मामले से अपनी औकात को दिखाने की हिम्मत रखते है और दुनिया को अपने शरीर के शौर्य से अचम्भित कर देते है वही लोग जब किसी प्रकार के शरीर की शक्ति से दिक्कत मे आते है तो वह किसी अन्य व्यक्ति से भी अपने शरीर से ही ठगे जाते है।

क्रिकेट मैच मे चीटिंग
ठगना यानी घात लगाकर अपने कार्य को पूरा कर लेना,यही बात मौका देखकर अपने कार्य को पूरा कर लेना प्रतिस्पर्धा मे आकर अपनी योजना को पूरी करने के लिये अलावा बुद्धि का प्रयोग करना,रोजाना की जिन्दगी मे उन्ही कार्यों को करना जो अन्य लोगो की समझ से बाहर की बात हो,काम कुछ करना और लोगो को दिखाना कुछ,जाना कही और बताना कहीं के लिये आदि बाते भी इसी ठगने की श्रेणी मे आजाती है। माता पिता अपने पुत्र को वही बात सिखाना चाहते है कि उनका पुत्र आगे के लोगो से कुछ अलग से अपनी औकात को प्रस्तुत करे,और वह सभी लोगो को पीछे छोड कर आगे निकल जाये इसके लिये ही लोग अपने को अलावा कार्यों को करते हुये देखे जाते है जो लोग अपनी विद्या मे निपुणता को लाना चाहते है वह एक ही बिन्दु पर अपने को बेलेन्स करने के बाद लेकर चलते है और अलावा लोगो से आगे निकल जाते है जबकि दूसरा व्यक्ति किसी प्रकार से एक बिन्दु की नही सोच कर कई कारणो को एक साथ लेकर चलता है और जो बिन्दु उसके सामने है उससे भटक जाता है यानी पीछे रह जाता है। व्यक्ति जब नौकरी या व्यवसाय मे आगे निकलना चाहता है तो उसे अपने प्रतिद्वन्दी से ही खतरा होता है या तो वह अपने उद्देश्य मे सफ़ल होने के लिये कुछ ऐसा करे जो अन्य नही कर पाये या वह अपने व्यवसाय को कुछ इस सम्मोहन से करे कि बाकी के नही कर पाये यही बात अक्सर लोगो के पास प्राइवेट या व्यक्तिगत कारणो से घिरी होती है जो लोग नही बताना चाहते है और अपने कार्यों को उसी पद्धति से करते जाते है जैसे ही उनके कार्यों की पोल खुलती है वे अक्समात ही ऊपर जाते हुये नीचे आजाते है। यह बात भी ठगी की तरह से ही देखी जाती है और जब तक उनकी माया को कोई समझता नही है तब तक वह आगे निकलते जाते है जैसे ही उनकी माया सभी के सामने आती है वह अपने खेल से नीचे आने लगता है। कोई समय का फ़ेर देकर कोई ऋतु का फ़ेर देकर कोई देश का फ़ेर देकर कोई जलवायु का फ़िर देकर कोई जानकारी और जानपहिचान का फ़ेर देकर अपने को आगे निकालने के लिये प्रयास करने मे लगा हुआ है जैसे ही उसकी बारी आती है और उसने अपने प्रदर्शन को पूरा किया है तो वह अपने को आगे निकाल ले जाता है।

व्यवसाय मे ठगी
व्यवसाय मे ठगने के भी बहुत से तरीके लोग प्रयोग मे लाते है,एक ही उत्पादन को कई प्रकार के सम्मोहन मे लेजाकर उसे सौ गुनी कीमत पर बेचने का कारण शिक्षा या समझदारी नही कही जा सकती है केवल ठगी का जाल ही कहा जा सकता है। जो वस्तु रोजाना की जिन्दगी मे जरूरी है उसे समय पर नही देने के बाद उसे मुंहमांगी कीमत पर बेचना,तब तक उसे स्टोर करके रखना जबतक कि उसकी कीमत कई गुनी आगे नही बढ जाये यह भी एक कारण ठगी का जाना जाता है। व्यापारिक कला को जानने के लिये लोग अपनी अपनी बुद्धि का प्रयोग किया करते है लोगो की जेब से पैसा निकालने के लिये कई तरह के उपक्रम चलाया करते है यह व्यापार की नजर मे तो व्यापार है लेकिन दूसरी नजर से देखी जाये तो वह ठगी के अलावा कुछ नही है। ठगी का मुख्य कारण सम्मोहन ही होता है। बिना सम्मोहन के किसी को ठगा नही जा सकता है। सम्म्होन और बुद्धि जिसके पास होती है वह एक नम्बर का ठग माना जाता है। बुद्धि से अपने को पहले प्रचार के क्षेत्र मे उतारा जाता है प्रचार मे सम्मोहन को प्रस्तुत किया जाता है। जैसे एक खिलाडी अपने को पहले प्रचार मे लाता है,वह अपने दाव पेच सभी बाते प्रचार मे प्रस्तुत करता है जो लोग इस क्षेत्र से जुडे होते है वह उसकी बुद्धि की सराहना करते है,वह सराहना करने के बाद लगातार अपने को सम्मोहन मे लेकर लोगो के लिये खेलना शुरु कर देता है उसकी कीमत अन्य खिलाडिओं से आगे बढती जाती है।जैसे जैसे उसका सम्मोहन बढता जाता है वह अपने को आगे बढाता जाता है। यह राहु के मजबूत रहने तक ही माना जाता है जैसे ही राहु कमजोर होता है या राहु विपरीत भावो मे जाता है उस व्यक्ति की सम्मोहन की शक्ति कम होती जाती है और जैसे ही सम्मोहन की शक्ति कमजोर होती है वह नीचे आजाता है। करतब दिखाना और बुद्धि को प्रयोग करना भी एक प्रकार से मदारी की तरह से ही होता है,जैसे करतब दिखाने के लिये लोग अपने को लोगो के सामने ले जाते है और जैसे ही करतब दिखाकर वह लोगो के सामने प्रस्तुत होता है लोग उसकी वाहवाही करने लगते है,यह भी राहु के द्वारा ही होता है जैसे एक मदारी अपने हाथ को हिलाकर कुछ कह रहा है लेकिन वह अपने कार्य को दूसरे प्रकार से कर रहा है तो जो लोग उसके हाव भाव को देख रहे है वे उसके कार्यों की तरफ़ नही उसकी बोली पर चल रहे होते है,लेकिन जब बोली के बाद उसके कार्य का फ़ल सामने आता है तो मदारी अपने करतब से सबको सम्मोहित कर लेता है।

जिसे लोग हुनर के नाम से जानते है कला के नाम से जानते है शिक्षा के नाम से जानते है यह केवल बुद्धि को विकसित करने के नाम से जाना जाता है। एक ही क्षेत्र मे बुद्धि को विकसित करने के बाद कोई भी अपनी कला को प्रदर्शित कर सकता है,अपने हुनर को दिखा सकता है। जो लोग उस हुनर को नही जानते है जो लोग कला मे नही गये होते है उन्हे उस कला और हुनर को देखकर अचम्भित होना लाजिमी है। हर आदमी हर काम को नही कर सकता है जिसे जितना ज्ञान होता है उतना ही कथन वह कर सकता है। जिस आदमी ने कभी हुनर वाले काम सीखे ही नही हो या वह आदमी एक प्रकार की विद्या से कालचक्र या अपनी विशेष परिस्थिति से नही गुजरा हो वह उस हुनर या कला मे अपनी स्थिति को मजबूत करके नही दिखा सकता है। जो दिखा नही सकता है वही तुलना करने के लिये जाना जा सकता है जैसे अमुक हीरो या हीरोइन ने कला का अच्छा प्रदर्शन किया है अमुक के अन्दर कला का ज्ञान नही है,अथवा अमुक खिलाडी ने अपने करतब खूब दिखाये है लेकिन अमुक ने नही दिखाये है। बुद्धि का एक ही क्षेत्र मे विकास की तरफ़ ले जाना उसी क्षेत्र मे अपने सफ़लता को दिखाने के लिये जाना जाता है। भौतिक सिद्धान्त हमेशा एक ही नजर से देखे जाते है लेकिन उन सिद्धान्तो को बहुत ही गूढ रूप से देखे जाने पर वे अलग अलग रास्ते से अलग अलग प्रभाव प्रस्तुत करने के लिये भी अपनी औकात को रखते है। पृथ्वी सूर्य के चारो तरफ़ घूमती है,अगर समान गति और समान परिक्रमा मे होती तो सभी लोग समान होते सभी वस्तुयें भी समान होती लेकिन पृथ्वी की परिक्रमा के मार्ग मे फ़ेर बदल है,वह कभी तो सूर्य के निकट होती है तो कभी सूर्य से दूर होती है,इसके अलावा भी पृथ्वी अपनी ही धुरी पर भी घूम रही है इस घूमने की क्रिया मे भी अलग अलग बदलाव होते जितने बदलाव होते है उतनी ही गतिया बदल जाती है सोच बदल जाती है,इसके अलावा भी जब मन की स्थिति किसी भी पल एक जैसी नही होती है तो लोगो की सोच भी एक जैसी नही हो सकती है,जब सोच एक जैसी नही होगी तो बात भी एक जैसी नही होगी एक अमीर बनता है और एक गरीब बनता है यह तो कालचक्र का क्रम है एक स्वस्थ है एक अस्वस्थ है यह भी काल चक्र का नियम है,एक ठगता है एक ठगा जाता है,यह भी कालचक्र का नियम है,एक मारता है एक मरता है यह भी कालचक्र का प्रभाव है। जब सभी कुछ कालचक्र के प्रभाव मे है तो मनुष्य अपनी बुद्धि को आगे पीछे क्यों रेडियो स्टेशन की तरह से ट्यून करने मे लगा रहता है,यह भी कालचक्र के प्रभाव के कारण होता है।

Monday, February 20, 2012

साकार बनाम निराकार अर्थात शिव-शक्ति

शव को छोटी इ की मात्रा लगाने के बाद शिव का रूप बनाता है और शव जो निराकार था वह शिव के साकार रूप में सामने आजाता है.प्रकृति का नियम है की खाली स्थान को भरने के लिए वह अपने स्वभाव से सभी कारणों को सामने करती है,वह हवा से मिट्टी आदि को खाली स्थान को भारती है,पानी से खाली स्थान को समतल बनाने के लिए मिट्टी आदि को भारती है,जब उसे समतल स्थान को एकाकार करने में शंका होती है तो वह सूर्य की गर्मी से अपनी शक्ति को प्रदान करने के बाद उस जमी हुयी मिट्टी आदि को कठोर बनाने के लिए पत्थर आदि के रूप में उपस्थित करती है,इस प्रकार से खाली स्थान जो शव स्वरुप था उसे एकाकार करने के लिए जल मिट्टी वायु अग्नि का प्रयोग करने के बाद एक नाम देती है वह नाम ही शक्ति के रूप में समझा जाने लगता है.शव नकारात्मक है और नकारात्मक में सकारात्मकता को पूर्ण करने के लिए शिव की मान्यता भी दी गयी है कोइ पौराणिक बात हो या कहानी हो यह अपनी अपनी बात तो बताने के लिए कोइ भी नाम दे कोइ भी स्थान का महत्व दे या कोइ भी धारणा को प्रदान करे लेकिन जो कारण है उसे कोइ भी सही रूप में तब तक नहीं समझ सकता है जब तक की उसे यह पता नहीं हो की आखिर में प्रकृति चाहती क्या है.


जीव क्रिया में है तब तक साकार है जैसे ही क्रिया विहीन हो जाता है निराकार है साकार में चार तत्व और जुड़ जाते है निराकार में एक ही तत्व होता है,वह द्रश्य भी हो सकता है और अद्रश्य भी हो सकता है.लोगो की भावना द्रश्य को अन्जवाने की होती है और अद्रश्य को समझाने की होती है,अद्रश्य को समझाने के लिए वह अपनी अलावा शक्तियों को प्रयोग में लाता है,वह अग्नि को प्रयोग करने के लिए हवन यग्य का प्रयोग करता है और उससे मिलने वाले फलो में साकार रूप देखता है वह अग्नि में जले हुए पृथ्वी तत्वों को सूक्ष्म रूप में वायुमंडल में फैलाने की क्रिया को करता है,जव वह तत्व कार्बन रूप में फ़ैलाने लगते है और एक स्थान पर इकट्ठे हो जाते है और प्रकृति की चल क्रिया के द्वारा उनका रूप गोलाकार अथवा पिंड के रूप में द्रश्य होने लगता है वही पिंड या गोलाकार पिंड का रूप कार्बन के रूप में विभिन्न तत्वों से पूर्ण होने के कारण शिव लिंग का रूप धारण कर लेता है,वह सूक्ष्म कणों के रूप में अरबो तत्वों के रूप में साकार तभी होता है जब वह अपने अनुसार सकारात्मक रूप को अद्रश्य रूप से उन्हें अपनी शक्ति देने लगता है जो देखने में तो सकारात्मक अथवा क्रिया रूप में मिलते है लेकिन उनके अन्दर खुद को साकार समझने में परेशानी होती है.


भावना से ही विश्व का निर्माण हुआ है,कोइ अपनी भावना को शरीर में देखने लगता है कोइ अपनी भावना को वाणी के रूप में प्रकट करने लगता है कोइ अपनी भावना को सोचने के बाद क्रिया में लाना शुरू कर देता है.जैसी भावना जो करता है उसी रूप में वह रूप को देखने लगता है,भेडिया की भावना में जब भूख होती है तो वह अपने से कमजोर जीव को भोजन के रूप में देखने लगता है उसी भावना के अनुसार वह उस जीव को मार कर खा जाता है,लेकिन जब उसी स्थान पर उसे दूसरा भेडिया अपने को मारने के लिए ताकतवर के रूप में दिखाई देने लगता है तो वह या तो भाग जाता है या दूसरे शक्तिशाली भेडिये के द्वारा मार दिया जाता है,मादा रूप में अपनी भावना से देखे जाने पर वह सम्भोग की इच्छा को करता है और मादा के साथ सहसवास करने के बाद अपनी संख्या की उत्पत्ति को बढ़ाकर एनी भेडियों का निर्माण भी करता है.जब तक भावना उसके अन्तः करण में मौजूद होती है वह अपने को क्रिया में लगाए रहता है जैसे ही भावना का अंत होता है वह या तो बीमार होकर मर जाता है या अन्य जीवो के द्वारा मार दिया जाता है.


पशु और मनुष्य में भेद केवल बुद्धि का है वह बुद्धि के अनुसार अपनी भावना को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है लेकिन पशु के अन्दर बुद्धि केवल अपने शरीर के पालन के लिए ही मानी जाती है जबकि मनुष्य की बुद्धि से अपने शरीर के साथ साथ अपने विश्व बंधुत्व के रूप में मनुष्य जगत को आगे बढाने की क्रिया को देखा जाता है.शिव साकार होता है तो वह मनुष्य की भावना को वृहद रूप में आगे बढाने की क्रिया में शामिल हो जाता है शिव जब निराकार होता है और उस निराकार में जब शिव की भावना उत्तेजित हो जाती है तो वह अपनी तीसरी आँख के प्रयोग से सामने की भावना को जलाकर भी समाप्त कर सकता है.बुरी भावना को जलाना और समाप्त करना वह तीसरी आँख से ही सम्बन्ध रखती है और वही तीसरी आँख बुद्धि से सोच कर क्रिया में लाने वाली बात की पूरक है,कोइ माथे में तीसरी आँख खुलती नहीं देखी जाती है लेकिन जो सोचा जाता है उस सोच के अन्दर क्या अच्छा है क्या बुरा है इस बात का निराकरण कर लिया जाता है तो बेकार की सोच को समाप्त करने के लिए उसी तीसरी आँख का प्रयोग किया जाता है,जैसे जब बहुत ही बड़े विचारों की श्रंखला चल रही हो और उस समय अगर विचारो को तोड़ा जाए तो झल्लाहट आती है उस झल्लाहट में अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है.


आज कमन्यूकेशन का ज़माना है जो भी कमन्यूकेशन को पहिचानता है वह अपनी भावना को प्रकट करने के लिए किसी भी समय अपने को किसी के भी सामने प्रस्तुत करने लगता है,जरूरी नहीं है की सामने वाला भी अपने को कमन्यूकेशन के लिए तैयार करके ही बैठा हो,वह भावना के अनुसार फोन की घंटी बजने के साथ ही अक्समात ही भावना को ज़िंदा करने लगता है.अगर भावना जागृत हो जाती है तो बात कर ली जाती है और भावना जागृत होने में कोइ कठिनाई होती है तो कोइ न कोइ कारण बनाकर फोन को काट दिया जाता है.खुद निर्णय लेना और प्रकृति के द्वारा निर्णय लेना दोनों अलग अलग बाते है,खुद की भावना भी बात करने की है और जो बात करना चाहता है उसकी भी भावना बात करने की बन रही है लेकिन प्रकृति नहीं चाहती है तो जब बात करने की भावना से फोन को लगाया जाएगा तो कोइ न कोइ परेशानी फोन खराब होने की लाइन नहीं मिलाने की या सामने वाले फोन में कोइ दिक्कत आने की बात भी मिल सकती है,इस प्रकार से भावना को उजागर करने के लिए प्रकृति की भी सहायता की जरूरत होती है.जब हम अपने अनुसार भावना को जागृत नहीं कर पाते है तो हम प्रकृति के ऊपर अपनी भावना को प्रकट करने के लिए अपने को ले जाते है वही प्रकृति शिव रूप में शिवालय में भी हो सकती है गिरजाघर में ईसा के रूप में भी हो सकती है मस्जिद में अल्लाह के रूप में भी हो सकती है आश्रम में गुरु के रूप में भी हो सकती है,गुरुद्वारा में गुरु ग्रन्थ साहब के रूप में भी हो सकती है.नाम कुछ भी हो वह भावना ही भगवान का रूप बनाती है.


पुराने जमाने में आज के जैसे साधन नहीं होते थे तो अपनी भावना को द्रश्य रूप में प्रेषित किया जाता था उस समय बिजली बैटरी से चलने वाले साधन नहीं हुआ करते थे और न ही आज की तरह से सिलीकोन वाले उपकरण बनाकर मोबाइल आदि का रूप देकर भावना को भेजा जा सकता था,उस समय एक उपाय बहुत ही काम में लिया जाता था जिसे बहुत ही कम लोग जानते होंगे की अपनी भावना को अद्रश्य रूप में किसी के पास भेजने के लिए काले धतूरे के रस में गोरोचन को मिलाकर सफ़ेद कनेर की ताजा कलम से जिसमे कनेर का दूध निकल रहा हो से अपनी भावना को भोजपत्र पर लिखा जाता था और उस भोजपत्र को मंद अग्नि पर तपाया जाता था,तपाने का एक समय हुआ करता था उस तपाने की क्रिया के अन्दर उस भावना को और उस व्यक्ति का ध्यान लगातार किया जाता था,यह क्रम कई दिन भी करना पड़ सकता था,परिणाम में जिस भावना का जिस व्यक्ति से जोड़ना होता था वह भावना उस व्यक्ति के अन्दर प्रकट होने लगती थी,जो कार्य करवाना होता था वह कार्य जब हो जाता था तो जिस व्यति से जो भावना जोड़ी जाती थी और अगर वह भावना उस व्यक्ति की भावना से पिपरीत होती थी तो वह व्यक्ति बाद में सोचता था की उस भावना को वह कतई नहीं चाहता था लेकिन उससे वह भावना पूर्ण कैसे हो गयी,जैसे कोइ सरकारी आदेश किसी से लेना था और सरकारी आदेश को वह सरकारी व्यक्ति नहीं देना चाहता था लेकिन वह उस आदेश को देने के बाद सोचता था की वह आदेश उसके द्वारा नहीं दिया जाना था लेकिन उसने दे कैसे दिया.जो होना था वह तो हो ही गया था इसलिए भावना को प्रकट करने के लिए कई प्रकार के अन्य उदाहरण भी देखने को मिलते है.


द्रश्य रूप में काले पर सफ़ेद रंग बहुत जल्दी दिखाई देता है,शिव लिंग काला होता है और शिव लिंग पर जो शिव नेत्र आदि की कलातमक त्रिपुंड नामक तिलक लगाया जाता है वह सफ़ेद चन्दन या केले की भस्म से लगाया जाता है,उस तिलक को लगाने के समय एक भावना मन के अन्दर लाई जाती थी की तिलक ईश्वर को लगाया गया है तिलक महेश्वर को लगाया गया है तिलक के लगाने के बाद भावना से जो भी तिलक को देखेगा वह शिव की जय जय करने लगेगा,इस भावना से शिव की जय जय कार में वह खुद के अन्दर भी जय जयकार का उद्घोष सुनता था,यही जय जयकार उसके लिए वरदान बन जाती थी और उसकी भी जय जयकार होने लगती थी.शिव साकार है,शव निराकार है,भावना रूपी प्राण है तो भावना क्रिया में है वही साकार होने का प्रमाण है.(नमः शिवाय ॐ)

Sunday, February 19, 2012

जीवन का मूल्य

जीवन के दो रूप सामने आते है,एक व्यवहारिक रूप में और एक पहिचान के रूप में.व्यवहार कीमत से परखा जाता है और पहिचान संबंधो की रूप रेखा होती है.कुण्डली के पहले भाव से छठे भाव तक सम्बन्ध होते है और सप्तम से बारहवे भाव तक व्यवहार होते है.लगनेश पहले से छठे तक होता है तो वह संबंधो की पहिचान को रखता है और सप्तम से बारहवे भाव तक वह केवल व्यवहारिक होता है.इसी प्रकार से जब सप्तमेश सप्तम से बारहवे भाव तक होते है तो अपनी सीमा तक व्यवहार में रहते है और जब लगन से छठे भाव तक होते है तो संबंधो में व्यवहारिकता का मिश्रण कर देते है.जब लगनेश अपनी सीमा में यानी एक से छः तक तथा सप्तमेश सात से बारह तक होता है तो व्यक्ति सीमाओं में बंधना पसंद करता है और तरक्की के मामले में एक पक्ष को ही उजागर करने में अपना विशवास रखता है,जैसे ही सप्तमेश और लगनेश एक दूसरे के दायरे में चले जाते है व्यक्ति अपनी पहिचान को बढाने में आगे जाने लगता है,और वह अगर व्यवहार के क्षेत्र में है तो संबंधो को शामिल करता रहता है और वह अगर संबंधो के क्षेत्र में है तो व्यवहार को शामिल करने लगता है.
अक्सर छोटे सिक्को में एक रूप आपने देखा होगा की एक तरफ पहिचान होती है और दूसरी तरफ कीमत होती है यानी सम्बन्ध के रूप में सिक्के की पहिचान होती है की वह किस देश का है कितनी सीमा तक चल सकता है उसका कैसा रूप है वह कहाँ रखा जा सकता है उसकी गणना कैसे की जायेगी वह बचत करने के बाद कहाँ रखा जाएगा,लेकिन जैसे ही वह व्यवहार के रूप में आयेगा उसका दूसरा पहलू अपनी रूप रेखा को उजागर कर देगा की उस सिक्के का मूल्य कितना है वह खरा है या खोता है उसका क्षेत्र किस सीमा तक है वह किस कार्य के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है उसे प्रयोग में लाने पर वह लाभ देगा या हानि देगा तथा उसे प्रयोग करने के बाद शारीरिक या मानसिक कितनी शान्ति मिलेगी.
अक्सर सम्बन्ध और व्यवहार की गणना करने वाले सिक्को की कीमत कम ही होती है लेकिन जो मुद्रा बहुमूल्य हो जाती है उसके अन्दर एक ही तरफ सम्बन्ध और व्यवहार का रूप देखा जा सकता है यानी उस सिक्के की पहिचान भी और उसका मूल्य भी सिक्के के एक तरफ ही प्रदर्शित होगा.चाहे वह कितनी बड़ी रूप रेखा का हो उसकी जो भी पहिचान होगी वह एक प्रकार से सामने ही प्रदर्शित हो जायेगी.लेकिन एक बात का ख्याल और रखकर इन कारणों को सोचना पडेगा की कोइ भी व्यक्ति अपने सम्बन्ध को पहले प्रदर्शित करने की कोशिश करता है और बाद में व्यवहार को सामने लाता है तो वह एक खरे सिक्के के रूप में देखा जाता है और जिस व्यक्ति के अन्दर पहले व्यवहार यानी उसकी कीमत आगे राखी जाती है और बाद में पहिचान को प्रदर्शित किया जाता है उसकी स्वार्थ वाली भावना को समझा जा सकता है यानी वह व्यक्ति तब तक संबंधो को रखेगा जब तक उसकी स्वार्थ वाली नीति पूरी नहीं हो जाती है जैसे ही स्वार्थ का रूप ख़त्म हो जाएगा वह संबंधो को समाप्त कर देगा.
 इस प्रकार का रूप अक्सर भारत से बाहर के लोगो के अन्दर देखी जा सकती है उन्हें मूल्य से मतलब होता है सम्बन्ध से कोइ मतलब नहीं होता है तथा राजनीति के क्षेत्र में अपना नाम रखने वाले लोग भी अपने व्यवहार को केवल कीमत तक ही सीमित रखते है जैसे ही व्यवहार समाप्त हो जाता है उनकी कीमत भी समाप्त हो जाती है और वे फिर किसी भी पहलू से नहीं देखे जा सकते हैयही बात किसी भी क्षेत्र में सामान्य रूप से देखी जा सकती है जब कुंडली को देखते है तो इस बात का बहुत ही ख्याल रखना पड़ता है की जो भी भाव का प्रधान ग्रह है वह अगर भाव से छठे भाव तक है तो उसका कथन केवल भाव के प्रति ही श्रद्धा को बखान करता रहेगा जैसे ही वह भाव से सप्तम की तरफ अपना रुख ले लेगा वह भाव की श्रद्धा को समाप्त करने के बाद मूल्य के क्षेत्र में प्रवेश कर जाएगा.मान लीजिये की दूसरे भाव का स्वामी अष्टम में विराजमान है तो धन का क्षेत्र मूल्य में प्रवेश कर जाता है और मूल्य की सीमा सम्बन्ध से दूर हो जाती है यानी धन का रूप रिस्क में चला जाता है वह आ भी सकता है और हमेशा के लिए समाप्त भी हो सकता है उसी प्रकार से अगर अष्टम का स्वामी दूसरे भाव में आकर विराजमान हो गया है तो मूल्य की सीमा का अतिक्रमण हो जाने के कारण जो सीमा थी वह समाप्त हो चुकी है वह या तो एंटिक रूप में करोडो की कीमत रख सकता है या राख की कीमत का भी हो सकता है.उसी प्रकार से जब तीसरे भाव का स्वामी जब तक अष्टम में है तब तक वह अपनी पहिचान को मर्यादा में ही रखेगा जैसे ही वह नवे भाव में प्रवेश करता है उसकी मर्यादा व्यवहार में जुड़ जायेगी यानी वह अपने रूप और पहिचान को बदल सकता है.यह पहिचान और रूप दोनों ही व्यावहारिक हो जायेंगे अक्सर इस बात को उन लोगो के अन्दर देखा जा सकता है जो पैदा भारत में होकर विदेश में जाकर रहने लगे है वहां के कल्चर के हिसाब से अपने पहिनावे को बदल लेते है और उस बदलाव का रूप व्यवहारिक हो जाता है इस प्रकार से जो पहिनावे की सीमा थी वह समाप्त हो गयी..

Saturday, February 18, 2012

धन कमाने के कितने ही तरीके होते है ?

    धन कमाने के कितने ही तरीके होते है,कोई तन से धन कमाता है,और कोई मन से धन कमाता है,कोई धन से ही धन कमाता है,तन से धन कमाने वाले अपना पसीना बहाकर धन को कमाते है,उनके पास तरह तरह की कलाकारियां और मेहनत करने वाले तरीके होते है,कोई अपने तन को नचाता है,कोई अपने तन को खूबशूरत बनाकर दिखाता है,कोई अपनी ताकत को अपनाकर धन कमाता है,और कोई अपने बाहुबल से धन के लिये बाजार में कूदता है,कोई अपने तन को खतरे में डालकर वाह वाही के साथ धन कमाता है,कोई धन के लिये अपने शरीर को डकैत का रूप देकर जबरदस्ती धन को लूटता है,इसी प्रकार से मन से धन कमाने वाले अपने मन के अन्दर नई नई स्कीमे बनाते है,लोगों को देते है और धन कमाते है मन से ही कविता बनती है,मन से ही प्लान बनते है,और मन से ही कितने ही प्रकार के आपाधापी वाले काम किये जाते है,धन से धन कमाने के लिये कोई जुआ खेलता है,कोई बैंक की स्कीमों के अन्दर अपने धन को लगाता है,और ब्याज से धन को कमाता है,कोई सट्टा का बाजार लगाकर अपना धन कमाता है,कोई शेयर बाजार में अपना धन लगाकर धन को कमाता है,अधिकतर एक नम्बर का जुआ बाजार शेयर बाजार है,और बाकी में सट्टा लाटरी जुआ आदि दो नम्बर के बाजार बन जाते है,शेयर बाजार को लोग अपनी अपनी स्कीमे बनाकर चलाते है,कोई सपोर्ट लेबल से काम करता है,कोई रजिस्टेंस लेबल से काम करता है,और कोई धन को अधिक करने के चक्कर में केलकुलेसन को अपना कर शेयर बाजार को चलाता है,फ़ायदा केवल एक ही व्यक्ति को मिलता है,वह व्यक्ति होता है,दलाल यानी ब्रोकर,मरो या जिन्दा रहो,उसका कमीशन तो पक्का था,पक्का है और पक्का रहेगा,साथ ही सभी तो दलाल बन नही जाते,कितनी ही कुबानियां देने के बाद दलाल बना जाता है,जैसे ओन लाइन मनी ट्रांसफ़र के लिये् बैंक के एकाउन्ट,दलाली करने के लिये लाइसेंस,और न जाने क्या क्या।
    कहावत है कि "पहली जीत,मंगावे भीख",अधिकतर मामलों में गये धन को रीकवर करने के लिये और अधिक धन गंवाया जाता है,"जो जीता सो सिकन्दर",वाह वाही के चक्कर में और दूसरों की देखा देखी,जनता की भेड चाल अपने को बरबाद करने के लिये काफ़ी है,एक जानकार है,उनका एक ही उद्देश्य है कि वे लीक से हट कर देखते है,और उनका धन का तीर हमेशा ही निशाने पर लगता है,जब भी बाजार में मंदी का दौर गुजरता है,वे सबसे कम कीमत के शेयर को उठा लेते है,वे किसी भी शेयर को सत्ताइस दिन के पहले नही बेचते,उनसे पूंछने पर कि छब्बिसवें दिन की कीमत की अपेक्षा उनके द्वारा बेचा जाने वाला शेयर दो रुपय कम कीमत में गया है,तो उनका कहना कि धन तो संसार में भरा पडा है,तकदीर और तदवीर में कहीं तो फ़र्क होगा ही,अगर नही होता,तो लोग तकदीर नामका शब्द ही डिक्सनरी से हटाकर फ़ेंक देते,हम से भी दिमाग वाले पहले पैदा हो चुके है,और हम से अधिक जटिल परिस्थितियों के अन्दर रहकर उन्होने काम किया है,हम तो भी सौभाग्यशाली है,कि हर काम को किसी के द्वारा बनाये गये पैमाने के अनुसार करना पड रहा है,अगर उस पैमाने को नही बनाया गया होता,तो जंहा पर हम आज बिना किसी मुशीबत के चढे चले जाते वह मुश्किल ही था।
    अर्थशास्त्र की एक परिभाषा ह्रासमान तुष्टिगुण नियम के अनुसार कभी भी और कहीं भी खरी उतरती रही है,और आगे ही उतरती रहेगी,कि वस्तु कम तो कीमत अधिक और कीमत कम तो वस्तु अधिक,समय पर फ़सल की तरह से सभी वस्तुओं के उतार चढाव को देखा जाता है,समय को देखकर एक कूंजडा भी अपनी सब्जी का भाव प्राप्त कर लेता है,और समय को न समझ पाने की स्थिति में एक धन्नासेठ भी कंगाल होकर और अंगोछा पहिन कर बाजार से पलायन कर जाता है,तुलसीदास को कोई नही मानता हो,लेकिन उनकी रामचरित की चौपाइयां हर प्रकार से हर जगह पर चरितार्थ होती देखी गयी है,उन्होने एक चौपाई में लिखा है,"धर्म से बिरति,बिरति से ग्याना। ग्यान मोक्षप्रद वेद बखना॥",और आगे लिखा है कि,"तामस जग्य करहिं नर,भक्ष्य अभक्षय खाहिं",फ़िर उसका फ़ल भी लिखा है,"कालहि कर्महिं ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाहिं",सारांश में कहा जा सकता है कि धर्म का मतलब मन्दिर में माथा टेकने से कम और ध्यान करने से अधिक लिया जाता है,अगर व्यक्ति कुछ समय तक अपने दिमाग को शांति की स्थिति में रखकर अपने बिरति यानी कार्य के प्रति सोचता है,तो उसका कार्य जो वह करने जा रहा होता है,उसके प्रति ज्ञान मिलता है,और जैसे ही ज्ञान प्राप्त होता है,और उस ज्ञान को वह किसी भी कार्य क्षेत्र में प्रयोग करता है,उसे सफ़लता मिलती है,यही सफ़लता नाम ही मोक्ष का अर्थ है। 
    धर्म काम अर्थ और मोक्ष का चक्र हर व्यक्ति की जिन्दगी में चला करता है,लेकिन जो भी व्यक्ति इस चक्र को जानता है,उसका नाम सामने होता है,लोग उसे इतिहास पुरुष मानने लगते है,लेकिन जो शरीर,दिमाग,शक्ति,सामने वाले के पास है वह हर किसी के पास है,अगर धर्म यानी ध्यान से उसे जगाना आता हो,वरना तो हर कोई खाना,पीना हगना, मूतना सोना बच्चे पैदा करना जानता है,बाकी का नब्बे प्रतिशत तो जगाया ही नही गया,मानव शरीर के लिये जो पदार्थ बनाये गये है,उन्ही को खाना हितकर होता है,अन्यथा बिनाखाने वाली वस्तुओं को अभक्षय माना जाता है,जैसे शराब कबाब भूत का भोजन आदि,इनके खाने पीने के बाद दिमाग में तामस जगता है,और तामस के चलते,बाजार से कोई भी वस्तु उठाने का ब्लात प्रयोग किया जाता है,परिणाम स्वरूप जब भयंकर हानि होती है,तो दोष दिया जाता है कि समय खराब था,ईश्वर को मंजूर था,कर्म के अन्दर कोई खोट आ गयी थी,आदि आक्षेप अन्यत्र के सिर मढ कर व्यक्ति बचना चाहता है।ध्यान से कार्य,कार्य से अर्थ,और अर्थ से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है,लेकिन तीन बातों को मनन करने के बाद।
    तीन बातों को मनन करने के लिये किसी फ़ारसी को नही पढना पडता है,केवल तीन बातों को समझने के लिये आपको तीन दिन पीछे जाना पडता है,एक कापी उठाइये,और तीन दिन पहले आपने क्या छोटे से छोटा और बडे से बडा कार्य किया है,उसका परिणाम क्या आपकी समझ में आया,उस परिणाम में और आज के परिणाम में क्या अन्तर है,अगर आपको अन्तर समझ में आता है,तो आप जाग रहे है,और समझ में नही आता है,तो आप सुषुप्त अवस्था में है,और अगर आपकी दूसरी अवस्था है,तो आप हर्गिज किसी योजना को पारित करने की कोशिश मत करिये,और आप अगर आप पहली अवस्था में हैं, तो आपको कल जो बीत गया है,उसके बारे में लिख डालिये,और फ़िर आज अभी तक गुजरे समय में आपने जो भी किया है,उसके बारे में भी जान लीजिये सभी तरीके से आप धनात्मक है,तो योजना को पारित करने में देर मत लगाइये,क्योंकि सफ़लता आपके पास खडी है,यही तीन बातें ध्यान करने की है,और यही तीन बातें आपको तीन दिन के जाग्रत,सुषुप्त और अर्धजाग्रत का परिणाम दे सकती हैं।
शेयर बाजार में कमाने के लिये आप को ध्यान करने की अधिक जरूरत है,और जो विधि कमाने की है,उससे आगे पीछे मत जाइये,ध्याता करेगा ध्यान,तो बनेगा धनी,चाहे वह ज्ञान में हो या धन में। अधिकतर लोग खर्च करने की क्रिया को नही जानते है,धन को खर्च करने का तरीका हो या ज्ञान को खर्च करने का,पानी अधिक बरसता है,तो उसे तालाब में इकट्ठा किया जाता है,फ़िर बरसात के मौसम के जाने का इंतजार करना पडता है,बरसात के बाद ठंडी का मौसम आता है,पानी जो इकट्ठा किया गया है,ठंड के कारण बहुत बुरा लगता है,अगर उस पानी को संभाल कर रख लिया जाये और गर्मी के मौसम में प्रयोग किया जाये,तो आथगुना मजा देता है,यही विधि धन के मामले में मानी जाती है,अगर जल्दी से आगया है,तो उसे बरसात का मौसम समझ कर इकट्ठा कर दीजिये,जैसे बरसात के मौसम में पानी को कम पीने की आदत होती है,उसी प्रकार से कम खर्च करिये,फ़िर उसे बिलकुल मत प्रयोग करिये,और समय आते ही उसे प्रयोग करना चालू कर दीजिये वही आपका बरसात के पानी रूपी धन का मजा आठ गुना मजा देने लगेगा।
रामेन्द्र सिंह भदौरिया (ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री)
जयपुर

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भाई की मृत्यु कैसे ?(दुर्घटना या मर्डर)

प्रस्तुत प्रश्न कुण्डली मेष लगन की है,गुरु लगन में है,केतु दूसरे भाव में मंगल वक्री पंचम भाव में शनि वक्री सप्तम भाव में राहू अष्टम में चन्द्रमा नवे भाव में सूर्य ग्यारहवे भाव में बुध ग्यारहवे भाव में है.प्रश्न का कारक पंचांग के अनुसार शनि को माना जाएगा,कारण गुरु का नक्षत्र अश्विनी है और इस नक्षत्र का मालिक केतु है,नक्षत्र का पाया शनि का है,दूसरे भाव में केतु है केतु रोहणी नक्षत्र में है इस नक्षत्र का पाया भी शनि का है शनि वक्री होकर सप्तम में विराजमान है,जिस दिन प्रश्न किया गया है उस दिन का वार भी शनि का है,प्रश्न करता का आगमन भी रात को हुआ है इसलिए रात का समय भी शनि का है,शीत ऋतू है इसलिए यह ऋतू भी शनि की है,शनि के द्वारा चन्द्र सूर्य बुध गुरु द्रष्ट है इसलिए शनि की अधिक ग्रहों अपर नजर है,शनि ने गुरु को नजर देकर तथा गुरु ने पंचम मंगल को नजर दी है पंचम  मंगल वक्री है इसलिए अपनी नजर राहू को ही है,राहू ने मंगल के द्वारा शनि सूर्य बुध गुरु केतु की नजर लेकर अष्टम का फल प्रदान किया है.सबसे पहले प्रश्न कर्ता के बारे में जानना जरूरी है,प्रश्न कर्ता लगन है,प्रश्न जिससे किया जाता है वह सप्तम है प्रश्न का रूप प्रदर्शित करने के लिए प्रश्न कर्ता प्रश्न का जबाब देने वाले की योग्यता का परिचय लेना चाहता है की उसके मन में किस बात का प्रश्न चल रहा है.


कुंडली में शनि का स्थान वक्री होकर सप्तम में है,प्रश्न शनि से सम्बंधित है,शनि कार्य का भी मालिक है और शनि बड़े भाई का कारक होने के साथ साथ मित्रो का भी कारक है.शनि का स्थान मंगल और राहू के बीच में होने से तथा लगनेश मंत्रणा राज्य विद्या बीमारी का कारण मनोरंजन यात्रा के बाद मिलने वाली संतुष्टि में होने से राहू का मृत्यु के भाव में होने से और राहू का रूप लगनेश के मानसिक प्रभाव में मृत्यु संबंधी कारण को जानने के लिए तथा उस मौत संबंधी तथ्य को जानने के लिए अपनी शंका को बताना जाना जा सकता है.


शनि के अष्टम में केतु के होने से बड़े भाई या मित्र की मृत्यु से सम्बंधित प्रश्न है,शनि के सामने राहू के होने से शनि का रूप राख के रूप में माना जाता है,मृत्यु देने का कारक भी शनि से दूसरे भाव यानी मारक स्थान में होने के कारण राहू को ही माना जाता है,मृत्यु का कारण पैदा करने के बाद मृत्यु का रूप देने के लिए राहू केतु के रूप में मृत्यु को कारित करना माना जाता है.केतु मौत को देने का मालिक है.


राहू मौत देने के कारण को गुरु से और वक्री मंगल से प्राप्त करता है.वक्री मंगल को बल देने के लिए ग्यारहवे भाव का सूर्य और बुध बल दे रहा है,शनि वक्री सूर्य और बुध को राजनीति के क्षेत्र में बल देने के लिए माना जाता है और शनि वक्री का रूप एक प्रकार से वक्री मंगल से पहले अपने बड़े भाईके रूप में भी माना जाता था लेकिन किसी प्रकार की राजनीतिक सोच के चलते इस मंगल ने शनि को राहू के द्वारा बल देकर और फरेबी कारण पैदा करने के बाद पहले शनि को बाहर बुलाता है बुलाने का कारण केतु से जोड़ा गया है,बुलाकर कुछ खिलाने पिलाने में मिला कर दिमाग को बाधित करता है,कार्य और कार्य के बाद मिलाने वाले धन को प्राप्त करने तथा उसे राजनीतिक कारणों से दूर हटाने के लिए केतु के द्वारा पहले मारा जाता है,फिर एक्सीडेंट का रूप दिखाने के लिए किसी सामान ले जाने वाली गाडी से लगन से चौथे भाव के कारक चन्द्रमा को बुरी तरह से तहस नहस किया जाता है.

Friday, February 17, 2012

क्या होता है पांचांग ?

ज्योतिष का रूप सामने आता है तो पंचांग का रूप भी सामने आता है,एक किताब के रूप में या किसी साईट पर पंचांग को देख लिया जाता है जैसे आज क्या दिन है क्या तिथि है क्या नक्षत्र है कौन सा योग है कौन सा करण है आदि बाते देखकर किताब या साईट को बंद कर दिया जाता है.जो पंचांग का गूढ़ है शायद सौ लोगो में से एक को ही पता होगा,पंचांग के प्रति कितनी जानकारी और पंचांग का क्या महत्व है इस बात का जानना बेहद जरूरी है.
  • ज्योतिष में पांच बाते जानना बहुत जरूरी है,पहली बात तिथि को जानना,दूसरी बात वार को जानना तीसरी बात नक्षत्र को जानना चौथी बात करण को जानना पांचवी बात योग को जानना,इन पांच बातो को जान लेने के बाद किसी भी कुंडली की गति विधि और किसी भी व्यक्ति के शुरू किये गए काम को बनाना या बिगड़ना देखा जा सकता है.पंचांग में मुख्य कारक पांच तत्व है,वार अग्नि तत्व है,तिथि जल तत्व है,नक्षत्र वायु तत्व है,करण पृथ्वी तत्व है और योग आकाश तत्व है.इन पांचो तत्वों के कारको को ही मुख्य रूप से पंचाग में जोड़ा गया है और इन्ही की गति विधि को समझाने के लिए ही पंचांग का निर्माण किया जाता है.कुंडली को बनाकर वारेश यानी दिन के स्वामी किस पोजीसन में है से अग्नि तत्व का रूप समझा जा सकता है,किसी भी व्यक्ति कार्य और स्थान के लिए वारेश का जानना बहुत जरूरी होता है,अगर उदित कुंडली में वारेश त्रिक भाव में है या किसी शत्रु ग्रह के संरक्षण में है तो निश्चित ही उस दिन की गतिविधिया ठंडी रहेंगी.कारण हिम्मत और प्रयास के लिए अग्नि तत्व बहुत जरूरी है,जब तक कार्य या कारक के प्रति उत्तेजना नहीं होगी कार्य पूर्ण नहीं होगा.आग के भी दो रूप है एक सकारात्मक और एक नकारात्मक सकारात्मक आग को जलता हुआ और प्रकाश से युक्त देखा जाता है,जबकि नकारात्मक आग को सुलगता हुआ और अन्दर ही अन्दर दहकता हुआ देखा जा सकता है,लेकिन बिना सकारात्मक के नकारात्मक का रूप भी नहीं मिलता है,उसी प्रकार से जल तत्व भी दो प्रकार का होता है एक सकारात्मक और एक नकारात्मक बहता हुआ जल बरसता हुआ जल किसी स्थान पर भरा हुआ जल सकारात्मक रूप से माना जाता है लेकिन जो जल वाष्पीकरण होकर हवा में उपस्थित होता है जो जल मिट्टी लकड़ी आदि में छुपा होता है शरीर के अन्दर विद्यमान होता है वह नकारात्मक जल के रूप में माना जाता है ज्योतिष में द्रश्य और अद्रश्य रूप में भी जल की विवेचना की जाती है जैसे कुए के अन्दर का जल नकारात्मक जल और बारिस का पानी सकारात्मक जल के रूप में देखा जाता है उसी प्रकार से वायु तत्व और आकाश तत्वों के साथ पृथ्वी तत्व को भी जाना जा सकता है.
  • वारेश से अग्नि तत्व की पूर्णता और अपूर्णता को समझा जाता है.
  • नक्षत्र के मालिक से वायु तत्व को पूर्ण या अपूर्ण समझा जाना ठीक है.
  • करण के मालिक से भूमि तत्व की द्रश्य या अद्रश्य रूप को समझा जा सकता है.
  • योग के मालिक से आकाश तत्व की पूर्णता को और अपूर्णता को समझा जा सकता है.


Thursday, February 16, 2012

अंत गति सो मति

एक कहावत बहुत ही प्रसिद्द है जो आखिर में जो होना होता है वही बुद्धि बन जाती है.जातक का जन्म होता है उसकी बुद्धि के अनुसार उसका शरीर संसार बनने लगता है,लेकिन यह सब जीवन की आख़िरी सीढी पर जो कुछ जीवन में किया होता है उसके अनुसार प्रकट होने लगता है.जो शरीर की गति होनी होती वही बुद्धि शुरू से बन जाती है और अपने अपने समय पर अपने अपने कार्य करती रहती है.
एक जातिका जिसका जन्म तीस मार्च उन्नीस सौ पचास में हुआ था की कुंडली के अनुसार मेष लगन है,चौथे भाव में चन्द्रमा है पंचम में वक्री शनि है,छठे भाव में वक्री मंगल है केतु भी विराजमान है,दसवे भाव में शुक्र विराजमान है ग्यारहवे भाव में गुरु विराजमान है,बारहवे भाव में सूर्य बुध और राहू विराजमान है.

इस कुंडली के अनुसार राहू ने अपना अधिकार जिन ग्रहों पर किया है वे है सूर्य राहू के साथ बारहवा है,बुध भी राहू के साथ बारहवा है राहू ने सूर्य और बुध की शक्ति को अपने अन्दर सोख लिया है,राहू की पंचम दृष्टि चौथे चन्द्रमा पर होने के कारण चन्द्रमा का बल भी राहू के पास है,छठे भाव में मंगल वक्री की शक्ति भी राहू ने अपने अन्दर सोख ली है और केतु ने भी मंगल को अपना असर देकर पूर्ण किया है,केतु ने अपना बल शुक्र को भी दिया है और शुक्र के बल को प्राप्त करने के बाद राहू की सहायता की है,राहू के दूसरे भाव का ग्रह राहू से लेता है और राहू से बारहवा ग्रह राहू को देता है वही प्रकार केतु के लिए देखा जाता है केतु से दूसरे भाव का ग्रह केतु से लेता है और केतु से बारहव ग्रह केतु को देता है.इस कुंडली में राहू से बारहवा ग्रह गुरु लाभ भाव में विराजमान है इसलिए राहू गुरु को अपनी शक्ति से प्राप्त किया गया प्रभाव गुरु को दे रहा है और केतु से बारहवा वक्री शनि केतु के प्रभाव में आने वाले सभी ग्रहों की शक्ति को ग्रहण कर रहा है,इस प्रकार से कुल फ़ायदा में रहने वाले ग्रह गुरु और केतु है.

ग्यारहवा गुरु जातक के बड़े भाई के रूप में भी होता है और जातक के मित्रो की श्रेणी में भी आता है.पंचम शनि अगर मार्गी होता है तो मस्त मलंग संतान के रूप में माना जाता है और अगर वह वक्री होता है तो निश्चित रूप से पुत्र संतान के रूप में होता है और बुद्धिमान भी होता है.जातिका के लिए कार्यों से यह शनि बुद्धि वाले काम करने की औकात देता है जीवन के प्रति संतानके प्रति पति के प्रति लाभ वाले मामले के प्रति धन के प्रति कोइ भी दिक्कत नहीं हो पाती है,कुंडली में शुक्र का फल जो पति के रूप में है वह दोहरा मिलता है,इस दोहरे कारण के द्वारा अक्सर यह भी देखा जाता है की जातिका के कार्य या घर अथवा संपत्ति एक बार राहू केतु के कारणों से समाप्त हो गयी होती है,लेकिन राहू का असर बारहवे भाव में होने से और चन्द्रमा का राहू से ग्रसित होने के कारण मानसिक रूप से पुत्र के प्रति पुत्री के प्रति जो भी कार्य किये जाते है वे हमेशा दोहरे रूप में किये जाते है,और चिंता का कारण भी हमेशा जीवन के शुरुआत में पिता  के प्रति शादी के बाद पुत्र के प्रति और पुत्री के प्रति माने जाते है.लेकिन केतु की सीमा जीवन के आधे भाग तक ही मानी जाती है अगर राहू बारहवा है या लगन में है या दूसरे भाव में है.जीवन का दूसरा भाग जो उम्र की पचासवी साल से ऊपर जाता है वह धीरे धीरे राहू की सीमा में प्रवेश करता जाता है,उस समय में जातक अपने को राहू की सीमा मेजाने के कारण एकांत में ले जाना शुरू कर देता है वह अपने हाथ पैरो के काम को करने के बजाय मानसिक रूप से चिंतित होकर एकांत में रहना शुरू कर देता है,वह अपने सभी क्रियाओं को बंद सा करने लगता है,घर में परिवार में समाज में कोइ अगर मानसिक रूप से लगाव को लगाना भी चाहता है तो जातक अपने स्वभाव के अनुसार उससे दूर रहने की कोशिश करता है अगर किसी प्रकार से जबरदस्ती की जाये तो वह झल्लाहट से जबाब देता है एक दूसरे के प्रति शंका करने के बाद या किसी प्रकार का आक्षेप विक्षेप करने के बाद अगर जीवन साथी है तो उससे अगर घर के अन्य लोग भी है तो उनसे अपनी वार्ता को झल्लाहट भरे कारणों से ही पूर्ण रखने की कोशिश करता है,इस प्रकार से जातक से लोग धीरे धीरे अलग होना शुरू कर देते है जो घर के नए सदस्य होते है वे अपने मानसिक रूप से दूरिया बना लेते है या किसी प्रकार की शब्दों की या कार्यों की अथवा व्यवहार के शत्रुता को दिमाग में पाल लेते है,अपने घर के सदस्य होने के कारण वे दिखावा तो यही करते है की जातक उनके लिए एक घर का सदस्य है लेकिन मानसिक रूप से जातक का कोइ भी किया गया कार्य उन्हें अखरने लगता है सभी कामो के अन्दर कोइ न कोइ दिक्कत देखी जा सकती है इस प्रकार से टोका टोकी का काम शुरू हो जाता है और इस प्रकार से जातक का अपने में ही सिमट कर रहना या किसी प्रकार से घर परिवार से दूरिया बनाना या एक दूसरे के प्रति आने जाने वालो से बुराइया करना ही माना जाता है.

इस राहू का एक प्रभाव और भी देखा जाता है की जातक की उम्र के साठवी साल के बाद में जातक की पुराणी यादे तो जीवित रहने लगती है लेकिन जो भी कार्य वर्त्तमान में किये जाते है उन्हें वह भूलने लगता है,वह पिछली बाते बड़े आराम से बताता है लेकिन कल उसके साथ क्या हुआ है उसे नहीं पता होता है वह यहाँ तक राहू के घेरे में आजाता है कि उससे अगर पूंछा जाए कि कल क्या खाया था वह एक दम से मना कर देगा कि उसे कल खाना मिला ही नहीं था,कई बार तो राहू का भ्रम इतना भी देखा गया है कि जातक अगर चारपाई पर लेता है और वह अपने शरीर की कल्पना को मन के अंदर राहू चन्द्र की ग्रहण वाली नीति से लाकर अनुमान लगाना शुरू कर देता है कि वह लैट्रिन के लिए गया है और वह लैट्रिन वाले स्थान में ही लैट्रिन कर रहा है लेकिन शरीर लैट्रिन तक गया ही नहीं होता है केवल वह मानसिक रूप से लैट्रिन में गया होता है पता चलता है कि जातक ने लैट्रिन बिस्तर पर ही कर ली है.

अक्सर जन्म से जिसका चन्द्रमा राहू से जुडा होता है उनके साथ ही इस प्रकार की बाते देखने में आती है.कारण उनकी जिन्दगी में जद्दोजहद की पराकाष्ठा रही होती है घर के बारे में घर के सदस्यों के बारे में घर के बाहर के बारे में पति के बारे में या पत्नी के बारे में अह जीवन भर चिंता को लेकर चला होता है वह चिंता के रूप इस राहू के कारण अक्सर भ्रम में डालने के लिए माने जाते है और यह बात धीरे धीरे याददास्त को समाप्त करने के लिए भी मानी जाती है.

बारहवे राहू वाले व्यक्ति के लिए जीवन के दूसरे आयाम के लिए एक उपाय बहुत ही कारगर हुआ है कि जातक को लहसुन की मात्रा को बढ़ा दिया जाए,सर में कपूर को मिलाकर नारियल का तेल मालिस में प्रयोग किया जाए और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने का उपाय किया जाता रहे,सर्दी गर्मी से बचाकर रखा जाए.