Sunday, February 5, 2012

ग्रह बाधा निवारण का अचूक उपाय

मनुष्य शरीर और उसकी प्रकृति बनावट रुचियां और व्यवहार अलग अलग है,लेकिन ग्रह अपना प्रभाव भी रुचि बनावट और व्यवहार से ही प्रदान करते है। उम्र संगति और माहौल भी ग्रह प्रभाव तथा दुख सुख का कारण पैदा करने वाले होते है। कल हमने जो किया उसका फ़ल आज प्राप्त कर रहे है और आज जो कर रहे है वह कल प्राप्त कर लेंगे। लेकिन यह सब कर्म पर निर्भर है,जैसा कर्म किया जायेगा फ़ल भी उसी के अनुसार मिलना है यह तो सत्य है। ग्रहों से मित्रता करना ही ग्रह फ़ल को अच्छे या बुरे फ़ल में प्राप्त करना होता है। अच्छे ग्रह से मित्रता करने पर अच्छे फ़ल और बुरे ग्रहो से मित्रता करने पर बुरे फ़ल मिलने लगते है। लेकिन बुरे फ़ल भी अच्छे होते है और अच्छे फ़ल भी बुरे होते है। कर्म सिद्धांत के अनुसार जो अच्छा लग रहा है वह कल बुरा भी लगेगा,जो आज बुरा लग रहा है वह कल अच्छा भी लगेगा।
पहला उपाय है जिन्दा ग्रहों से उचित मित्रता करना
जैसे कुंडली मे बारह भाव होते है वैसे ही जीवन के बारह रिस्ते जीवित रहने वाली भावनाओं से जुडे होते है। पहले भाव से मित्रता करने का मतलब होता है अपने शरीर नाम और अपनी औकात से मित्रता करना,दूसरे भाव से मतलब होता है अपने भौतिक धन अपने कुटुम्ब से मित्रता करना,तीसरा भाव अपनी भावना को अपने से छोटे और अपने रहन सहन के कारको के लिये जाना जाता है जो लोगो से बात चीत और दूसरे की भावना को समझ कर व्यवहार करने से माना जाता है,चौथा भाव अपने रहने वाले स्थान के आसपास के लोगो और अपने घर के अन्दर के सदस्यों से तथा मानसिक भावनाओ से दोस्ती करके समझना,पांचवा भाव अपनी संतान से अपने बुद्धि के प्रयोग से याददास्त को बढाकर रखने से और कार्य के अलावा भी शरीर को सुधारने के लिये उचित व्यायाम करने से छठा भाव रोजाना के कामो से लोगों की अन्दरूनी भावनाओ को आहत नही करने से समय से अपनी दैनिक क्रियाओं को पूर्ण करने से सप्तम भाव से अपने जीवन साथी से जिससे राय ली जा रही है या जो साथ रहकर किसी भी काम को कर रहा है उससे उसकी बुद्धि और विवेक को समझ कर चलते रहने की भावना से अष्टम से अपमान के कारण को समझने से यानी बिना कारण के अपमान नही हो सकता है,मनसा वाचा कर्मणा जो अपमान के कारक पैदा होते है वह किये गये कर्मो के अनुसार ही होते है,अच्छाइयों को ग्रहण करने की कला और बुराइयों को समाप्त करने की कला,इस भाव को और अधिक समझने के लिये यह मान लेना चाहिये कि दूसरा भाव अगर मुंह है और जो वस्तु भोजन में अच्छी लगती है उसका शरीर के द्वारा रूप परिवर्तित होकर जब मल के रूप मे वह वस्तु शरीर से बाहर जाती है तो गन्दगी देती है,जब अच्छी सुगन्ध ली थी अच्छा स्वाद चखा था तो गन्दगी भी सहनी पडेगी। नवे भाव से अपने कुल के अनुसार चलते रहना जो पिता के परिवार के लोग है पिता के परिवार से धर्म आदि के कारण बन कर चलते रहे है उन्हे अपना कर चलते रहना इस कारण से जो भी मिलेगा वह परिवार के साथ साथ समाज से भी जुड कर मिलेगा और जब परिवार से मिलकर चलते रहेंगे तो परिवार को भी मिलकर चलना ही पडेगा,उच्च शिक्षा से भी जुडने की जरूरत होती है,विद्या के लिये जरूरी नही है कि अधिक धन होने के बाद बडी शिक्षा के लिये किसी कालेज से ही सम्पर्क रखना पडे,बडी शिक्षा के लिये तो दिमाग को फ़ैलाने की जरूरत होती है बडी शिक्षा मिल जाती है अगर पंचम को सुधार कर आये है तो नवा अपने आप सुधरने लगेगा.यानी बुद्धि को सम्भाला है तो याददास्त तो रहेगी ही और कालेज की शिक्षा का मतलब ही बुद्धि का विस्तार करना होता है। दसवे भाव से कार्य का रूप सामने होता है अपने को आगे बढाने के लिये जितनी मेहनत बुद्धि को विस्तार करने मे लगायी है उसके फ़ल अपने आप आकर कार्य मे मिलने लगते है। जो भी कार्य किये जाते है किसी भावना को अच्छे लगते और किसी भावना को वही कार्य बुरे भी लगते है,जैसे माता की भावना कार्यों के लिये साझेदारी से मानी जाती है यानी माता ने जितना साहस दिया है उसी के अनुसार कार्य किये जायेंगे,पिता के लिये वही कार्य की गति सम्मुख होती है पिता किये जाने वाले कार्यों के प्रति अपने मन के अन्दर यह सोच रखने के लिये आदी हो जाता है कि कार्य जो किया जा रहा है उसका अपना ही व्यक्ति कार्य को कर रहा है और उसकी यह बहुत बडी पूंजी है। किया जाने वाला कार्य संतान के लिये सीखने वाला होता है,माता के छोटे भाई बहिन यानी मौसी मामा आदि उस कार्य को प्राथमिक बुद्धि के रूप समझने लगते है,जीवन साथी के लिये कार्य मानसिक रूप से ग्रहण करने वाला होता है यानी अगर मास्टर बनकर कार्य किया जा रहा है तो जीवन साथी अपने आप ही मानसिक भावना से मास्टरनी की रूप ग्रहण कर लेगा। ग्यारहवा भाव लाभ का भी होता है और किये जाने वाले कार्यों का फ़ल देने वाला भी माना जाता है,साधारण रूप मे कार्य के करने के समय मे दोस्त भी मिलते है और लाभ को परखने के लिये बडे भाई बहिन या मित्र भी होते है उनके अनुसार जो कार्य किया गया और जो फ़ल कार्यों के रूप मे मिल रहा है किसी मित्र को तो अच्छा लगेगा और किसी मित्र को बुरा भी लगेगा। पंचम भाव की साझेदारी भी होती है अगर पंचम को समझ मे आता है तो ठीक है नही तो घर के अन्दर ही जलन बनने का कारण बन जाता है जैसे बडे भाई का रूप तो ग्यारहवा भाव होता है तो भाभी का कारक अपने आप पंचम बन जाता है इस कारण से अगर अधिक बढोत्तरी होने लगी है तो भाभी का रूप तो जलन रखने वाला बनेगा ही,उसके अन्दर भी अगर उस जलन का रूप समझा जाता रहा और बडे भाई की भी दोस्त की तरह से सहायता की जाती रही तो भाभी भी अपने को सहयोगी बनाकर चलने लगेगी। बारहवा भाव खर्चे का भी होता है और यात्रा करने का कारक भी होता है इस भाव के अनुसार समय पर जो खर्चा करना है उससे चूकने पर भलाई और बुराई भी मिल सकती है अधिकतर मामले मे यह लगता है कि अमुक राशि को अमुक मद पर खर्च करने के बाद घाटा हो गया है लेकिन घाटा होगा नही तो मुनाफ़ा आयेगा कहां से ? इसी प्रकार से यात्रा करना भी जरूरी होता है जब तक विभिन्न जगह विभिन्न लोगो से मिला नही जायेगा तो समझा कैसे जायेगा,शरीर के साथ मन भी बहुत चलता है इस बात को जब समझा जा सकता है जब शरीर को किसी यात्रा पर ले जाया जाये और शरीर के चलने के साथ मन अलग अलग प्रकार के स्थानो अलग अलग प्रकार की चीजे देखने के बाद कितना चलता है यह तो घूमने वाले ही अधिक जानते है जो जितना घूमता है उतनी ही जानकारी उसके पास होती है,इस प्रकार से पहला अचूक उपाय है भावो से दोस्ती करना। यही भाव इन्सानी रिस्तो के लिये भी माने जाते है पहला खुद के शरीर से दोस्ती करना दूसरा अपने कुटुम्ब के लोगो से बनाकर रखना तीसरा छोटे भाई बहिन से बनाकर रखना चौथा माता से बनाकर रखना पांचवा सन्तान से बनाकर रखना छठा मामा मौसी से बनाकर चलना सातवा साझेदार और जीवन साथी से बनाकर चलना आठवा ताई और ताऊ से बनाकर चलना नवा पिता परिवार से बनाकर चलना घर के बुजुर्गो से और अपने सामाजिक लोगो से धर्म की शिक्षा देने वाले लोगो से बना कर चलना दसवे से कार्य स्थान पर कार्य करने वाले लोगो से बनाकर चलना ग्यारहवे से बडे भाई बहिनो और दोस्तो से बनाकर चलना बारहवे भाव से मामी मौसा आदि से बनाकर चलना चाचा चाची से बनाकर चलना आदि भी इन्सानी भावना से दोस्ती बनाकर चलने वाली बात को समझा जा सकता है।
ग्रहों से दोस्ती भी अचूक उपाय है
जिन्दा ग्रहों के अन्दर जो रोजाना की जिन्दगी मे सामने होते है वह जिन्दा ग्रह कहलाते है। सूर्य के बारह रूप ज्योतिष से माने जाते है सूर्य का रूप पिता के रूप मे माना जाता है,पहले भाव का सूर्य अपना पिता होता है,दूसरे भाव का सूर्य जीवन साथी के ताऊ के रूप मे जाना जाता है तीसरा सूर्य जीवन साथी का पिता माना जाता है चौथा सूर्य माता का पिता माना जाता है पंचम सूर्य भाभी का पिता माना जाता है छठा सूर्य जीवन साथी के मामा मौसी का पिता माना जाता है सप्तम सूर्य जीवन साथी का पिता माना जाता है अष्टम सूर्य खुद के ताऊ के रूप मे जाना जाता है नवा सूर्य खुद के पिता के रूप मे होता है दसवा सूर्य भाभी के मामा के रूप मे माना जाता है ग्यारहवा सूर्य पुत्र वधू के पिता के रूप मे जाना जाता है बारहवा सूर्य खुद की मामी मौसा का पिता का माना जाता है इनसे दोस्ती रखने पर सूर्य के प्रभाव अपने सही बने रहते है। चन्द्रमा के भी बारह रूप माने जाते है। पहले भाव का चन्द्रमा अपनी माता के रूप मे माना जाता है दूसरा चन्द्रमा जीवन साथी की ताई के रूप मे माना जाता है तीसरा चन्द्रमा जीवन साथी की दादी के रूप मे भी माना जाता है और जीवन साथी की दूसरी माता के रूप मे भी माना जाता है चौथा चन्द्रमा खुद की माता के रूप मे भी होता है और पांचवा चन्द्रमा प्राथमिक शिक्षा मे शिक्षा देने वाली मास्टरनी के रूप मे भी माना जाता है और माता की दूसरी माता यानी दूसरी नानी के रूप मे जाना जाता है छठा चन्द्रमा मौसी के रूप मे भी माना जाता है और मौसा की दूसरी माता के रूप मे भी देखा जाता है सप्तम का चन्द्रमा जीवन साथी की माता के रूप मे अष्टम चन्द्रमा खुद की ताई के रूप मे देखा जाता है नवा चन्द्रमा खुद की दादी के रूप मे देखा जाता है,दसवा चन्द्रमा खुद की दूसरी माता के रूप मे ग्यारहवा चन्द्रमा बडी बहिन के रूप मे बारहवा चन्द्रमा मामी के रूप जाना जाता है। इसी तरह से मंगल भी पहले भाव मे अकेला भाई दूसरे भाव मे दो भाई तीसरे भाव में बडा भाई चौथे भाव में चाचा के रूप मे भाई पंचम में भाई का साला छठे भाव में मौसेरा या ममेरा भाई सप्तम मे जीवन साथी का भाई तथा दूसरा भाई अष्टम में ताऊ का लडका नवे भाव में खुद का तीसरा भाई दसवे में माता का दूसरा भाई ग्यारहवें में बडा भाई या बडी बहिन का पति बारहवे भाव में धर्म भाई के रूप मे माना जाता है। बुध पहले भाव में बडी लडकी दूसरे भाव में दूसरी बहिन तीसरे भाव मे छोटी बहिन या ममेरी बहिन चौथे भाव में मौसी की बडी लडकी पंचम में खुद की दूसरी लडकी छठे भाव में मौसेरी बहिन या मामा की लडकी सप्तम में दूसरे नम्बर की बहिन अष्टम में ताऊ की लडकी नवे भाव मे बुआ दसवे भाव दूसरी बुआ ग्यारहवे भाव में सबसे बडी बहिन बारहवे भाव मे धर्म बहिन के रूप में देखी जाती है। गुरु के लिये पहले भाव में खुद का रूप दूसरे भाव में पिता का दूसरा भाई तीसरे भाव में जीवन साथी का गुरु चौथे भाव में सम्मानित दूसरा भाई पंचम भाव में शिक्षा क्षेत्र का मानयीय व्यक्ति छठे भाव में मामा के रूप मे लालन पालन करने वाला सातवे भाव मे दूसरा भाई और जीवन साथी का पिता अष्टम भाव में दूसरा भाई लेकिन जन्म स्थान से दूर रहने वाला पिता की जगह पर ताऊ आदि के द्वारा पालन करने वाला व्यक्ति नवे भाव से धर्म स्थान या समाज मे उच्च स्थिति वाला पिता दसवे भाव में जातक को दत्तक पुत्र की तरह पालने वाला पिता ग्यारहवे भाव मे बडा भाई और बडे भाई के द्वारा पिता वाले कार्य करना बारहवे भाव का तीसरा और बडा भाई जो कर्जा दुश्मनी बीमारी मे साथ रहने वाला हो। इसी प्रकार से शुक्र के लिये देखा जाता है पहले भाव का शुक्र जीवन साथी के द्वारा चलने वाला दूसरे भाव का अवैद्य सम्बन्ध या दूसरा जीवन साथी तीसरे भाव में भाभी चौथे भाव में नगर वधू पंचम भाव में बडी लडकी छठे भाव में बीमार जीवन साथी सातवे भाव में इच्छानुसार चलने वाली जीवन संगिनी अष्टम में मृत्यु के बाद की सम्पत्ति को लाने वाली स्त्री या विदेशी पत्नी,नवे भाव में जीवन साथी की छोटी बहिन दसवे भाव में गुप्त सम्बन्ध से बना हुआ जीवन साथी और ग्यारहवे भाव में मित्र मंडली से आयी जीवन संगिनी तथा बारहवे भाव में देर से मिलने वाली जीवन संगिनी के रूप मे देखा जाता है। पहले भाव का शनि खुद ही मजदूरी करने वाला दूसरे भाव का शनि रोज कुआ खोदकर रोज पानी पीने वाला तीसरे भाव का शनि आलसी काम करने वाला चौथे भाव का शनि काम के लिये सोचना जरूर लेकिन काम को करना नही पंचम का शनि मुफ़्त के माल को प्राप्त करने की सोचने वाला छठा शनि दूसरे की नौकरी करके खाने वाला सप्तम का शनि अन्धेरे मे काम करने वाला अष्टम का शनि हमेशा दलाली की खाने वाला नवा शनि अपने ही लोगो के साथ चालाकी करके खाने वाला दसवा शनि मिलने वाली रोजी को लात मारकर दूर भागने वाला ग्यारहवा शनि हर काम मे कानून लगाने वाला बारहवा शनि घर से बाहर रहकर उन्नति करने वाला माना जाता है।पहले भाव मे राहु ट्रिक से काम करने वाला दूसरे भाव का राहु स्वांग बनाकर चलने वाला तीसरे भाव का राहु तर्क बुद्धि से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने वाला चौथा राहु आजीवन भ्रम को लेकर चलने वाला शक करने वाला पंचम राहु लोगों का मनोरंजन करके खाने वाला छठा राहु कनफ़्यूजन देकर दूसरे को लडाकर खुद तमाशा देखने वाला सातवा राहु एक साथ कई काम सोच कर काम करने वाला लेकिन एक भी काम का पूरा नही करने वाला अष्टम राहु किसी भी काम के अन्दर रिस्क लेने से डरने वाला नवा राहु अपनी औकात को झूठ से प्रदर्शित करके कमा कर खाने वाला दसवा राहु कभी खूब काम और कभी आलस से बैठ जाने वाला ग्यारहवा राहु लाभ के मामले मे कनफ़्यूजन रखने वाला और बारहवा राहु पराशक्तियों के सहारे कमाकर खाने वाला माना जाता है,केतु के लिये पहले भाव मे खुद का बडा लडका दूसरे भाव में बोलने चालने मे ही व्यवहारिकता मे चलने वाला तीसरे भाव का केतु बनावटी सम्बन्ध लेकर चलने वाला चौथे भाव का केतु घर और परिवार को सम्भालने वाला पंचम का केतु छल से कमा कर खाने वाला छठा केतु ननिहाल या अपने घर मे ही नौकरी करने वाला सप्तम का केतु विजातीय सम्बन्धो को लेकर चलने वाला अष्टम केतु अपंग बनकर रहने वाला नवा केतु विदेशो से सम्बन्ध बनाकर चलने वाला और पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर चलने वाला दसवा केतु हर काम को राजनीति से लेकर चलने वाला ग्यारहवा केतु बडी बहिन जो हमेशा ही घर मे रहकर मायके की सोचने वाली हो और बारहवा केतु हमेशा अपनी बात को ऊंची रखने वाला माना जाता है। इस प्रकार से उपरोक्त लोगो से मधुर सम्बन्ध बनाकर चलने से यह भी अपनी अपनी गति से अच्छे फ़लो को देने वाले होते है। इन कारणो मे जो भी दिक्कत दे रहा है उसी के प्रति ग्रह की भावना को मान कर चलना होता है कि अमुक ग्रह खराब है उसकी मान्यता से वही खराब ग्रह अच्छे का फ़ल देने लगेगा।

1 comment:

  1. namskar gurji,
    mera dat of birth: 26-11-1983, time: 12:04 pm, place: pauri (UP), india hai,
    mere kon sa grah kharab hai, jiski wajah se mere har kaam me rukawat aati hai..
    kripya margdrshan karen,,bohat pareshan hun,,na nokari hai na business,,kya karu,,kuch kaam nhi banta...

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