Friday, February 3, 2012

ज्योतिष और महिलायें

पुरुष सकरात्मक तो स्त्री नकारात्मक के रूप मे प्रकृति ने पैदा की है। बिना सकारात्मक के नकारात्मक का मूल्य नही है,और बिना नकारात्मकता के सकारात्मकता की कोई कीमत नही है। पुरुष के लिये सप्तम स्थान से पत्नी का रूप प्रदान किया जाता है,और स्त्री के लिये सप्तम का स्थान पति के लिये प्रयोग मे लाया जाता है। अगर जीवन पति पत्नी का अवरोध नही होगा तो जीवन का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। पति के सकारात्मक होने पर पत्नी अपने कार्यों से पुरुष की ही गति को बढायेगी और पति के नकारात्मक होने से पत्नी पति की गति को घटायेगी यह सत्य भी है और सभी मनुष्यों के प्रति माना भी जा सकता है। अविवाहित रहने के बाद जो भी किया जायेगा वह व्यर्थ मे चला जाना भी माना जा सकता है,कर्मो को कुछ समय तो इतिहास याद करेगा और बाद मे उन कर्मो की गति के क्षीण हो जाने पर उन्हे भुला दिया जायेगा। इस सत्य को मानकर ही गृहस्थ धर्म की उत्पत्ति होती है।

जिस प्रकार से पुरुष की गति ज्योतिष से बनती है उसी प्रकार से स्त्री की भी गति बनती है। जन्म समय के ग्रह स्त्री को सदाचारिणी भी बना देते है और दुराचारिणी भी बना देते है। अपने अपने समय के अनुसार जो ग्रह अपने गोचर से दशा से जैसी रश्मिया प्रदान करते है उसी प्रकार से स्त्री की गति बनती जाती है। लगन से स्त्री की प्रकृति और स्वभाव के मामले मे जाना जाता है और सप्तम से उसके पति के बारे मे कथन किया जाता है। स्त्री का दूसरा भाव पति के लिये अपमान देने का कारक होता है तो पति का दूसरा भाव पत्नी के लिये अपमान देने का कारक माना जाता है। इस अपमान को अगर सकारात्मक रूप से देखा जाये तो रिस्क लेने का भाव भी कहा जाता है तथा अन्दरूनी जानकारी लेने और देने से इस अपमान को भी सुख रूप मे माना जाता है।

सम राशि में चन्द्रमा लगन मे होता है तो स्त्री की प्रकृति कोमल होती है और उसके मुख की सुन्दरता एक अजीब सी चमक के साथ होती है पुरुष या स्त्री वर्ग उस आभा के प्रति जल्दी आकर्षित हो जाते है। इस चन्द्रमा से स्त्री के अन्दर लज्जा जो स्त्री की मर्यादा मे मानी जाती है का होना लाजिमी होता है,जब तक स्त्री के अन्दर लज्जा नही है तब तक स्त्रीत्व की भावना मे जाना बेकार की बात है। मीठा बोलना भी इसी चन्द्रमा की गति से होता है और अगर स्त्री मीठा बोलने वाली नही है तो उसे एक प्रकार से सूखे काठ को काटने वाली कुल्हाडी से बराबरी दी जाती है। ऐसी स्त्री केवल मृत्यु के बाद के सुखों को भोगने वाली होती है और अपनी वाणी व्यवहार से चलते हुये मर्यादित जीवन को बरबाद करने वाली भी होती है। लगन के चन्द्रमा पर शुभ ग्रहों की नजर से स्त्री के अन्दर सर्व गुण सम्पन्न कहा जाता है। और स्त्री के अन्दर दया धर्म सुकर्म और दुष्कर्म की मीमांसा करने की क्षमता भी होती है। उसे पहिनना और सजना उसकी प्रकृति के द्वारा ही मिला होता है।

अगर वही चन्द्रमा विषम राशि मे होता है तो स्त्री की आकृति पुरुष जैसी बन जाती है उसकी आदर पुरुषों जैसी होती है,और कैसे भी पाप ग्रह अगर उस चन्द्रमा को देखते है तो स्त्री को दूसरो की गृहस्थी को बरबाद करना और अपने स्वार्थ के लिये किसी भी काम को करना उसे अच्छा लगता है अपने पति से सन्तुष्ट नही रहकर भी वह दूसरे पुरुषों की तरफ़ आकर्षित भी रहती है और जब उसे कई प्रकार की अन्तरोग हो जाते है तो उसका स्वभाव भी झल्लाहट से पूर्ण हो जाता है,साथ ही अपने व्यवहार से वह अपने को ही बरबाद करने के अलावा स्वछन्द विचरण करने वाली भी बन जाती है। मेष या वृश्चिक लगन या राशि मे मंगल त्रिशांश मे होता है तो वह स्त्री बहुत जल्दी ही कामोत्तेजना में लीन हो जाती है और उसे हमेशा अपने लिये नये नये पुरुषों की आवश्यकता बनी रहती है। अगर शनि त्रिशांश मे होता है तो अपने स्वकर्मो के कारण उसे जीवन भर दूसरों की सेवा ही करनी पडती है।गुरु त्रिशांश मे होता है तो सुशील स्वभाव से आव आदर से जीना और लोगो की सहायता मे जीवन को लगा कर अपने नाम के साथ कुल का नाम भी उज्जवल करती है। बुध अगर त्रिशांश मे आजाता है तो स्त्री के अन्दर छल कपट और मायाजाल से पूर्ण होना माना जाता है उसे अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये कोई भी काम बुरा नही लगता है सदैव अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये वह अपने जीवन के साथ दूसरे के जीवन के साथ भी खिलवाड करती है और अन्त मे अपने नाम को बदनाम करने के साथ साथ अपने कुल का नाम भी बदनाम कर जाती है। सबसे अधिक खतरनाक शुक्र का त्रिशांश माना जाता है इस त्रिशांश के असर से स्त्री अपने वैश्या जैसी स्थिति मे रखती है और सजना संवरना अपनी मोहकता को बिखेर कर उसी प्रकार से लोगो के जीवन को बरबाद करती है जैसे एक दीप की ज्योति हजारो पतंगो को जला कर राख कर देती है।

लगन मे वृष या तुला राशि और लगन गत चन्द्रमा होता है और मंगल का त्रिशांश होने पर कटु आवाज को निकालने वाली चिढचिढी तथा जल्दी से गुस्सा होकर अपने परिवार से दूर रहने वाली होती है,पति को अपने इशारे से चलाने वाली तथा अन्त मे विधवा का जीवन जीने के लिये मजबूर हो जाती है। अगर शनि त्रिशांश मे होता है तो स्त्री का स्वभाव दुष्ट भी होता है और अनहोनी को जीवन मे झेलने के बाद पहले पति से त्याग दी जाती है तथा दूसरे पति के साथ जीवन तो चलता है लेकिन संतान से हमेशा उपेक्षित होने के लिये उसे मजबूर होना पडता है। गुरु के त्रिशांश मे होने से अच्छे स्वभाव से युक्त और समय पर शादी सम्बन्ध होने के बाद अपने कुल और धर्म की मर्यादा से पूर्ण होने पर अपने कुल के नाम को रोशन करने वाली होती है। शुक्र के त्रिशांश मे होने से स्त्री की ख्याति श्रेष्ठ कलाओं में होने से वह अपने को उच्च कुल से जोड कर रखती है और हमेशा ही अपने लोक लाज और धर्म का निर्वाह भी करती है लेकिन उसके अन्दर केवल अपने कुल की मर्यादा और लाभ की लालसा स्वार्थी भी बना देती है।

मिथुन राशि या लगन के होने से मंगल के त्रिशांश के होने से स्त्री के अन्दर कपट भरा होता है जब शनि का त्रिशांश होता है तो उसे सन्तान पैदा करने के अयोग्य माना जाता है और वह अपने शरीर के ऊपर के हिस्से मे अधिक चौडी हो जाती है तथा नीचे का हिस्सा कमजोर रहता है। गुरु के त्रिशांश मे होने से स्त्री सदाचारिणी के रूप मे देखी जाती है बुध के त्रिशांश मे होने से कोमल स्वर मे बात करने वाली और सच्चे गुणो से सुशोभित रहने वाली होती है। शुक्र के त्रिशांश स्त्री के अन्दर कामुकता अधिक होती है और उसके आगे के दांत चपटे और बडे होते है। इसी प्रकार से अन्य राशियों और उनके त्रिशांशो से स्त्री के स्वभाव को जाना जा सकता है।

2 comments:

  1. guru ji kundali me trisaans kaise dekha jaata he ....ye kisi bhaaavko kaha jaata he yaa ye koi chart he like navmaans ,dasmaans ?

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